हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

भगत सिंह का नया चेहरा - अलका सिन्हा

डायरी अंश

03 जनवरी, 2013 

जाते हुए साल में दामिनी के साथ हुई बर्बरता की दहशत से देश भर की आत्मा कांप उठी है। आम जनता तक राजधानी की सड़कों पर उतर आई है। राजपथ पर जमा जन-सैलाब न्याय की गुहार लगा रहा है। उधर सरकारी महकमें में चुप्पी छाई है। धारा 144 लगाई जा रही है, राष्ट्रपति भवन के आसपास मेट्रो स्टेशनों को सील कर दिया गया है। इस नाते राम मनोहर लोहिया जैसे बड़े और महत्वपूर्ण अस्पताल में भी जाना दूभर हो गया है। घटना के चार्टड बस में घटने के कारण व्यवस्था इसे बहुत बड़े सूत्र के रूप में देख रही है और एहतियातन, चार्टड बसों पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। लिहाजा, दिल्ली में चल रही अधिकतर चार्टड बसें गैर-कानूनी रूप से चलाए जाने के कारण बंद हो गई हैं।

चार्टड बसें बंद हो जाने से रोज ऑफिस पहुँचने में दिक्कत हो रही है। कड़ाके की ठंड और दिल्ली नगर निगम (डीटीसी) की भरी बसें। लोग बौखला रहे हैं और व्यवस्था को कोस रहे हैं। व्यवस्था शायद ऐसा ही चाहती भी है कि जनता के सामने और परेशानियाँ खड़ी हों और वह दामिनी का दामन छोड़कर दूसरी जिम्मेदारियों की भी बात करे। वरना एक साधारण-सी बात कि लोग दफ्तर कैसे जाएँ गे, क्या सरकार को इसकी जिम्मेदारी नहीं उठानी चाहिए थी?  और वैसे भी, क्या इतने भर से सुरक्षा हासिल की जा सकती है? अभी परसों की बात है, मैं और मेरे पति मनु द्वारका, सेक्टर-2 स्थित डॉ. राकेश के क्लिनिक से लौट रहे थे। कोई नौ बज रहे थे। अंदर वाली सड़क पार कर हम बाहर मेन रोड पर आ गए। सड़क पर बिलकुल घुप्प अँधेरा था। एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। मैंने शुक्र मनाया कि मनु साथ हैं, मैं अकेली नहीं हूँ , मगर अगले ही पल ध्यान आया कि जिस घटना को लेकर चौकसी बढ़ाई गई है और एहतियात बरती जा रही है, उसमें एक पुरुष ने साथ होकर भी क्या सुरक्षित कर दिया? लगभग यही समय था। घटना याद कर झुरझुरी-सी हो आई। कैसा बुरा वक्त आ गया है कि उस देश की औरत अपने पति के साथ भी सुरक्षित नहीं जहां के लिए कहा जाता रहा है — यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। पूरी दुनिया में हमारी छि: छि: हो रही है। बावजूद इसके ये तैयारियाँ हैं ऐसी शर्मनाक घटनाओं से बचाव के।

मैं डीटीसी की बस नंबर 781 में बैठी थी। यह बस क्योंकि एक स्टैंड पीछे से ही बनकर चलती है : इसलिए मुझे तो सीट मिल जाती है मगर कई महिलाओं की हालत खराब थी। वे समय पर ऑफिस न पहुँच पाने या फिर धक्के खाते हुए पहुँचने का रोना रो रही थीं। बस ठसाठस भरी थी मगर कंडक्टर की नजर में अभी बहुत जगह खाली थी और वह बार-बार सवारियों से आगे बढ़ने को कह रहा था। सवारियाँ लगातार बड़़बड़ा रही थीं। वैसे एक बात तो है कि इस घटना से लोग एकजुट भी हुए हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ  भी सामने आ रही हैं, वरना हमने तो रिएक्ट करना ही छोड़ दिया था। कितना कुछ रोज ही होता रहता है, मगर जिंदगी की रफ्तार बरकरार है। सबको ऑफिस जाने की हड़बड़ी पड़ी है, कोई मरता है, मर जाए, दुनिया-दुकान चलती रहनी चाहिए। खास कर युवावर्ग को तो किसी मामले से बिलकुल भी कुछ लेना-देना नहीं। एमएनसी का कल्चर कुछ ऐसा आया कि विमर्श के विषय बदल गए। अब तरक्की का मतलब प्रमोशन और विकास का मतलब सम्पन्नता है। कैब में बंद होकर ऑफिस पहुँचते हैं और कैब में बंद घर पहुँच जाते हैं। कैब के भीतर की वातानकूलित दुनिया में चेतन भगत के उपन्यास हैं, कानों में गूंजते अंगरेजी गानों का शोर है। ऐसा शोर जिसमें हर तरह की चीख-पुकार दबकर रह जाती है और कुछ को तो बैठे-बैठे भी बड़ी प्यारी नींद आ जाती है। मगर इस घटना की बर्बरता हर चीज पर हावी रही और खास तौर पर युवावर्ग में विशेष प्रकार का जुनून-सा देखने को मिला। तसल्ली हुई कि कोई तो हद इन युवाओं ने तय की। सोचती हूँ , क्या इन्हीं परिवारों से भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद नहीं निकले थे, अब क्यों नहीं निकलते? मन का कोई कोना जवाब देता है — अब घरों में एक ही लाड़ला होता है, उसकी कुरबानी कौन देगा? और आज के एकल परिवार का इकलौता भगत सिंह भी अपने परिवार को किस चाचे-ताऊ के भरोसे छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े?

पालम फ्लाइओवर पर एकाएक बस को जोर का झटका लगा और सारी सवारियाँ आगे को धकिया गईँ। जब तक यात्री कुछ समझते, कंडक्टर ने जीत के रुआब के साथ टिप्पणी की, “देखा, कितनी जगह निकल आई?”

तो ये ड्राइविंग का एक चरण था। मैं हैरान थी। और सवारियाँ भी खीज रही थीं, “ये कौन सा तरीका है गाड़ी चलाने का?”

“कब से कह रहा हूँ , आगे निकल जाओ, आगे निकल जाओ…कोई सुने तब ना…”

“मगर ये तो कोई तरीका नहीं हुआ?” कुछ सवारियों ने आपत्ति जताई।

“तो के करूँ, रोक दूँ गाड़ी?”

ड्राइवर ने गाड़ी एक तरफ कर रोक दी।

लोगों के बीच अफरातफरी मच गई, “अब ऑफिस कब पहुँचेंगे, पहले ही देर हो रही है…” महिलाएँ  ज्यादा परेशान थीं। उन्हें मालूम था कि दफ्तर में भी उन्हें ही सफाई देनी पड़ेगी। ऐसी सूरत में वे अपना आक्रोश कैसे व्यक्त कर सकती थीं।

“गाड़ी चलाओ भइया, देर हो रही है।” गुस्से को भीतर ही पीते हुए महिलाएँ  उसकी मिन्नत करने लगीं।

मेरे साथ बैठी युवती इस मंजर को सहन नहीं कर पाई, “इनकी ये हरकतें बरदाश्त कर हम इन्हें बढ़ावा देते हैं। झटके देकर गाड़ी चलाना भी गलत है, इससे भीड़ एक-दूसरे पर गिरती है और बदतमीजी करने वालों को मौका मिलता है। हमें चाहिए कि हम सरकारी हेल्पलाइन पर इनकी शिकायत करें।” वह लड़की कई तरह के सवालों का डट कर मुकाबला कर रही थी मसलन, चार्टड बसों का बंद किया जाना इसलिए सही है कि बिना परमिट के चल रही गाड़ियों का कोई रिकार्ड नहीं होता जैसाकि उस ‘यादव’ बस का भी नहीं था। इसीलिए उसे ट्रेस करने में दिक्कत आई। इनकी गाड़ियाँ ट्रैफिक पुलिस को चढ़ने वाले हफ्ते के आधार पर चलती हैं…उस लड़की ने जोर देकर घोषणा की कि उन्हें धक्के खाना मंजूर है पर इस बिंदु पर समझौता कतई मंजूर नहीं। उसके तर्क सवारियों में जोश भर रहे थे। वह पूछ रही थी कि अपने घर का ताला हम ही लगाते हैं या सरकार लगाती है, तो अपनी सुरक्षा के लिए भी हमें ही आगे आना होगा। उसने तरीका भी स्पष्ट किया, जहां कहीं गाड़ी में काले शीशे दिखें या कहीं सार्वजनिक स्थान पर किसी को दारू पीते देखें या कहीं कुछ आपत्तिजनक घटता दिखाई दे तो तुरंत इसकी सूचना पुलिस को दें…

बस के भीतर आंदोलन का- सा माहौल बन गया था। भगत सिंह का नया चेहरा पहचान में आने लगा था…असर दिखने लगा था…बस वाले ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी थी।

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