हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

भाषान्तर-पंजाबी से - जागीर सिंह कहलों

जागीर सिंह कहलों
जागीर सिंह कहलों

कैनेडा :दो कविताएँ
जागीर सिंह कहलों
(अनुवाद-सेवक सिंह)

कैनेडा-1

वतन से फोन आया है-
‘देसराज !क्या हाल है’
‘बहुत चंगा है
बहुत मौज है
तेज गाड़ियाँ हैं
खुली साफ़ सड़कें हैं
बाहर सन्नाटा है
छत पर हल्ला-गुल्ला है
बाकी भी सब ठीक-ठाक है
बस एक ही सन्ताप है :
न देस रहा ना राज रहा
बाकी सब ठीक –ठाक है ।
-0-
कैनेडा-2

यहाँ धरती के बहुत नज़दीक लगते हैं-
चाँद , सूर्य, बादल, आसमान , तारे
पंछी जो उड़ते हैं बाँध-बाँध क़तारें,
वे भी पास-पास रहते हैं;
वैसे ही बहुत पास-पास हैं ज़रूरते और इच्छाएँ
वैसे ही बहुत पास-पास हैं
गर्म और सर्द हवाएँ;
लेकिन बहुत दूर –दूर हैं
भाइयों से भाई
औलाद से माँ –बाप
बेटों से माएँ
पेड़ों से छायाएँ
बहुत दूर –दूर हैं
इंसानों से इंसान
और उससे भी ज़्यादा दूर लगता है
मेरा वतन !