हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

4 लघुकथाएँ - डॉ.मीना गुप्ता

1- माँ का डर

 माँ-बहु के झगड़े को लेकर घर में माहौल गरम हो रहा था ।  इसीलिए रात मे घर के सारे सदस्यों ने बैठक की । सभी अपनी-अपनी समझदारी के दाव-पेंच फेकने लगे …

“ बुढ़ापे में मुँह बंद करके रहना पड़ता है । जब अपने हाथ-पैर साथ नही देते तो चुप रहना पड़ता है । दो रोटी से मतलब रखो । दूसरों में अच्छाइयाँ खोजो तो सुखी रहोगी आदि-आदि ।”

माँ कमरे के कोने में लगे बिस्तर पर बैठी थी ।  कुछ कहने को हुई तो उसे उसकी बड़े  बेटे  ने यह कहते हुए चुप कराया “तुमसे क्या मतलब है घर में क्या हो रहा है क्या नहीं ।”

माँ के होठ कुछ बोलने के लिए फिर हिले, मगर बीच में ही छोटे बेटे ने कहना शुरू किया “ इसकी भी कई आदतें ठीक नहीं है । जैसे – बहू कितना भी अच्छा खाना बनाए कभी तारीफ़ नहीं करेगी । ”

छोटी बेटी ने जानना चाहा- “ माँ ! तुम अच्छी चीज को कभी अच्छा नहीं कहती ऐसा क्यों ?”

बहुत देर से चुप बैठी माँ बोली “ क्या कहूं  कोई चीज मन से अच्छी लग जाती है तो कह देती हूँ । मुझे तारीफ़ करने की याद भी नही रहती है । भूल जाती हूँ ।   दांत  तो हैं नहीं । । जैसे तैसे खाना निगल लेती हूँ । अब तुम लोग कह रहे हो तो याद रखूँगी । ”

माँ की इस सहज-स्वीकृति से सबके चेहरे पर जीत का भाव आ गया और माँ बुझी-बुझी सी बैठी रही ।

बेटा फिर बोला “ मैं दिनभर का थका हुआ आता हूँ । । आते ही वह तुम्हारी शिकायतें करती है । तुम उसे कुछ मत कहो । जो कहना है मुझसे कहो। ”

“ क्या कहूँ ! तुम दिन भर के थके हुए आते हो और फिर अपने बच्चों में व्यस्त हो जाते हो । ” माँ ने डरते हुए कहा और फिर चुप हो गई  ।

देर रात तक समाधान खोजा जाता रहा कि कैसे माँ –बहू  के झगड़ों का निपटान हो । माँ सुन रही थी ।

माँ अब चुप ही थी और बेटा बोल रहा था “ देखो माँ ! तुम्हे अब ये सोचना है कि तुम्हारा बुढ़ापा कैसे कटेगा, इसलिए बस दो  रोटी से मतलब रखो। वह क्या करती है । । कहाँ जाती है । । किससे बात करती है ।  इन सारी बातों से मतलब रखना छोड़ दो । । वो जो दे खालो और भजन करो । ”

माँ उदास हो चली । उसे  लगा जैसे उसकी सारी जरूरतें ,सारे अधिकार बुढ़ापे ने छीन लिये  । उसे अपने घर के मामले में बोलने का कोई हक़ नहीं । क्यों कि वह बूढ़ी हो गई  है, इसलिए उसे सिर्फ दो रोटी से मतलब रखना चाहिए ।

“  माँ !  तुम भी कुछ कहो !” सबसे छोटी बेटी ने माँ के चेहरे पर घिर आयी विषाद की रेखाएँ देख कहा ।

माँ का डर कांपता हुआ बोल पड़ा “क्या कहूँ , जो दो रोटी मिल रही है वह भी छिन जाएगी । ”

   2.  दाग

कॉलेज में मेरा पहला लेक्चर था ।  सारी क्लास मेरी मुरीद हो उठी थी ।  बाहर आते ही एक दादा जैसे दिखने वाले लड़के ने पैर छूते हुए कहा “मैंने सही समय पर कॉलेज ज्वाइन किया शायद आपकी प्रतीक्षा में ही मैंने अब तक एम ए  नहीं किया था । ”

पैर छूने के लिए झुकते समय मैंने उसके कुरते के अन्दर छिपे फरसे को देख पूछा “इसे क्यों रखते हो ?”

वह मुस्कराते हुए बोला “मेरे बहुत दुश्मन है और मैं बहुतों का दुश्मन हूँ । ”

बात को हँसी में टाल मैं घर आ गया । दूसरे दिन अपनी उम्र से बड़े उस विद्यार्थी के किस्से पता चले ।

कसबे के बुद्धि बिलास नामक गुंडे से उसकी गद्दी छीन दुकानदारों से पैसा इकठ्ठा करता है और उसी से वह अपनी बीबी और बच्चों को पालता है । अच्छा खिलाड़ी होने के साथ-साथ वह एक दबंग नेता भी है ।  व्यास दादा नाम से जाना जाता है। कॉलेज के प्रबंधक को उसने चुनाव आदि में बहुत मदद की है इसलिए प्रबंधक उसे मानते हैं ।

वह मुझे भी बहुत मानता रहा । मेरी प्रेरणा से उसने एम  ए और बी एड किया ।  एक दिन कॉलेज से लौटते समय रास्ते में मिल गया मैंने कहा “अब गलत काम छोड़ दो ।  मैं प्रबंधक से बात करता हूँ तुम कॉलेज में ज्वाइन कर लो। ”

बोला “ प्रबंधक मुझे जानते हैं यदि उन्हें नौकरी देना है तो अपने आप देंगे मैं उनसे नौकरी माँगने नहीं जाऊंगा । ”

मैं देर तक उसे समझाता रहा । वह अन्दर ही अन्दर तिलमिलाता रहा मगर चुप रहा । मैंने सोचा मेरी बातें इसे अच्छी नहीं लग रही इसलिए मै “आगे जैसी तुम्हारी मर्जी “ कहकर निकल आया ।

करीब तीन वर्ष उपरान्त हम दोनों संघ के चुनाव हेतु झाँसी गए संयोगवश दोनों एक ही कमरे में ठहराए गए । । सुबह नहाकर जब वह बाथरूम से निकला तो मैंने उसकी जांघ पर एक चकत्ता सा दाग देख पूछा “ व्यासजी ये दाग कैसा ?”

मुस्कराकर बोला “ ये आपकी ही देन है । ”

“ मेरी देन ! समझा नहीं । ”

याद कीजिये एक दिन आप मुझे कॉलेज से लौटते समय रास्ते में मिले थे ।  मुझे नौकरी के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे । मैं उन दिनों बीड़ी पीता था ।  उस दिन अचानक आपको सामने देख मैंने बीड़ी पजामें की जेब में छिपा ली थी । । यह दाग उसी दिन की देन है ।  आप मेरी उस तिलमिलाहट को मेरा आक्रोश समझ मुझसे नाराज हो गए थे और कई वर्ष तक नाराज बने रहे ।

घटना प्रत्यक्ष थी ।  मैं अपनी भूल पर पश्चताप कर रहा था और व्यास दादा  के अन्दर का इंसान खड़ा मुस्करा रहा था ।

3. भाई-दूज

प्रभाती प्रभात होते ही आँगन को मिटटी-गोबर से लीपकर  देर तक निहारती रही और रंगोली सजाकर सोचने लगी “अब दिए की रोशनी से यह चमक उठेगी जिसे देख कान्हा खुश हो जाएगा । ”

देर तक बेटी के साथ रंगोली सजाती  रही  । रंगोली डालते हुए बेटी बोली “ माँ ! आज मजा आएगा । मैं, कान्हा ,मामा और पापा देर तक पटाखे फोड़ेंगे। । आप और मामी बातें करना ।  देखो माँ ! आज मुझे मना नहीं करना ।  मैं देर तक कान्हा के साथ खेलूंगी। ”

शाम हुयी रंगोली पर दिए चमक उठे ।  भाई ने आने में देर कर दी ।  आते ही बोला “ जल्दी से टीका कर दो । मुझे जल्दी जाना है। ”

“ तुम्हे आज कहाँ जाना है ….रुकोगे नहीं ? खाना नहीं खाओगे ?”

“ नहीं…. जल्दी जाना है। । आज इन्होने अपने दोस्तों को बुलाया है । ” भाई की पत्नी बोली ।

“लेकिन। । मैं सभी के लिए खाना बना चुकी हूँ ।  दोस्तों को कल बुला लेना था । ”बुझे स्वर में प्रभाती बोली ।

“ दोस्त लोग साल में एक बार तो आते हैं । । कल सब चले जायेंगे । ” भाई ने चिढ़ते हुए कहा ।

प्रभाती के चेहरे पर भोर से खिली लालिमा अकस्मात् अस्त हो गई… टीका करके वह अपने आंसुओं को झुठलाने की कोशिश में बाहर आयी तो देखा बेटी अपने पटाखे समेट रही है और कह रही है “ माँ !  देखो न रंगोली के दिए इस बार जल्दी बुझ गए । ”

वह चुप रही । बुझे हुए दिए उसने पहले ही देख लिए थे । तेल तो अच्छे से डाला था फिर भी बुझ गए । शायद हवा तेज थी ।

भाई ने हडबडाते हुए पैर छुए और बोला “ जा रहा हूँ । । दोस्त लोग इन्तजार कर रहे होंगे । ”

प्रभाती ने कहना चाहा “ भाई ! इन्तजार तो मैं भी सुबह से कर रही थी और भाई-दूज भी साल में एक बार आती है । ” मगर उसकी आवाज घुटकर रह गई  ।

    4. बच्ची हो गई   है माँ !

माँ भाई के घर आयी है । भाई का घर मेरे घर से तीन किलोमीटर है । शाम को माँ से मिलने गई  । देखा माँ कमजोर हो गई  है । कमर झुक आयी है । त्वचा में झुर्रियाँ आ गई  हैं । मैं दुखी हो गई  यह सोचकर कि । । ।

“ माँ बुड्ढी हो  गई  है । ” थोड़ी देर बात करके मैं वापस आ गई  ।

दूसरे ही दिन माँ से किये गए वादे के मुताबिक मैं उससे मिलने निकली ।  साथ में एक किलो सेब ले लिए और सोचने लगी “ एकदम ताजे कश्मीरी सेब हैं । यदि माँ हर दिन एक सेब खाए तो चमक जायेगी । ”

मेरे  हाथ में सेब देखकर बोली “ इसकी क्या जरुरत है ?”

मैंने कहा “ अब इन सभी की ही जरुरत है तुम्हे । अच्छा खाओगी तभी अच्छी रहोगी । कैसी  दीख रही हो ! ”

घर में अकेली ही है । सुबह बनायी तो शाम खाती है रात बनाई तो सुबह खाती है ।

मेरी बात सुनकर बोली “ मुझे क्या हुआ है ! । मैं ठीक हूँ । ”

तीसरे दिन उसके संदेश पर मैं फिर निकल पडी । घर पहुँची तो देखा सेब ज्यों के त्यों रखे हैं । मैंने पूछा “माँ ! तुमने सेब  नहीं खाए ?”

बोली “ कड़े हैं मुरते नहीं हैं । ”

“ उबालकर खा लेती । ” मेरे इतना कहते ही बोली “ कौन इतना पिचकाट करेगा । ” मैंने सोचा “ थक गई  है माँ !”

“ अच्छा लो यह नमकीन तो मुलायम है खाओ । ” साथ में ले गई  नमकीन देते हुए  मैंने कहा तो उसने पाकेट थामा और अलमारी में रखकर बैठ गई  ।

मैंने पूछा  “ खाओगी नहीं ?”

कहने लगी “ बारीक है प्लेट में लेना पड़ेगा । । फैलेगी बर्तन होंगे । ”

मैंने मुस्कराकर मन ही मन कहा “ माँ कामचोर हो गई  है । ”

बहुत सोचकर मैं एक दिन दूध का कलाकंद लेकर पहुँची । । देते हुए मैंने पूछा “ लो .. यह  मुलायम भी है और फैलेगी भी नहीं । खा लोगी न !”

एक चम्मच लेकर उसने उसे भी अलमारी में डाल दिया ।

“ बस इतनी ही खाओगी !” मेरे पूछने पर बोली “ मिठाई ज्यादा नहीं खाती । ”

“ क्यों शुगर है तुम्हे ?”

नहीं । । मगर डॉक्टर ने कहा है परहेज से रहिए । ।

थोड़ी देर में माँ ने अपने बैग को खोला और चाकलेट निकालकर मुझे देने लगी “ इतनी सारी ! मेरे लिए लाई हो ?”

“ नहीं । । जब दिल करता है तब खाती हूँ । ”

मेरी  नजर अलमारी में रखी मिठाई पर गई  और मैं फिर मुस्करा उठी “ माँ मिठाई नहीं अब चाकलेट खाती है । ”

मैंने पूछा “ मुसम्मी का रस पियोगी ?”

“ नहीं ठंडा होता है । । सर्दी हो जायेगी । ” कहकर उठी और दो गिलास रसना बनाकर एक मुझे देकर दूसरा खुद लेकर पीने लगी ।

मैं आश्चर्य में थी “ तुम रसना पीती हो इससे सर्दी नहीं होगी !”

“इसकी तासीर ठंसी नहीं होती है । । बस पीने में ठंडा लगता है । ”

मैंने जाना माँ अब रसना पीती है । । फलों का रस नहीं ।

एक दिन बोली “ अगले महीने मेरे भतीजे की शादी है । मुझे मालूम होता तो अपनी अच्छी वाली साड़ी लेकर आती । । ”

मैंने कहा “ कोई बात नहीं मैं यहीं से खरीद दूंगी या फिर मेरे पास से ले लेना । ”

“तुम  इंग्लिश कलर पहनती हो । ” कहकर माँ ने जरी बॉर्डर में पिंक सड़ी पसंद की । शादी के एक दिन पहले बोली “मेरे  पास घड़ी नहीं है । समय का अंदाजा नहीं लग पाता जहाँ बैठती हूँ बैठी रह जाती हूँ । ”

और फिर माँ ने अपने सोने के कंगन से मैच करती चमचमाती गोल्डन कलर की घड़ी खरीदी ।

शादी में माँ खुश नजर आ रही थी । । । और बार-बार अपनी नजर घड़ी पर घुमा रही थी ।

माँ समय देख रही थी या फिर कुछ और । । मगर मैं सोच रही थी “ समय निकलने के साथ ही माँ कितनी बदल गई  है । ” बचपन में हमें बरफ का गोला खाने पर मारने के लिए दौड़ पड़ने वाली माँ बरफ की चुस्की चूस रही है !

मैंने मन ही मन कहा “ माँ  बूढ़ी नहीं । । बच्ची हो गई  है । ”

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डॉ.मीना गुप्ता

केंद्रीय विद्यालय डोंगरगढ़ (प्रशिक्षित स्नातक शिक्षिका  )

जिला राजनांदगांव (छत्तीसगढ़ )पिन -४९१४४५

मोबाइल नम्बर -९४०७९४४७७८ ।  ईमेल:mgpt1997@rediffmail। com

शिक्षा –एम.ए. बी.एड.  पीएच.डी.

प्रकाशन –मासिक पत्रिका हंस में कहानी (आदमखोर ) आजकल में कहानी (आँखे नयी मूल्य पुराने )। कथादेश में कहानी बिंदास , सरस्वती सुमन में (मियाँ खुदा को प्यारे हो गए ) कथाक्रम में कहानी –यक्षप्रश्न और लघुकथा -काश तुम सच न कहते  । कल के लिए में –भुला दिया मुझे ।  लघुकथा । कॉम एवं उदंती आदि में अनेक कथाएं प्रकाशित ।इस बार कथादेश का प्रथम पुरस्कार -लघुकथा ‘कोशिश’ पर ।