हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मंजूषा ‘मन’ की कविताएँ - मंजूषा मन

manjusha...मंजूषा ‘मन’

जन्मतिथि -9 सितम्बर 1973

शिक्षा – समाज कार्य में स्नातकोत्तर

लेखन की विधाएँ – कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहे, हाइकु, ताँका, माहिया, मुक्तक, क्षणिकाएँ , लघुकथा आदि

सम्प्रति – अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन में कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत (सामुदायिक विकास कार्यक्रम)

सम्पर्क:मंजूषा दोशी ,अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन – भाटापारा,ग्राम – रवान (Rawan);जिला – बलौदा बाजार (Baloda Bazar), छत्तीसगढ़ -पिन – 493331

e mail – manjusha.doshi@ambujacement.com

majushadoshi73@gmail.com

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1-बबूल

मेरी खिड़की के पीछे
उग आया बबूल
जिसकी हर शाख
कँटीली ही सही
पर अपनेपन से भरी है।

इसे अपने साथ बड़ा होते
अपनी जड़ों पर खड़ा होते
देखा है मैंने।
जब जब इस बबूल पर
पतझड़ आया,
और इसके नुकीले काँटों पर
यौवन छाया,
तब देखकर इसके काँटों को
सबका मन भर गया
अनजाने डर से,
तो लोग दूर हो गए
इस बबूल से,
तब मेरे दिल में
और उमड़ आया
इसके लिए प्रेम;
क्योंकि
इस बनावट की दुनिया में
सभी ने
अपने कँटीलेपन को
छुपा लिया है कुशलता से
और ओढ़ ली
कोमलता की चादर
वे कहीं अधिक
लहूलुहान करते रहे
तन- मन को।
इन दोमुहे लोगों से
कहीं प्यारा है मुझे
मेरा बबूल
जिसने अपने कँटीलेपन को
छुपाया नहीं
झूठे लोगों की तरह।
इसके कँटीलेपन में भी
एक कोमलता का एहसास है
एहसास है
सच्चे होने का।

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2-मशीन होने का भ्रम

कभी- कभी जब
होने लगता है भ्रम
अपने मशीन होने का
तो खुद अपने पैरों में
देख लेती हूँ
काँटा चुभोकर
अपनी उँगली को
दाँतों से काटकर
और दर्द होने पर
मुस्कुरा देती हूँ
कि चलो
जिन्दा हूँ अब भी।

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3-प्रेम वृक्ष

प्रेम- वृक्ष
मेरे मन का
बड़ा ढीठ है
तुम बार_ बार काटते हो इसे
पहले तुमने टहनियां काटीं
वे फिर उग आईं।
शाखाएँ काटीं
वे भी फिर उग आईं
परेशान होकर तुमने
इसे तने से काटा
जड़ से भी काटा
पर ये ढीठ
फिर उग आया
फूट आईं कोंपलें फिर।
जब भी काटा
हर बार

फिर फिर
पनप ही आता है
पनप ही आएगा
कहो क्या किसी सूरत
मिटा सकोगे इसे
सदा के लिए?

मन की गहराई में दबा
प्रेम- बीज कैसे निकल पाओगे।
ये तो पनपता ही रहेगा
मेरे भावों का हवा -पानी पाकर
मेरे आँसुओं की नमी पाकर।

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