हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

बसंत  आने की खबर मिली - रश्मि रेखा

1-बसंत  आने की खबर मिली

साँझ का आँचल लगा सिमटने
दिन विस्तृत हो चला बहकने
सूर्य किरण धरती पर थिरकी
बर्फ लगी फिर वहीँ पिघलने
जब घास उठी नयन मिचकाती’
तो पवन सुगन्धि से लगी गमकने।
क्यों पर्वत अपने परम शिखर से
पल-पल छिन-छिन लगा पिघलने
जगा नदी का शिथिल आँचल
दिशा बना कर लगा मचलने
लो तट की बूढ़ी बाँहों में भी
उन्माद प्रेम का लगा उमड़ने।
क्यों गुम सुम सोये बेला की
खिलने को उत्सुक नई कली
क्या सन्देश किसी के आने का
लेकर खुस पुस हवा चली
सुनो छत-छत कागा की बोली
“बसंत आने की खबर मिली”
लो बसंत आने की खबर मिली।

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2-नई उम्मीदें

इस बार बसंत की अदा नई
इक नई सुगन्धि दिशा में बही।
इतरा के गई मन भा के गई
इक वेणी चपल लहरा के गई
और चंचल बदरी छा-सी गई
क्यों मधुर नारंगी स्मित फैली
जब उषा अम्बर में उभरी
लो वीणा वादिनी खुद सजकर
किसका वरदान लेकर प्रगटी.
स्मृति पर याद मधुर-सी उभरी
भावों ने ली लम्बी अंगड़ाई
इस बार बसंत की छवि नई
उम्मीदों  की कलियाँ खिलने को आईं। ।

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3-प्रियतम

भोर मेरी मुस्कान तुम्हारी
उषा की मधुसिक्त किरन
छलक उठें अनुराग के सागर
मिलते जब ये चार नयन।
कठिन दिशा या विकट राह हो
दिन भर हो धूप की तपन
साँझ मिलन जब अपना होता
गुम जाते सब क्लेश और ग़म।
पूरक हम इक दूजे के प्रियतम
बाँट लिये गुण अवगुण सकल
जहाँ छाँव है मेरे आँचल की
तुम्हारी तरु-बाँहों का बल।
एक लगन है एक ही मंजिल
एक ही राग पर दो धड़कन
शिथिल हों अपने दो तन भी
धुक-धुक साँस की एक रटन।

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rashmi-gupta@rogers. com