हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मेजर कर्तार सिंह - अनिता मण्डा

1857 में हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को तत्कालीन फिरंगी सरकार ने ‘गदर’ की संज्ञा देते हुए सत्ता की डोर सीधे तौर पर अपने हाथ में ले ली और यह सुनिश्चित करने के लिए कि भविष्य में करतार सिंह सराभाऔपनिवेशिक प्रजा स्वतन्त्रता प्राप्ति का दुस्साहस न करे इसलिए दमन चक्र चलाये रखा। परन्तु स्वतंत्रता की जो अलख युवाओं के हृदय में जल चुकी थी वो बुझने वाली नहीं थी। भारत की स्वतंत्रता के लिए न केवल भारत में अपितु भारत से बाहर भी प्रयास होने लगे। जिसका कारण यह भी था कि अंग्रेजों ने भारत का अधिक से अधिक आर्थिक दोहन किया। यहाँ से कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जिससे कि यहाँ के उधोग धंधे नष्ट हो गए। पूरे देश में रेलों का जाल बिछाया व सामन्तों को अपना सहयोगी बनाकर किसानों का भयंकर उत्पीड़न किया। 19 वीं सदी तक आते आते महाराष्ट्र, बंगाल व पंजाब की दशा खराब होने लगी व छुटपुट विद्रोह होने लगे। 20 वीं सदी के आरम्भ में पंजाब के किसान कनाड़ा, अमेरिका की ओर देश से बाहर मजदूरी के लिए जाने लगे। मध्यवर्गीय छात्र भी शिक्षा-प्राप्ति हेतु इंग्लैंड व अमेरिका जाने लगे।
1900 से लेकर 1907 तक कनाड़ा में 6000 के लगभग भारतीय पहुँच गए। इनमें से अधिकांश पंजाबी सिख किसान थे। इन्होंने अपनी मेहनत से वहाँ बहुत सम्पत्ति अर्जित कर ली। 1909 में कनाड़ा में प्रवेश के कानून कड़े कर दिए गए।
ये प्रवासी भारतीय विदेशों में पहुँच कर वहाँ स्वतंत्र आबोहवा से परिचित और प्रभावित हुए। विदेशों में जाकर भारत की आज़ादी की चेतना जगाने वाले भारतीयों में एक प्रमुख नाम लाला हरदयाल का था जो बाद में ‘गदर पार्टी’ के मस्तिष्क और प्रथम महासचिव बने। लाला हरदयाल सिंह अत्यंत मेधावी थे, उन्हें शोध के लिए ऑक्सफोर्ड में छात्रवृति मिली थी लेकिन देशभक्ति के जज़्बे से प्रभावित होकर 1907 में छात्रवृति त्याग दी व 1907 में श्याम जी कृष्ण वर्मा , सरदारसिंह राणा आदि के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। लाला हरदयाल सिंह को सेनफ्रांसिस्को में बुलाया गया जहाँ उन्होंने संगठित हो रहे भारतीयों को वैचारिक दिशा प्रदान की। उनके भाषणों से प्रभावित होने वालों में सराभा भी थे।

कर्तार सिंह का जन्म 24 मई, 1896 को सराभा गाँव जो कि लुधियाना शहर से 15 मील दूर है में हुआ। पिता मंगल सिंह का बचपन में ही निधन हो गया। माता साहिब कौर ने व दादा बदन सिंह ने पालन-पोषण किया।
कर्तार सिंह का परिवार शिक्षित था, चाचा सरकारी पदवियों पर कार्यरत थे। प्रारम्भिक शिक्षा के बाद कर्तार सिंह उड़ीसा में अपने चाचा के पास पढ़ने गए, यह प्रान्त राजनितिक रूप से अधिक सचेत था। वहाँ ज्ञानार्जन के बाद वो अध्ययन हेतु अमेरिका गए।
1 जनवरी 1992 को सराभा अमरीका पहुँचे। वे अपने गाँव के ही रुलिया सिंह के पास ही रुके जो कि 1908 से अमेरिका में थे। अमेरिका में कई घटनाएं ऐसी हुई जिनसे सराभा में आजादी की प्रबल उत्कण्ठा जगी। सेन फ्रांसिस्को बंदरगाह पर उतरते ही उनको एक अधिकारी ने आने का कारण पूछा और रोका गया लेकिन अपने तर्कपूर्ण उत्तर से अधिकारी को संतुष्ट किया व बर्कले विश्वविधालय में शिक्षा प्राप्ति को अपना उद्देश्य बताया।
अमरीका प्रवास के दौरान वो एक बुजुर्ग महिला के घर किरायेदार रहे और उन्हें अपने देश के स्वतंत्रता दिवस पर अपना घर सजाते, वीर नायकों के चित्र सजाते देखा तो उनकी इच्छा हुई हमारे देश में भी आजादी का दिवस होना चाहिए। भारत से अमरीका गए लोगों में ज्यादातर पंजाबी थे कनाड़ा व अमेरिका में इनके साथ भेदभाव व नस्लवादी बर्ताव होता था। इसके विरुद्ध वहाँ संत तेजासिंह और जवालसिंह ठट्टीआं संघर्ष थे।
कर्तार सिंह एक भारतीय मजदूर सम्मेलन में इनके सम्पर्क में आये व इनके प्रोत्साहन से बर्कले विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। बर्कले के लगभग 30 विधार्थी दिसंबर 1912 में लाला हरदयाल सिंह के सम्पर्क में आये। जिससे इनके मन में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ भावनाएँ पैदा हुई व देशभक्ति की भावना का जन्म हुआ।
1912 में पोर्टलैंड में भारतीयों की सभा की गई जिसमें हरनाम सिंह, कोटला नोधसिंघ, पंडित काशीराम, सोहनसिंह भकना, जी डी कुमार आदि शामिल हुए।
‘हिंदुस्तान एसोसिएसन ऑफ़ पेसिफिक कोस्ट’ नाम से संस्था बनी। इस संस्था की ओर से निमंत्रण पाकर मार्च 1913 में सेंट जॉन लाला हरदयाल पहुँचे और सदस्यों को वैचारिक प्रशिक्षण दिया और इस बात पर बल दिया कि 1857 के ‘ग़दर’ की तरह एक और ‘ग़दर’ की जरूरत है। इस संस्था की कई मीटिंगें हुई जिनमें ज्वाला सिंह ठट्टियां, वसाखा सिंह ददेहर, संतोख सिंह धरदेव, पंडित जगतराम, कर्तार सिंह सराभा आदि सक्रिय थे। इसके मुखपत्र ‘ग़दर’ के नाम से ‘गदर पार्टी’ के रुप में ही इतिहास प्रसिद्ध हो गया। इसके कार्यालय का नाम ‘युगांतर’ रखा गया।
1 नवम्बर, 1913 को गदर पार्टी का स्थापना दिवस मनाया गया। गदर अखबार के लिए कर्तार सिंह सराभा ने सक्रियता दिखाई। शुरू में इसकी 2500 प्रतियाँ पंजाबी में व 2200 प्रतियाँ उर्दू में निकाली गई। 1916 में विश्वभर में गदर के 10 लाख प्रति वितरण का उल्लेख भी उन्होंने किया। लाला हरदयाल को मार्च, 1914 को अमेरिका छोड़ना पड़ा।

सम्पादन का कार्य- गदर अखबार के प्रबंधन में कर्तार सिंह सराभा की भूमिका बहुत अहम थी। जगजीत सिंह ने पंजाबी में प्रकाशित ‘गदर पार्टी लहर’ में उन्हें ‘इंसानी बिजली का इंजन’ कहा है, जो अपने जोश और उत्साह से अपने साथियों में भी जोश भर देते थे। उनको घर से शिक्षा-प्राप्ति के लिए जो पैसे मिले वो भी उन्होंने गदर अखबार के प्रकाशन के लिए लाला हरदयाल को सौंप दिए। वो अखबार का सांगठनिक काम भी देखते थे और गदर अखबार की किताबत करते, उसका पंजाबी में अनुवाद करते और डाक से अख़बार भेजने का काम देखते। इस समय वे मात्र सत्रह साल के थे।
वो अक्सर यह कहा करते थे
‘कठिन है वतन परस्ती को निभाना
बहुत आसान है बातें मिलाना
उन्होने झेली हैं यहां लाखों मुसीबतें
जिनको पग मुल्क की खातिर बढाना’

‘गदर’ और ‘हिन्दुस्तान गदर’ से चुनकर ‘गदर दी गूंज’ शीर्षक से क्रमांक 1 से 7 तक कविता संकलन छापे गए।

कामागाटामारू जहाज की घटना-
पंजाबी किसानों ने कनाड़ा में अपनी मेहनत से काफी सम्पत्ति अर्जित की, जो कनाड़ा सरकार के लिए असहनीय थी , इन किसानों को निरंतर सरकार से संघर्ष करना पड़ा। सरकार ने 1909 में आव्रजन निति में कड़ाई का रुख किया। कनाड़ा के तटों पर समुद्री जहाज से पहुंचे भारतीयों को उतरने नहीं दिया जाता था।
इसी संदर्भ में मलाया के धनी ठेकेदार बाबा गुरदित्त सिंह ने भारतीयों की सहायता की लिए ‘गुरु नानक नेविगेशन कंपनी’ बनाकर कामागाटामारू नाम का जापानी जहाज किराये पर लिया। 4 अप्रैल 1914 को 376 भारतीयों को लेकर हांगकांग से कनाडा गया। पर वहाँ इसके एक भी यात्री को उतरने नहीं दिया गया। दो महीनों तक भारतीय संघर्ष करते रहे। अंततः विवश होकर 23 जुलाई 1914 को यह जहाज कनाडा से रवाना होकर 29 सितंबर, 1914 को कोलकाता के बजबज घाट पहुंचा व ब्रिटिश सरकार के बर्बरतापूर्ण रवैये में 20 यात्री शहीद हुए, जिनकी याद में बजबज घाट में स्मारक बनाया गया। 32 के लगभग भाग गए इनमें गुरुदत्त सिंह भी थे। 203 को जेल भेजा, 60 के करीब पंजाब भेज दिए गए। इस घटना ने भारत में गदर आंदोलन के लिए भूमिका तैयार की, व प्रवासी भारतीय बाहर से हथियार लाये।
जुलाई, 1914 ई. में जब प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ तब अंग्रेजों की स्थिति युद्ध में अच्छी नहीं थी। गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सोचा इस समय भारत में लोगों को संगठित करके विद्रोह हो जाये तो अंग्रेजों से आज़ादी मिल सकती है। गदर पार्टी के समर्पित लगभग 4 हजार सदस्य जो अमेरिका में रह रहे थे, इसके लिए तैयार हो गए व अपनी समस्त सम्पत्ति दाँव पर लगाकर गोला बारूद और पिस्तौलें खरीद कर भारत आने का फैसला लिया।लेकिन उपयुक्त गोपनीयता नहीं बरतने से ब्रिटिश सरकार सतर्क हो गई व बहुत सारे लोगों को व युद्ध सामग्री को भारत में प्रवेश करते ही ज़ब्त कर लिया गया। कर्तार सिंह सराभा बाकी गदरियों से महीना भर पहले ही 15-16 सितम्बर 1914 को कोलम्बो तट पर पहुंच गए। जो लोग पुलिस के हाथ नहीं आये उनमें सराभा, हरनाम सिंह, निधान सिंह चुग्घा, भाई भगत सिंह, पृथ्वी सिंह, पं. जगतराम, भाई परमानंद झाँसी, भाई जगत सिंह, हाफ़िज अब्दुल्ला व बीबी गुलाब कौर आदि थे।।
गदर पार्टी के कार्यकर्ता जिस माहौल की उम्मीद में भारत आये थे उसके विपरीत यहां लोग सुप्तावस्था में थे। लेकिन सराभा हार मानने वालों में से नहीं थे।
18 वर्ष की आयु में ही सराभा ने गदर क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे थे। वो अथक और निर्भय योद्धा थे। गदर पार्टी का कार्यस्थल पंजाब था। सराभा यहीं एक स्कूल में पढ़े थे, उन्होंने सबसे पहले छात्रों से ही संपर्क स्थापित किया। उनकी प्रेरणा से सज्जन सिंह नारंगवाल, कृपाल सिंह बोपाराय, पूरन सिंह आदि छात्र पढ़ाई छोड़ कर गदर आंदोलन में शामिल हो गए। इन्हीं छात्रों की मदद से ‘गदर’, ‘गदर दी गूँज’, ‘ऐलाने-जंग’ आदि साहित्य छाप कर प्रचारित किया जाता था। रामसरणदास के साथ मिलकर सराभा ने क्रांतिकारियों से सम्पर्क किया। सराभा ने बंगाल जाकर सुरेन्द्र नाथ बनर्जी से तथा फिर रासबिहारी बोस से संपर्क किया। बाद में रासबिहारी बोस भी पंजाब आये।
रास बिहारी बोस जब पंजाब आये तब तय किया कि समस्त भारत में फौजी छावनियों में एक ही समय में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करेंगे। सराभा ने छावनियों में घुम-घुम कर विद्रोह के लिए छावनियों में जागरूकता पैदा की व लाहौर, फिरोजपुर, लायलपुर एवं अमृतसर की छावनियों में घूमे। क्रांतिकारियों ने हथियार लूटने की व खजाने लूटने की योजना बनाई पर बुरी तरह से मिशन असफल रहे।
फिरोजशाह कांड के दो गदरी मारे गए व सात पकड़े गए। जिन्हें 1915 में लाहौर जेल में फांसी दी गई।असफलता निराशाजनक थी पर सराभा में हिम्मत नहीं हारी। शचीन्द्र नाथ सान्याल ने कहा “यदि कोई सचमुच काम करने वाला है तो कर्तार सिंह है।”
सान्याल ने काशी के साथ लाई कुछ पिस्तौलों की खेप देकर सराभा की हथियारों की मांग को पूरा किया। 31 दिसंबर को अमृतसर की एक धर्मशाला में बैठक में हथियार संग्रह करने, चंदा इक्ट्ठा करने, सैनिकों को प्रेरित करने, बम बनाने व डकैतियां डालने जैसी गतिविधियों पर विचार किया गया।
रास बिहारी बोस 26 जनवरी, 1915 को पंजाब पहुंच गए। वे छद्म वेश में लाहौर में एक मकान में रहते थे। सराभा उनसे सम्पर्क में थे। पहले 21 फरवरी 1915 का दिन समस्त भारत में क्रांति के लिए निश्चित किया गया था। लेकिन कोई गुप्तचर क्रांतिकारी दल में मिल गया जिससे 15 फरवरी को ही भेद खुल गया और 16 से ही क्रांतिकारियों की गिरफ्तारियाँ शुरू हो गई। रास बिहारी बोस किसी प्रकार वाराणसी होते हुए कलकत्ता चले गए। और वहाँ से छद्म नाम से पासपोर्ट बनाकर जापान चले गए।
यहाँ से सराभा व साथियों ने लाहौर की गाड़ी पकड़ी व अफगानिस्तान की सीमा पर पहुंचे पर फिर इरादा किया कि वापस पंजाब जाकर क्रांतिकारियों को संगठित करना चाहिए। गदर में छपी कविता की तुकें गाने लगे-
जान जावे, आण नूं न जावो तज के
बणी सिर शेरां दे की जाणा भज्ज के।
( जान जाए, आन जाओ तज कर
बनी शेरों के सिर क्या जाना भाग कर)
सराभा को ये विचार आते ही वे वजीराबाद की फौजी छावनी में आये और भाषण दिया।
” भाइयों, अंग्रेज विदेशी हैं, हमें उनकी बात नहीं माननी चाहिए। हमें आपस में मिलकर अंग्रेजी शासन समाप्त कर देना चाहिए।”
सराभा ने गिरफ्तार होने के लिए यह भाषण दिया था और उनको गिरफ्तार कर लिया गया।
करतार सिंह सराभा पर हत्या, डाका, शासन को उलटने का अभियोग लगाकर ‘लाहौर षड़यन्त्र’ के नाम से मुकदमा चलाया गया। उनके साथ 63 दूसरे आदमियों पर भी मुकदमा चलाया गया था। सराभा ने अदालत में अपने अपराध को स्वीकार करते हुए ये शब्द कहे, “मैं भारत में क्रांति लाने का समर्थक हूँ और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमेरिका से यहाँ आया हूँ। यदि मुझे मृत्युदंड दिया जायेगा, तो मैं अपने आपको सौभाग्यशाली समझूँगा, क्योंकि पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार मेरा जन्म फिर से भारत में होगा और मैं मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए काम कर सकूँगा।” जज ने उन 63 व्यक्तियों में से 24 को फाँसी की सज़ा सुनाई। जब इसके विरुद्ध अपील की गई, तो सात व्यक्तियों की फाँसी की सज़ा पूर्ववत् रखी गई थी। उन सात व्यक्तियों के नाम थे- करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले, काशीराम, जगतसिंह, हरिनाम सिंह, सज्जन सिंह एवं बख्शीश सिंह। फाँसी पर झूलने से पूर्व सराभा ने यह शब्द कहे-
‘हे भगवान मेरी यह प्रार्थना है कि मैं भारत में उस समय तक जन्म लेता रहूँ, जब तक कि मेरा देश स्वतंत्र न हो जाये।’
16 नवम्बर, 1915 ई. को सराभा हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गये। जज ने उनके मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए कहा था, “इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिन्दुस्तान तक अंग्रेज़ शासन को उलटने का प्रयास किया। इसे जब और जहाँ भी अवसर मिला, अंग्रेज़ों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न किया। इसकी अवस्था बहुत कम है, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के लिए बड़ा भयानक है।”
भाई परमानन्द जी ने सराभा के जेल के जीवन का वर्णन करते हुए लिखा है, “सराभा को कोठरी में भी हथकड़ियों और बेड़ियों से युक्त रखा जाता था। उनसे सिपाही बहुत डरते थे। उन्हें जब बाहर निकाला जाता था, तो सिपाहियों की बड़ी टुकड़ी उनके आगे-पीछे चलती थी। उनके सिर पर मृत्यु सवार थी, किन्तु वे हँसते-मुस्कराते रहते थे।” भाई परमानन्द जी ने सराभा के सम्बन्ध में आगे और लिखा है, “मैंने सराभा को अमेरिका में देखा था। वे ग़दर पार्टी के कार्यकर्ताओं में मुख्य थे। वे बड़े साहसी और वीर थे। जिस काम को कोई भी नहीं कर सकता था, उसे करने के लिए सराभा सदा तैयार रहते थे। उन्हें कांटों की राह पर चलने में सुख मालूम होता था, मृत्यु को गले लगाने में आनन्द प्राप्त होता था।”
फांसी की सुबह भी बराबर की कोठरी से पं. परमानन्द झांसी के यह पूछे जाने पर कि ‘कर्तार सिंह’ क्या कर रहे हो ? तो सराभा ने कहा ‘एक कविता लिख रहा हूँ।’ कर्तार सिंह सराभा के जीवन की हर सांस वास्तव में देशभक्ति की कविता ही थी।
पूरा भारत अमर बलिदानी भगतसिंह की शहादत दिवस को मनाता है लेकिन भगत सिंह ने जहाँ से प्रेरणा ली व जिनको गुरु बनाया वे कर्तार सिंह थे। करतार सिंह सराभा को अपना गुरु का दर्जा प्रदान करने वाले सरदार भगत सिंह का कहना था कि ‘क्रांति तो करतार सिंह सराभा की रग रग में रवां रही थी’। वस्तुतः करतार सिंह सराभा क्रांति की खातिर जिंदा रहे और क्रांति के लिए ही बलिदान हो गए।
करतार सिंह सराभा की यह गज़ल भगत सिंह को बेहद प्रिय थी वे इसे अपने पास हमेशा रखते थे और अकेले में अक्सर गुनगुनाया करते थे:
“यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,
मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा;
मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,
यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा;
मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,
यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा;
मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा;
तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,
तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जाविदां मेरा.”
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अनिता मण्डा-1सम्पर्क- अनिता मंडा,आई-137 द्वितीय तल, कीर्ति नगर
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