हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

यादों वाला पिटारा - डॉ.भावना कुँअर

हौले से आया
दबे पाँव लेकर

डॉ.भावना कुँअर
डॉ.भावना कुँअर

ख्वाबों में मेरे
मेरी अम्मा का गाँव
बिना दस्तक
सपनों के दर पे
रख के गया
सुनहरी यादों के
चमचमाते
जुगनू से दीपक।
पहले लाया
पिटारे से अपने
मीठे से आम
नीम की निबौंलियाँ
जामुन,बेर
मक्खन और छाछ
गरम गुड़
अनोखा बड़ा स्वाद।
बैलों की जोड़ी
घुँघरुओं की बोली।
कुएँ का पानी
परियों की कहानी।
जली-बुझी सी
डिबिया की वो बाती
न बन पाती
जो पतंगों की साथी?
दूजा पिटारा
कचरे और फूँट
मेडों से कहे
वो किस्से भरपूर।
मकई रानी
ओढ़कर दोशाला
शान से खड़ी
है सेक रही धूप।
पोई की बेल
छत पे चढकर
नीचे न आती।
तीजा पिटारा जब
वो खुल जाए
भीनी माटी गंध को
खूब फैलाए।
तीज,होली, दीवाली
तो मेले कभी
जाने कितने रंग।
चौथा पिटारा
चुप न रह पाए।
मीठी गुँझिया,
खोया ओढ़े घेवर
है इतराए।
फूले न समाते थे
नीम के पेड़
चलती थी उनपे
झूलों की रेल।
कितने अनोखे थे
सारे ही खेल।
अब फ्रोजन खाते,
डिबिया नहीं
बल्ब टिमटिमाते।
पेड़ भी नहीं,
बोनसाई सजाते।
न मीठा पानी
बिजलेरी ही लाते।
अगले साल
उस गाँव जाऊँगी
बिना बताए
यादों वाला पिटारा-
अम्मा की बुनी
रंगबिरंगी लोई,
दरी,गलीचा
रंगीन टोकरियाँ
सब लाऊँगी
सूने मन के कोने
फिर हरषाऊँगी।
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