हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

पुण्य - रश्मि प्रणय वागले

रश्मि प्रणय वागले
रश्मि प्रणय वागले
सुबह सुबह सब्जी लेने के लिए बाहर निकली ,तो देखा पड़ोस के श्रीमान् अशोक जी हाथ में कुछ रोटियाँ लिये खड़े थे। दूसरी तरफ़ उनके पास ही दो भूरे और-सफ़ेद चितकबरे श्वान भी ललचाई नजरों से उन्हें देखते हुए खड़े थे ।
“क्या हुआ अशोक जी ? श्वान -भोजन कराया जा रहा है। बड़े पुण्य का काम है ये ।”मैंने उन्हें अभिवादन करते हुए कहा। ।
“अरे कहाँ मैडम ? पंडित जी बोले है कि हर शनिचर को काले कुत्ते को रोटी खिलाओ । सारी पीड़ा दूर होगी । अब काला कुत्ता आ ही नहीं रहा है अभी ।”
और मै सोचने लगी -हे ईश्वर !! तुम कब से रंग देख कर भक्तो पर प्रसन्न या नाराज होने लगे?”
भूरे और सफ़ेद चितकबरे श्वान अभी भी प्रतीक्षारत थे ।शायद “अगले जनम मोहे श्यामवर्ण कीजो” ऐसा वरदान भगवान् से मन ही मन माँग रहे होंगे ।
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