हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

फागुनी दोहे - श्वेता राय

 श्वेता राय

महुआ महके बाग़ में, बौराया है आम।
SHWETA RAIपीली धरती सज रही, तीखा लगता घाम।।1

पत्ते झूमे डाल पर, फूले टेसू लाल।
धरती के सब अंग पर, मौसम मले गुलाल।।2

गेहूं बिहँसे खेत में, हँसता देख किसान।
चना मटर के पौध से, आती उनमें जान।।3

फागुन बौराया फिरे, पीकर मस्ती भंग।
लोग बाग़ खलिहान में, डाले सब पर रंग।।4

डूबे सब हैं प्रेम में, ऐसा उड़ा गुलाल।
भेदभाव सब भूल के,दिखते लाले लाल।।5

पीली सरसो झूमती, झूमे गेहूं बाल।
मस्त बयरिया दे रही, इनको सुर औ ताल।।6

रूप रंग सब खिल गया, इतना मला गुलाल।
मन का पोखर फिर बना, मस्ती का इक ताल।।7

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