हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

मेरी कविता - सुरजीत पातर

डॉ सुरजीत पातर आज के समय में एक नामवर पंजाबी शायर हैं। उनका जन्म 14 जनवरी 1944 को पंजाब में पत्तड़ कलाँ (जालन्धर) में हुआ। अपने गाँव के नाम से ही उन्होंने अपने नाम के साथ पातर जोड़ लिया। आपने 1960 में कविता का प्रकाशन शुरू किया। आपने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से एम ए (पंजाबी) तथा गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर से पी एच डी की। आप पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना में अध्यापन के कार्य से सेवानिवृत हुए। पंजाबी शायरी में उनकी कुछ किताबें हैं – हवा विच लिखे हर्फ़, बिरख अर्ज़ करे, हनेरे विच सुलगदी वर्णमाला, लफजां दी दरगाह, पतझड़ दी पाजेब तथा सुर -ज़मीन। आप पंजाबी साहित्य अकैडमी के प्रधान भी रह चुके हैं। आपको 2012 में साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान प्राप्त हुआ। 

डॉ हरदीप सन्धु(अनुवाद; डॉ हरदीप सन्धु)

मेरी माँ को मेरी कविता समझ न आई

चाहे मेरी मात्र -भाषा में लिखी हुई थी

वह तो केवल इतना समझी

पुत्र की रूह को दुःख है कोई

मगर इसका दुःख मेरे होते

आया कहाँ से

गहनता से देखी

मेरी अनपढ़ माँ ने मेरी कविता

देखो लोगो

माँ को छोड़कर

दुःख कागज़ से बतियाते हैं

मेरी माँ ने कागज़ उठाकर सीने लगाया

शायद ऐसे ही

कुछ मेरे करीब हो

मेरा जाया !

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