हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मुझे मीलों चलना है - डॉ.कविता भट्ट

धूप में तपते हुए बर्फ-सा पिघलना है

चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है। 

 

 लहरों में बह जाऊँ; तिनका नहीं   

नयनों में रह जाऊँ; सपना नहीं 

मैं बीज धरा के गर्भ में संघर्षण   

ताप-दाब सह होगा मेरा अंकुरण । 

 

 पहाड़ी-सीना चीर; वट-जैसा पलना है

चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है।

 

 कंटक या पुष्प करें आलिंगन   

नित जीवन करता अभिनन्दन

दूब जड़ों- सी हठ है; प्रति पल

कितना भी कर डालो उन्मूलन

 

  पथरीली माटी को चन्दन ज्यों मलना है

चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है।

 

 जीवन राग सुनाती; हरीतिमा में ढली

नन्ही कोंपले दूब की संघर्षो में पली

शुभ होती,  यही हर पूजन में चढ़ती

जीवनदायी नैनों को, निशिदिन बढ़ती

 

 सत्पथ पर ठोकर खा,प्रतिपल सँभलना है  

चिरनिद्रा से पूर्व मुझे मीलों चलना है ।

-0-( डॉ० कविता भट्ट,हे० न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय ,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)