हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

यादों का कारवाँ – ज़िन्दगी भर का सफ़र - सुमन कुमार घई

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1-समीक्षाविदेश में रहने वाले
लेखकों की सबसे बड़ी समस्या है कि वह अक्सर उस साहित्यिक समय में जीते रहते हैं जिस समय में वह विदेश में आए थे। मैं साहित्यिक गुणवत्ता की बात नहीं कर रहा, बात समय की है। साहित्य निरन्तर समय के साथ चलता है, बदलता है और अपने सृजन के समय आवाज़ बनता है। जब किसी लेखक की कलम में उसकी मौलिकता, आधुनिकता झलके तो उसे पढ़ने को मन करता है। विजय सूरी कैनेडा के एक ऐसे ही लेखक हैं जो एकाकी कविता सृजन करते रहे हैं और इसी कारण उनकी कविता मौलिक है – उस पर किसी अन्य कवि के लेखन की झलक नहीं है।
कैनेडा में बरसों से बसे लेखक विजय सूरी “अज़ीज़” की ज़िन्दगी का भावनात्मक दस्तावेज़ ‘यादों का कारवाँ’ ज़िन्दगी भर का सफ़र है। उनकी कविता उनके दैनिक अनुभवों, अध्यात्मिक विचारों, पारिवारिक संबंधों और प्रेम के विभिन्न रंगों को कलमबद्ध करती है।
सब कुछ बुझा बुझा और दिल में परेशानी
दोस्तों की शायद हुई है मुझ पे मेहरबानी
प्रायः जीवन में मित्रों के संबंधों में आई खटास से मन में खिन्नता पैदा होती है, जिन्हें हम सभी महसूस कर चुके हैं। विजय सूरी सीधे-सपाट शब्दों में, परन्तु सुन्दरता से कहते हैं।
“यादों का कारवां” में विजय सूरी की बहुत सी कविताएँ प्रेमिका को संबोधित हैं। इसमें सौन्दर्य रस के कोमल भाव भी हैं और विरह की कसक भी। परन्तु इन दोनों की रसों की कविताओं का अंत साकारात्मक ही है। अपनी कविता “तसुव्वर” में प्रेमिका से दूर होने के बाद भी वह अपने तसव्वुर में उसे अपने पास ही पाते हैं –
“आज भी मैं
तेरे जिस्म की गर्मी महसूस करता हूँ
तेरी जुल्फ़ों की महक
फैली है चारों तरफ
अभी महफूज़1 है यहाँ
मेरे कदमों के निशां
जिन्हें वक़्त मिटा सकता नहीं है
तसुव्वर में लेखक प्रेमिका से जुदा हो ही नहीं सकता, न काल का बंधन है न स्थान की रुकावट प्रेमिका तो तसुव्वर के आग़ोश में अभी भी लिपटी हुई है। आलम यह है कि कवि कहता है –
“उस मकाम पे आके रुका है/ मुहब्बत का काफ़िला
जहाँ तेरी इन्तज़ार/नहीं है करनी होती
जब भी दिल /तुमको देता है आवाज़
तू पलभर में /मेरे तसुव्वर में चली आती है
कौन कर सकता है /तुमको मुझसे जुदा”
इसी तरह ट्यूलिप के फूल कविता में प्रेमिका के बिछुड़ने के बाद में कवि ट्यूलिप के फूलों द्वारा अपनी प्रेम की डोरी को टूटने नहीं देता –
“बरसों पहले मैंने तुमने मिलकर/घर की बगिया में
ट्यूलिप के फूल लगाए थे/उनकी ताज़गी और रंगों का मज़ा
साथ-साथ हमने/ महसूस किया था
और हैरान होकर सोचा भी था/ कि खाक में लिपटे हुए
इन्हें बहार का एहसास होता है कैसे
X X X X
अब तुम्हारा साथ नहीं है
तुम जहाँ भी हो –
मुझे यकीन है
तुमने भी …
ट्यूलिप ज़रूर लगाए होंगे
और उन्हें देख कर
मुझे भी याद किया होगा”
विजय सूरी की बहुत सी प्रेम रस की कविताओं में एक कहानी सी भी कही गयी है, जो कि मन के कोमल भावों को छूती है। उदाहरण के लिए उनकी कविता “दस्तक” की कुछ पंक्तियाँ देखिए –
“मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं
तुम्हारी ज़िन्दगी में नए रंग भरूँ
उसको फिर से रंगीन करूँ
तुम्हारी एक नई तस्वीर बनाऊँ
तुम्हारे अतीत को आज में तबदील करूँ
और कविता के अंतिम चरण में कवि/कहानीकार कहानी को समेटते हुए कहता है –
“मुद्दतों बाद आज तुमने
दरवाज़े पे दस्तक दी है
रंग तो कबके बिखर गए हैं
अरमान कब से खफ़ा हैं मुझसे
आज क्या खाक नई तस्वीर बना पाऊँगा
यही सोच कर
दरवाज़ा नहीं खोला है”
आगे इसी रस में पगी कविता “कहीं दूर चलें” कविता की पंक्तियों में भाव की कोमलता देखिए –
“चलो कहीं दूर चलें/चन्द लम्हें1 चुरा कर
सिर्फ़ अपने लिए।/आओ कुछ जी लें”
प्रेम की चाँदनी की नर्मी के साथ विरह की कठोरता भी जीवित रहती है। कवि “ग़म के बादल” कविता में समाज को अपनी स्थिति का दोषी मानते हुए कहता है –
“ऐसा माहौल पैदा किया है ज़माने ने
बन्द हूँ कफ़स में और आँसू बहाता हूँ”
फिर ख़ुदा से शिक़ायत करते हुए “अज़ीज़” साहिब कहते हैं –
“ये कैसे तेरे इन्सां हैं
ये कैसी तेरी दुनिया है
दुःख भी है इस बात का
कि मैं भी इसमें रहता हूँ”
काव्य संग्रह में आगे चलते हुए “कल और कल” में आशा उभरती है और कवि कह उठता है –
“क्या खोया है
क्यों सोचें इसके बारे में
गुज़रे वक़्त ने जो कफन ओढ़ा है
उसे वैसे ही रहने दो
हट जाएगा तो दुख होगा
क्या खोया, नहीं…
क्या पाया है इसका कुछ विचार करो”
“परिचय” कविता में इन्सान के कई चेहरों की बात करते हुए विजय सूरी अपने आपको को भी भीड़ का हिस्सा मानते हैं –
“जब तुम पूछते हो मुझसे मेरा परिचय
मैं क्या तुम्हें बतलाऊँ
मैं क्या सच्च बोलूँ
मैं क्या झूठ कहूँ
इसलिए खामोश हूँ”
काव्य संग्रह का एक दार्शनिक/अध्यात्मिक पक्ष भी है जिसमें विजय सूरी परमात्मा के अस्तित्व, गीता के सार और जीवन इत्यादि के बारे में अपने विचारों या अपनी आस्था को कविता के माध्यम से पाठक तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। “नज़र आता है” में कवि स्वीकार करता है कि परमात्मा निराकार है परन्तु फिर भी –
“वो नज़र भी आता है
पर सिर्फ़ देखने वालों को
कुदरत की फिजाओं1 में
रंगीन नज़ारों में
और जिनके दिल में
सच्चा प्यार है उसके लिए
वो उसे छू भी सकते है”
ज़िन्दगी की परिभाषा देते हुए विजय सूरी ने लिखा है –
“ज़िन्दगी एक साज है
जो साँसों की ताल पर
हर रंग में डूबे हुए नगमें गुनगुनाती है”
और फिर ज़िन्दगी की एक अन्य परिभाषा –
“ज़िन्दगी एक नशा है
लापरवाह, बेफिक्र
मस्तियों से जिसकी गहरी दोस्ती है
जीना और हर हाल में जीना
जब तलक मौत आवाज़ न दे
जीना ही उसका काम है”
इसी तरह कई कविताओं में आशाजनक, साकारात्मक फ़लसफ़ा कविता में गुँथा है। अक़्सर आप्रवासी कवियों कि कविता में स्वदेश से दूरी का दुःख दिखाई देता है। वतन से दूर कविता के आरम्भ में भी ऐसा ही होता है परन्तु अंत तक आते-आते कवि आप्रवासी लेखकों की भीड़ से अपने आपको अलग करते हुए कहता है –
“आसमां तो वैसे ही नीला है
वही पुराना सूरज है
वही पुराना चाँद
वही ज़िन्दगी है वही मैं हूँ
जो भी हुआ अच्छा ही हुआ
यहाँ पर भी मैं –
एक जन्नत बनाऊँगा
और पहले की तरह –
ख़्वाबों में खो जाऊँगा!”

“जन्मदिन” मनाते हुए अपनी औलाद के प्रति स्नेह की अभिव्यक्ति एक पिता ने सीधे-सादे शब्दों में की है परन्तु इसमें वातस्ल्य सभी भावों को समेट लिया है –
“किस नाम से पुकारूँ तुम्हें मैं
जो भी नाम लबों पर आता है
शहद से मीठा हो जाता है
अमृत के घूँट पिलाता है”

काव्य संग्रह में क्षणिकाएँ भी हैं परन्तु साहित्यिक दृष्टिकोण से अभिव्यक्ति की डोर उतनी ही कसी हुई है। उदाहरण “शबनम” का है। चार पंक्तियों में पूरी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा, जीवन की सुंदरता और अमरता की अदम्य इच्छा को कलमबद्ध किया है विजय सूरी ने –
“एक गुलाब के फूल से लिपटी
शबनम2 ने सूरज से कहा
आज कुछ थोड़ी देर बाद निकलना
मैं ज़रा सा और जीना चाहती हूँ”
अंत में “यादों का कारवां” यूँ ही चलता रहेगा क्योंकि
“यादों की महफ़िल मैं हर शाम सजा लेता हूँ
जाने पहचाने चेहरे उभरते रहते हैं
भूली बिसरी उम्मीदों से
मैं देर रात तक बातें करता हूँ
यादों का कारवां चलता रहता है”
विजय सूरी इतने एकाकी कवि रहे हैं कि कैनेडा के साहित्यिक समाज में भी उनका नाम अनजाना है। आशा है कि यह पुस्तक उन्हें कैनेडा के साहित्यिक जगत में उन्हें उनके उचित स्थान पर स्थापित करेगी।
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