हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

लद्दाख : सि‍न्‍धु तट का अनछुआ सौंदर्य  - रश्‍मि‍ शर्मा

राँची से दि‍ल्‍ली, दि‍ल्‍ली से लेह। जुलाई माह हमारे घूमने के हि‍साब से सही नहीं ;क्‍योंकि‍ इस वक्‍त बच्‍चों के स्‍कूल खुले होते हैं। मगर कई बरसों से,बल्कि बचपन में जब से पढ़ा था लद्दाख के बारे में, एक बार जरूर जाना है, ऐसी इच्‍छा थी, और यही वक्‍त सही था जब बर्फ ज्‍यादा नहीं पड़ती हों,ताकि‍ लद्दाख की वास्‍तवि‍क सुंदरता हम जीभर कर नि‍हार सके।

अनछुआ सौंदर्य है लेह-लद्दाख का। एक ऐसी जगह जहाँ प्रकृति‍ ने कदम-कदम पर इतना सौंदर्य बि‍खेरा है कि‍ आप अभि‍भूत होकर देखते रह जाएँगे। वैसे तो लेह जाने के लि‍ए मई के अंति‍म सप्‍ताह से सि‍तंबर तक का मौसम अच्‍छा माना है, मगर बर्फीला सौंदर्य देखने के इच्‍छुक लोग सर्दि‍यों में भी जाना पसंद करते हैं। लद्दाख की संस्‍कृति‍ और धार्मिक, ऐति‍हासि‍क वि‍रासत इसे पर्यटकों के आकर्षण का केद्र बनाता है। समुद्र तल से करीब 10,000 कि‍मी की ऊँचाई पर पहुँचकर वहाँ का जो सुंदर अनुभव मि‍लेगा, वो आप जीवनपर्यन्‍त कभी नहीं भूल सकते।

माना जाता है कि‍ लद्दाख कि‍सी बड़ी झील के डूब का हि‍स्‍सा है जो कालांतर में भौगोलि‍क परि‍वर्तन के कारण लद्दाख की घाटी बन गया। लद्दाख का शाब्‍दि‍क अर्थ है ‘दर्रों की जमीन’। जम्‍मू-कश्‍मीर में 14 जि‍ले हैं। छह जम्‍मू, छह कश्‍मीर और दो लद्दाख- (कारगि‍ल और लद्दाख) में। लद्दाख सामरि‍क दृष्‍टि‍ से देश के लि‍ए बहुत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ तीन देशों, भारत, चीन और पाकि‍स्‍तान की सीमाओं का संगम होता है। 1949 में ही यहाँ हवाई पट्टी का नि‍र्माण हो गया था।

अब सवाल है कि‍ लेह कैसे पहुँचा जाए। यदि आप वायुमार्ग से जा रहे हैं तो जम्मू, चंडीगढ़, दिल्ली, श्रीनगर से लेह के लिए इंडियन एयरलाइंस की सीधी उड़ानें हैं। लेह शहर में आपको टैक्सी, जीपें या बड़ी गाड़ि‍याँ किराए पर लेनी पड़ेंगी। ये स्थानीय ट्रांसपोर्ट तथा बाहरी क्षेत्रों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। अगर आप रेलमार्ग से जाना चाहते हैं तो सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू है, जहाँ से लेह की दूरी मात्र 690 किमी है। जम्मू रेलवे स्टेशन देश के प्रत्येक भाग से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है। यहाँ से बस, टैक्सी व अन्य साधनों से आपको आगे की यात्रा पूरी करनी पड़ेगी। वहीं आप अगर सड़क मार्ग से लेह तक पहुँचना चाहते हैं तो इसके लिए जम्मू-श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग बना है। श्रीनगर से लेह 434 किमी,कारगिल 230 किमी तथा जम्मू 690 किमी तथा मनाली से 500 कि‍मी की दूरी पर स्थित है।

सड़क मार्ग से जाने वाले या मोटरसाइकि‍ल से यात्रा करने वाले जुलाई से सि‍तबंर तक का मौसम लेह जाने के लि‍ए सबसे अच्‍छा मानते हैं। दरअसल सदिर्यों में लेह जाने का एकमात्र साधन हवाई जहाज ही है। मगर  जुलाई से सि‍तंबर के बीच आप सड़क यात्रा कर सकते हैं। दोनों ही रास्‍तों पर दुनि‍या के कुछ सबसे ऊँचे दर्रे पड़ते हैं। मई से पहले और सि‍तंबर के बाद यहाँ भारी बर्फबारी होती है जि‍स कारण रास्‍ता बंद हो जाता है। मगर सड़क मार्ग की खूबसूरती बेमि‍साल है।

जब हमने लेह के लि‍ए दि‍ल्‍ली एयरपोर्ट से उड़ान भरी तो एक कसक मन में थी कि‍ सड़क मार्ग दोनों तरफ खुले हैं, तो ऐसे में हम और खूबसूरती देख सकते थे उस रास्‍ते कि‍ जो हमें दुनि‍या की छत तक पहुँचाएगी। मगर इतने दि‍नों की छुट्टी हमारे पास नहीं थी। सो,  मन को साधने की कोशि‍श की और घंटे भर की दूरी उड़ान से पूरी करने लगे।

जब हवाई जहाज में यह बताया गया कि‍ हम हि‍मालय  शृंखलाओं के ऊपर उड़ रहे हैं तो सभी लोग खि‍ड़की से नीचे झाँकने लगे। अदभुत नजारे ने मन मोह लि‍या हमारा। ऊपर नीला आसमान…हमारे नीचे सफेद रूई जैसे बादल और उसके नीचे बर्फ से आच्‍छादि‍त पहाड़। वाह….हम सब झांक रहे थे नीचे। कोई मोबाइल से तस्‍वीरें ले रहा था तो कोई कैमरे से। नीचे पतली सी नदी, जैसे सर्प कोई बलखाता चल रहा हो। जरा आगे बढ़ने पर भूरे-काले पहाड़ नजर आए। यह क्रमश: जांस्‍कर और लद्दाख की शृंखलाएँ हैं। भूरे पहाड़ों पर कि‍सी से सफेदी पोत दी हो, ऐसा लग रहा था। उसके ऊपर घने बादल। कहीं बादलों की छाया से पहाड़ का रंग बदल रहा था, तो कहीं इतने घने बादल की कुछ दि‍खाई न दे।

हम लद्दाख पहुँचने को थे। बाहर का नज़ारा अब बदला हुआ सा था। ऊँचे पहाड़ों के नीचे हरे रंग की गहरी घाटि‍याँ और उसके बीच में पीले फूल। कुछेक घर नजर आ रहे थे। बाद में जाना कि‍ ये सरसों के फूल थे। ऊपर से लेह बहुत खूबसूरत लग रहा था। हमें इसी पतली -सी घाटी में उतरना था जो ऊपर से एक हरी-पीली नदी की तरह ही दि‍ख रही थी। जांस्‍कर और लद्दाख  की शृंखलाओं के बीच रहना था हमें और सबसे उत्‍तर में कराकोरम पर्वत-शृंखला के भी दर्शन करने थे। मगर अभी तो सबसे पहले सपनों के देश में कदम रखना था।  हमें हवाई जहाज से उतरने से पहले बाहर के तापमान के बारे में बताने के साथ सावधान भी कि‍या गया कि‍ ऑक्‍सीजन की कमी होगी। इसलि‍ए अपने स्‍वस्‍थ्‍य का ध्‍यान रखें और आज सारा दि‍न आराम करे।

जहाज से उतरते ही पाया कि‍ यह क्षेत्र सैनि‍क छावनी है। छोटा सा एयरपोर्ट जि‍सका नाम है ‘ कुशेक बकुला रि‍नपोछे टर्मिनल, लेह’ । लेह हवाई अड्डा मुख्यतः सेना के लिए बनाया गया हवाई अड्डा है, जहाँ दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू और श्रीनगर से यात्री तथा मालवाहक विमान आवाजाही किया करते हैं। हमने अपने लि‍ए गाड़ी पहले ही बुक कर ली थी, इसलि‍‍ए ड्राइवर जि‍म्‍मी हमारे नाम की तख्‍ती लि‍ये खड़ा था। वह लेह का ही नि‍वासी है। मि‍लते ही ‘जुले’ कहकर उसने अभि‍वादन कि‍या। यह यहाँ का नमस्‍कार है। जि‍म्‍मी हमें शहर के बीच एक होटल में ले चला। रास्‍ते में हमें कुछ महि‍लाएं मि‍लीं। उन सबके हाथों में फूल था। उन्‍होंने घेरदार गाउन जैसा वस्‍त्र पहना था। इसे स्‍थानीय बोली में गुंचा कहते हैं। जि‍म्‍मी ने कहा कि‍ बहुत छोटा सा शहर है लेह, पर आपको अच्‍छा लगेगा। बमुश्‍कि‍ल हमें 20 से 25 मि‍नट लगे होटल पहुँचने में।

दसवीं शताब्‍दी के दौरान लद्दाख ति‍ब्‍बती राजाओं के उत्‍तराधि‍कारि‍यों के शासन में था। 17वीं शताब्‍दी में राजा ‘सेनगी नामग्‍याल’ के शासनकाल के दौरान हि‍मालयन साम्राज्‍य अपने चरम पर था। 1834 में डोगरा राजा गुलाब सिंह के जरनल जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण कि‍या और उसे जीत लि‍या। 1842 में एक वि‍द्रोह हुआ जि‍से कुचल दि‍या गया और लद्दाख को जम्‍मू कश्‍मीर के डोगरा राज्‍य में वि‍लीन कर लि‍या गया। इस तरह 18वीं शताब्‍दी में लद्दाख जम्‍मू और कश्‍मीर क्षेत्र में शामि‍ल हुआ और अब यह जम्‍मू और कश्‍मीर का एक प्रमुख राज्‍य है। लद्दाख, विश्व के दो प्रमुख पर्वत शृंखलाओं, काराकोरम और हिमालय के बीच, समुद्र की सतह से 3,500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसके अतिरिक्त, जास्कर और लद्दाख की समानांतर पर्वतमालाएँ, लद्दाख की घाटी को चारों ओर से घेरती हैं। वैसे लद्दाख  का लेह क्षेत्र 1974 के बाद से वि‍देशी पर्यटकों के लि‍ए खुला।

गाड़ी में बैठते ही सबसे पहले स्‍वच्‍छ नीले आकाश और उस पर छि‍तरे सफेद बादलों पर नजर पड़ी। गजब का खूबसूरत। भूरी चट्टानें या छोटी पहाड़ि‍याँ भी रास्‍ते में दि‍खी हमें और कई हरे पेड़। वहाँ पॉपलर के पेड़ खूब होते हैं। मकानों के बाहर लकड़ी की नक्‍काशी की हुई मि‍ली, जो पॉपलर पेड़ की लकड़ी से बने हुए थे।

हम होटल पहुँचते ही सबसे पहले यह पता करने लगे कि‍ कि‍स दि‍न कि‍धर जाना सबसे अच्‍छा होगा, जि‍ससे समय का सदुपयोग कि‍या जा सके। जि‍म्‍मी ने कहा कि‍ हमें पैंगोग और नुबरा के लि‍ए पहले ही परमि‍ट बनवाना होगा, वरना जि‍स दि‍न जाएँ गे बेवजह वक्‍त लग जाएगा। हमने सूप पीते हुए सारा कार्यक्रम तय कि‍या और जि‍म्‍मी हमसे आधार कार्ड की कॉपी और पैसे लेकर परमि‍ट बनवाने चला गया। होटल बहुत खूबसूरत था। पॉपलर के ऊँचे पेड़ के पीछे भूरी-भूरी पहाड़ि‍याँ और उसके पीछे सफेद रंग से ब्रश फि‍राई हुई पहाड़ि‍याँ। हम कुछ देर आराम करने लगे। बड़ी अजीब सी बात हुई कि‍ कोई थकान नहीं थी, मगर सब के सब सो गए। दोपहर बाद नींद खुली तो खाना खाने के बाद तैयार होकर नि‍कल पड़े शांति‍ स्‍तूप के लि‍ए।

शांति‍ स्‍तूप

रास्‍ते में लेह महल मि‍लता है, मगर ड्राइवर का कहना था कि‍ लोग ढलती शाम को शांति‍ स्‍तूप देखना पसंद करते हैं। इसलि‍ए शाम होने से पहले वहाँ पहुँचकर हम वापस आ जाएँगे। पहुँचने पर पाया कि‍ अब आसमान का रंग गहरा नीला न होकर आसमानी या कह लें, फि‍रोजी है। नीचे पूरा शहर दि‍ख रहा था हरे पेड़ों से घि‍रा हुआ और दूर भूरी-काली पहाड़ी। हमें देख एक सफेद झबरीला कुत्‍ता पूँछ हि‍लाने लगा। अब तो अभि‍रूप को रुकना ही था। उसने खूब प्‍यार कि‍या उसे। अंदर काफी भीड़ थी। लोग अलग-अलग एँगल से फोटो ले रहे थे। हमने भी कई तस्‍वीरें लीं।

यह लेह से 5 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई लगभग 14,000 फुट है। यहाँ महात्‍मा बुद्ध की अनुपम प्रति‍मा स्‍थापि‍त है। इसका नि‍र्माण 1983 में दलाईलामा के आदेश पर कराया गया। नि‍र्माण कार्य 1991 में पूरा हुआ और इसका उद्घाटन 14वें दलाई लामा तेनजिग ग्‍यात्‍यो ने कि‍या था। जापानी मोंक द्वारा वि‍श्‍व शांति‍ के लि‍ए बनाया गया है शांति‍ स्‍तूप।

अचानक बहुत तेज हवा चलने लगी। शाम ढलने को थी। मौसम एकदम बदल गया। काले बादल आकाश में छा गए और ठंढ़ लगने लगी। मगर बहुत खूबसूरत और आशि‍काना मौसम हो गया हो जैसे। बादलों का रंग इतना जल्‍दी-जल्‍दी बदलते मैंने पहले नहीं देखा था। बारि‍श की आशंका से लोग जल्‍दी नि‍कलने लगे मगर मुझे गंदुमी आकाश के साथ शांति‍ स्‍तूप इतना खूबसूरत लगा कि‍ बयान करना मुश्‍कि‍ल है। टप-टप कर कुछ बूंदे बरसीं,मगर बारि‍श वैसी नहीं हुई। फि‍र भी हम नि‍कले क्‍योंकि‍ अंधेरा छाने लग गया था। ऊँचाई से उतरने के दौरान थोड़ी दूर पर पहाड़ि‍यों में कई स्‍तूप नजर आए। छोटे-छोटे सफेद, पत्‍थरों से घि‍रे स्‍तूप। पता लगा ये मन्‍नत के स्‍तूप होते हैं। लोग बुद्ध भगवान से मनौती मांगते हैं और पूरा होने पर ऐसे स्‍तूप बनवाते हैं। कई लोग पत्‍थर के ऊपर छोटे-छोटे पत्‍थर रख के छोड़ दि‍ए थे। यह भी स्‍तूप का ही एक रूप है। हमने बहुत समय शांति‍ स्‍तूप में ही लगा दि‍या, इसलि‍ए लेह महल नहीं जा सके, क्‍योंकि 7 बजे के बाद बंद हो जाता है महल।

लेह बाजार

 अब हम बाजार चले गए। रंग-बि‍रंगे मोति‍यों की माला, मोमबत्‍ती-अगरबत्‍ती स्‍टैंड, तरह-तरह के बैग, टोपी और गरम कपड़े, जि‍समें ति‍ब्‍बती सामान भी था ,तो कश्‍मीरी भी। लद्दाखी युवति‍याँ खूबसूरत थी और बहुत अच्‍छी हिन्दी बोल रही थीं। बाजार के बीच में कुछ युवा एकत्र होकर बैंड बजा रहे थे। पता चला 21-22 जुलाई को उनका म्‍यूजि‍क एँड आर्ट फेस्‍टि‍वल था। ये लोग उसी की तैयारी में लगे हुए थे। खरीदने से ज्‍यादा अच्‍छा बाजार घूमने में लगा। पाया, कि‍ सड़क कि‍नारे लगने वाली सभी दुकानों की मालि‍क कोई महि‍ला ही है। ज्‍यादातर इमीटेशन ज्‍वेलरी बेच रही थी। इयरिंग्स, नेकलेस,कुछ घर और दीवार सजाने के लि‍ए धातु के सामान। ति‍ब्‍बती बैग, टोपि‍याँ, लकड़ी के मुखौटे, बुद्ध का मुखौटा व प्रति‍मा, ज्‍वेलरी बाक्‍स। उधर पश्‍मीना शॉल और कश्‍मीरी सूट की बहुत वेरायटी थी। हमने भी कुछ-कुछ खरीदा और वापस होटल आ गए। जल्‍दी ही डि‍नर लि‍या फि‍र सोने चले गए; क्‍योंकि‍ सुबह जल्‍दी नि‍कलना था हमें।

अब तक लगा सब कुछ सामान्‍य है। ऑक्‍सीजन की कमी जैसी तो कोई बात नहीं लगी। मगर होटल के कमरे में थोड़ी घबराहट- सी हो रही थी। एक ख्‍याल यह आया कि‍ हमें पंखे की आदत है और यहाँ नहीं है ; इसलि‍ए घुटन हो रही है। मगर नींद आने के घंटे भर बाद बहुत बेचैनी महसूस हुई  और नींद खुल गई। लगा दम घुट रहा। जल्‍दी से कमरे की सारी खि‍ड़कि‍याँ खोल दीं और कपूर नि‍कालककर सूँघने लगी। यह पढ़ा था कि‍ कपूर सूँघने से तात्‍कालि‍क तौर पर आक्‍सीजन की कमी दूर होती है। वाकई फायदा हुआ। कुछ देर बाद दोबारा सो गई। चूंकि‍ लेह काफी ऊँचाई में है और यहाँ पेड़ भी कम हैं। हि‍मालय पर्वत शृंखलाएँ नमी वाले बादलों को लद्दाख में आने ही नहीं देती; इसलि‍ए मानसून का मौसम और बारि‍श वैसी नहीं होती कि‍ हरि‍याली हो पाए। इस कारण मैदानी क्षेत्र से आने वाले लोग यहाँ हाँफने लगते हैं।

खारदुंगला पास

सुबह उठकर हमलोग नुबरा के लि‍ए नि‍कले। रास्‍ते में ही खारदुंगला पड़ता है। सर्पीला रास्‍ता, खि‍ली धूप और हरि‍याली। दूर तक शांति‍ स्‍तूप दि‍खता रहा। बहुत खूबसूरत। रास्‍ते में बहुत से घर भी मि‍ले, जि‍नकी छतों पर, सड़क कि‍नारे, पताकाएँ  लगी हुई थी। इससे पता चलता है कि‍ ये लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी है। भूरे रेतीले पहाड़ को पार करते हुए हम ऊँचाई पर चढ़ते चले जा रहे थे। नीचे हरा लद्दाख पीछे छूट रहा था। कई जगह घाटि‍यों के बीच पतली सी नदी जैसी दि‍खी जो वस्‍तुत: बर्फीला पानी था, जो एक पतले नाले के रूप में बह रहा था, मगर स्‍वच्‍छ था।

यहाँ पहाड़ों की रंगत बदली हुई नजर आई। पहाड़ का रंग हल्‍का हरा था जैसे काई की झीनी परत हो। एक मोड़ पर सारी गाड़ि‍याँ रुकती हैं क्‍योंकि‍ वहाँसे पूरा लेह शहर दि‍खता है। भूरे पहाड़ों के पीछे हरि‍याली और उसके पीछे काले पहाड़ों को ढकता हुआ बादल। वाकई अवि‍स्‍मरणीय। कुछ तस्‍वीरें लेने के बाद हम ऊपर चल पड़े।

ये क्‍या, खारदुंगला पहुँचने को थे हम। पहाड़ों की चोटि‍याँ घने बादलों से ढकी थी और काले पहाड़ों पर बर्फ की धारि‍याँ पड़ी हो जैसे। पहाड़ बादलों से घि‍रे हैं कि‍ धुंध से, पता करना मुश्‍कि‍ल था। तभी हमारे सामने एक ट्रक रुका  और उसमें से कुछ मजदूर उतरे। यह मजदूर रास्‍ता साफ करते हैं; क्योंकि ‍ इस रास्‍ते अक्‍सर लैंड स्‍लाइडिंग  होती है और गाड़ि‍याँ  फँस जाती है। यहाँ जो मजदूर थे, उनमें से ज्‍यादातर बि‍हार-झारखंड के लगे। लोग जीवि‍का की तलाश में कि‍तने दुर्गम जगह पर काम करने चले आते हैं, उन्‍हें देख कर अहसास हुआ।

अगला मोड़ मुड़ते ही जो नजारा हमारे सामने था वह हमें खुशी से पागल कर देने के लि‍ए बहुत था। एक के बाद एक कई पहाड़ि‍याँ जो बर्फ से लि‍पटी हुई धवल छटा बि‍खेर रही थी। कहीं बादल, कहीं धूप। बि‍ल्‍कुल पेंटि‍ग सा दृश्‍य। हम खुद को कुछ देर वहाँ ठहरने से रोक नहीं पाए। पांच मि‍नट बाद ही हम सबसे ऊँची जगह पर थे। चारों तरफ बर्फ जमी हुई थी और जोरदार ठंड लगने लगी। मगर हमारा और वहाँ पहुँचे तमाम लोगों का उत्‍साह चरम पर था। बच्‍चे बर्फ के गोले बनाकर एक-दूसरे पर फेंकने लगे। यह भी सैनि‍क क्षेत्र ही है। हम 18 हजार 380 फीट की ऊँचाई पर  थे, जि‍से खारदुंगला पास कहा जाता है। यह  दुनि‍या की सबसे ऊँची जगह मानी जाती है ,जहाँ हम मोटर से जा सकते हैं। मगर लोगों का कहना है कि  वास्‍तव में यह दूसरी सबसे ऊँची जगह है।

.सब लोग बड़े उत्‍साह से उस बोर्ड के नीचे खड़े होकर अपनी तस्‍वीर उतरवा रहे थे, जहाँ टॉप की ऊँचाई लि‍खी हुई थी। बौद्ध धर्म के प्रतीक स्‍वरूप यहाँ भी रंग-बि‍रंगी पताकाएँ लगी थी जो बर्फ की सफेद दीवारों की खूबसूरती को बढ़ा रही थी। यहाँ हमें कई बाइकर्स भी मि‍ले, जो अपनी बाइक पर ही पूरे लद्दाख की यात्रा कर रहे थे। मेरा भी बहुत मन हुआ कि‍ बाइक पर यात्रा की जाए ,तो उसका मजा ही कुछ और आएगा। मगर पूरे परि‍वार के साथ यह संभव नहीं खासकर जब आपके साथ छोटे बच्‍चे हों।

कुछ देर वहाँ रहने के बाद हम नि‍कल पड़े ,क्‍योंकि‍ वहाँ ठंड बहुत ज्‍यादा थी और आक्‍सीजन की कमी भी महसूस हो रही थी। मगर अवि‍स्‍मरणीय अनुभव था। सब लोग बेहद खुश थे और उत्‍साह से परि‍पूर्ण। जि‍म्‍मी ने कहा अब चलि‍ए, आगे और नजारा है। जरा सा नीचे उतरे तो लगा हम बर्फ के समंदर में आ गए है। ऊँची-ऊँची बर्फ की दीवारें मीलों दूर तक फैली थीं। मगर सड़क साफ थी। हमें अहसास हुआ इस बात का कि‍ आर्मी वालों का कि‍तना बड़ा योगदान है कि‍ हम आम नागरि‍क जीवन का लुत्‍फ उठा रहे हैं। चाहे लैंड स्‍लाडिंग  हो या बर्फबारी, हमारे सैनि‍क तुरंत काम में लग जाते हैं।  हम एक बार फि‍र बर्फ में खेलने लगे। तभी साबूदाने जैसी बर्फ की बारि‍श होने लगी। अब तो और मजा आने लगा। हमारी तरह कुछ और लोग भी थे बर्फ के समंदर मे लोट लगा रहे थे। भीगने की परवाह कि‍ए बि‍ना मैं और अमि‍त्‍युश एक बार फि‍र भागे ऊँचाई में। कुछ लड़के-लड़ि‍कयाँ भी पोज देकर फोटो खिंचवा रहे थे। हमने भी ली कई तस्‍वीरें। अभि‍रूप ऊपर से उतर चुका था आदर्श के साथ नीचे और हमें बुला रहा था। हमारे  दाँत भी कि‍टि‍कटाने लगे। लगा, कि‍ और रुकने से बुरी तरह हम भीग जाएँगे तो वापस भागे गाड़ी में।

अब हम नुब्रा के रास्‍ते की ओर थे। काराकार्रम वन्‍य जीव अभ्‍यारण के पास एक चेकपोस्‍ट है, जहाँ अपना परि‍चय पत्र दि‍खाना पड़ा। यहाँ से 25 कि‍मी दूर है नुब्रा। इतनी देर बर्फ में रहने का दुष्‍परि‍णाम हुआ कि‍ हमारे हाथ गर्म ही नहीं हो रहे थे। उनमें चीटि‍याँ सी चल रही थी। आगे एक जगह पहाड़ी नदी मि‍ली, बहुत खूबसूरत। मेरी तबि‍यत खराब होने लगी थी। यह खारदुंगला में देर तक रुकने का दुष्‍परि‍णाम था। चक्‍कर और उल्‍टि‍याँ आने लगी। गाड़ी रोक दी  हमने। जगह भी अच्‍छी थी। कुछ देर वहाँ रुककर ताजादम हुए और आगे चले। ड्राइवर जि‍म्‍मी ने सांत्‍वना दी  कि‍ आगे नमकीन लद्दाखी चाय पि‍लाएगा जि‍ससे तबि‍यत तुरंत सुधर जाएगी।

सि‍याचि‍न का अर्थ

कुछ ही देर में हम खारबुंग नामक जगह में थे। वहाँ सड़क कि‍नारे छोटे-छोटे ढाबे जैसे थे। जि‍म्‍मी ने कहा कि‍ यहाँ जो खाना है खा लीजि‍ए  क्यों कि‍ आगे कुछ नहीं मि‍लेगा। बहुत भीड़ थी वहाँ। हालांकि‍ मन नहीं था कुछ खाने का मगर आगे कुछ भी नहीं मि‍लेगा, इस अंदेशे ने कुछ खाने को मजबूर कि‍या। हमने आर्डर दि‍या। वहाँ मोमो, मैगी, फ्राइस राइस, चाउमीन जैसे खाद्य पदार्थ ही मि‍लते थे। जि‍म्‍मी जल्‍दी से अंदर गया और लद्दाखी चाय लेकर आया। उसे गुड़गुड चाय कहते हैं। इसके अलावा लद्दाख में एक वि‍शेष झाड़ी की पत्‍ति‍यों को उबाल कर बनाई जाती है ,जि‍से स्‍थानीय बोली में सोल्‍जा कहते हैं। इस झाड़ी को खौलते पानी में चाय की पत्‍ति‍यों की तरह उबाल कर चाय बनाई जाती है। इसे सर्दी, खाँसी, बुखार और सर दर्द एवं चक्‍कर की अचूक दवा मानी जाती है। वाकई नमकीन चाय से शरीर में स्फूर्ति ‍ आ गई।

तभी मेरी नजर गुलाब के झाड़ी पर गई जहाँ से गुलाब की तेज खुश्‍बू आ रही थी। ऐसा गुलाब जि‍सकी पंखुड़ि‍या काफी कम थी मगर खुशबू  जबरदस्‍त। कुछ तस्‍वीरें उतारीं मैंने। पता चला इसे रेयर सि‍याचि‍न रोज बोलते हैं। मुझे अब पता लगा कि‍ सि‍याचि‍न का अर्थ होता है सि‍या यानी ‘गुलाब’ और चीन मतलब ‘जगह’। यानी वह जगह जहाँ ढेरों गुलाब पाए जाते हैं।  मुझे बेहद खुशी हुई कि‍ सि‍याचीन के बारे में सुना था, मगर अब अर्थ पता चला और हम उस क्षेत्र की ओर जा भी रहे हैं। उत्तर में कराकोरम पर्वत शृंखलाएँ आती हैं, और लद्दाख की पहाड़ि‍याँ भी। यहाँ पर दुनिया के सबसे ठंढे माने जाने वाले स्थानों में से एक सियाचिन का इलाका आता है, और यहीं पर भारतीय राज्य की सीमा भी समाप्त हो जाती है।

लद्दाख के बाग की ओर

सबने कुछ-कुछ खाया, चाय पी और आगे नि‍कल पड़े। हम नुब्रा की ओर बढ़ रहे थे। लेह से इसकी दूरी 130 कि‍लोमीटर है। यह समुद्रतल से 10,000फुट की ऊँचाई पर स्‍थि‍त है। इसे लद्दाख का बाग भी कहते हैं।

हमारी बांयी ओर पहाड़ था तो सड़क के दाहि‍नी तरफ चौड़ी नदी। घाटी में बहती नुब्रा नदी सि‍याचि‍न ग्‍लेशि‍यर से नि‍कलती है।यह मुख्‍य शहर दि‍स्‍कि‍त के पास जाकर श्‍योक नदी में मि‍ल जाती है। रास्‍ते में पॉपलर के लहराते पेड़, भूरी पहाड़ि‍याँ और काले बादलों के बीच हम थके हुए चले जा रहे थे। हमें झपकी आ रही थी। अचानक बादलों  की तेज गड़गड़ाहट की आवाज और बि‍जली की चौंध से सब  चिहुंककर जगे। हमारे ठीक 100 कदम की दूरी पर ऊपर पहाड़ पर बि‍जली गि‍री और एक चट्टान ठीक हमारी गाड़ी के सामने आकर गिरी । शायद मि‍नट भर की दूरी तय की होती ,तो आज यहाँ आपको बताने के लि‍ए मैं नहीं होती। हम सब डर गए थे।  जीवन बचाने के लि‍ए ईश्‍वर का शुक्रि‍या अदा कर आगे नि‍कल पड़े।

अब नदी के तट पर रेत दि‍खने लगी। हम नुब्रा  पहुँचाने को थे। दूर से ही दि‍स्‍कि‍त मठ और उसके बाद बुद्ध की ऊँची प्रति‍मा सबका ध्‍यान खींच रही थी। यहाँ मैत्री बुद्ध की 32 मीटर लंबी मूर्ति है जो, दूर से ही दि‍खती है। दि‍स्‍कि‍त मठ 350 वर्ष पुराना है और सबसे बड़ा बौद्ध मठ माना जाता है। दिस्कित गोम्पा लगभग 100 भिक्षुओं के लिए निवास स्थान है, जो विश्व के विभिन्न भागों से आए हैं। अब हममें वापस उत्‍साह का संचार हो गया था। जल्‍दी से प्रति‍मा के पास पहुँचना चाहते थे। वहाँ पहंचे तो बहुत पहले ही गाड़ी रोक दी गई। पता लगा कि‍ दलाई लामा आए हुए हैं ;इसलि‍ए गाड़ि‍याँ ऊपर नहीं जा रही। हमें पैदल दूर तक जाना होगा। मगर कि‍सी में इतनी हि‍म्‍मत बाकी नहीं कि‍ वो एक कि‍लोमीटर भी पैदल चले। सो हमने तय कि‍या कि‍ पहले नुब्रा चलते हैं। वहीं पास में देखा एक स्‍वास्‍थ्‍य कैंप लगा हुआ था जहाँ स्‍थानीय  नि‍वासि‍यों का नि‍:शुल्‍क इलाज चल रहा है। कुछ देर खड़ रहे हम। लामाओं को प्रार्थना चक्र घुमाते देखा। दलाई लामा के स्‍वागत की पूरी तैयारी नजर आ रही थी। लोग व्‍यस्‍त थे। वापसी के समय एक बार फि‍र यहाँ आएँगे, यह सोचा। वापस मुड़ते ही हरे- भरे खेत और सरसों के पीले फूलों ने मन मोहा हमारा। बीच में नीले रंग की झाड़ि‍याँ थी, फूलों की।

नुब्रा घाटी 

…………….नुब्रा घाटी  तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख घाटी के उत्‍तर-पूर्व में स्‍थि‍त है। इस घाटी की ऊँचाई 10,000 फीट है। इसका प्राचीन नाम डुमरा (फूलों की घाटी) था। श्‍योक और नुब्रा नदी के बीच है यह घाटी। यहाँ हमें रास्‍ते में  रेत के टि‍ब्‍बे मि‍ले ठीक राजस्‍थान की तरह। आगे बढ़ने पर दो कूबड़ वाले ऊँट मि‍लेंगे, ऐसा जि‍म्‍मी ने बताया। पूरे भारत में दो  कूबड़ वाले ऊँट यहीं देखने मि‍लते हैं।  नुबरा की दूरी लेह से 150 कि‍लोमीटर है। सन 1947 तक नुबरा नदी होते हुए मध्‍य एशि‍या के कुछ क्षेत्रों के लि‍ए घोड़े, खच्‍चर, याक व दो कूबड़ वाले ऊँटों द्वारा व्‍यापारि‍क वस्‍तुओं का आदान-प्रदान होता था। इस वजह से आज भी मध्‍य एशि‍या में पाए जाने वाले दो कूबड़ वाले ऊँट सैकड़ों की संख्‍या में नुबरा के दि‍स्‍कि‍त और हुण्‍दर में रेत के टीलों के बीच मि‍लते हैं।

हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे , प्रकृति‍ अपने अप्रति‍म रूप में नजर आ रही थी। रेत, पानी और बर्फ का संगम एक साथ शायद ही कहीं मि‍ले आपको। अब हर तरफ रेगि‍स्‍तान ही रेगि‍स्‍तान था। बालू के बीच झाड़ि‍याँ थी।अब जो नदी हमारे साथ चल रही थी उसका नाम श्‍योक  है, जि‍सका अर्थ होता है रि‍वर ऑॅफ डेथ या दुख या मृतकों की नदी। यह नदी उत्‍तरी कारोकरम पर्वत श्रेणी से नि‍कलती है जो पश्‍चि‍म की ओर बहती है। यहाँ भी मठ के कुछ  दूरी पर कई स्‍तूप नजर आ रहे थे। इसका प्रयोग पवि‍त्र बौद्ध अवशेषों को रखने के लि‍ए भी कि‍या जाता है। आम तौर पर स्‍तूप पहाड़ की चोटी के सामने या गांव के प्रवेश द्वार पर होते हैं।

मैंने गौर कि‍या कि‍ कोई भी गोम्‍पा या स्‍तूप आता हमारा ड्राइवर जि‍म्‍मी अपने दाहि‍ना हाथ नाक की सीध में लाता कुछ होंठों में फुसफुसता रहता। जब कई बार देखा तो पूछा मैंने..क्‍या करते हो जि‍म्‍मी। बोला मन ही मन प्रणाम कर मंत्र दुहराता हूँ । माना जाता  है कि‍ ये स्‍तूप वहाँ आसपास के रहने वालों और गुजरने वालों लोगों में सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार करते हैं। बौद्ध श्रद्धालु इनकी परि‍क्रमा दाएँ  से बाएँ  करते हैं।

थोड़ी देर बाद ही हम नुब्रा में  थे। जि‍म्‍मी का कहना था कि‍ पहले हमें ठहरने का इंतजाम कर लेना चाहि‍ए तब हमलोग ऊँट की सवारी करने चलेंगे। उसकी बात मान हम आबादी की ओर गए। कई जगह टेंट लगे नजर आए। इस जगह का नाम हुण्‍ड़ुर था। पता लगा कि‍ लोग यहाँ भी रात रहते हैं पर हमें कि‍सी होटल या गेस्‍ट हाउस में रहना था। यहाँ के लोग अपने घर को ही गेस्‍ट हाउस में तब्‍दील कर रहते हैं। जि‍म्‍मी हमें जि‍स घर में सबसे पहले ले गया, हमलोगों ने अपना सामान वहीं पटका और बाहर भागे; क्‍योंकि‍ शाम ढल जाती तो कुछ दि‍खना मुश्‍कि‍ल होता। दूसरा, जि‍स घर में हम ठहरने वाले थे वह बहुत खूबसूरत था और उसके आँगन में सेब के तीन पेड़, चेरी के एक और फूलों के कई पौधे थे। मुझे भा गया वह घर।  अब हम उस स्‍थान में पहुँचे जहाँ दो कूबड़ वाले ऊँट देखने को मि‍लते ।

मैदान के पास वहाँ एक पतली सी नदी थी, जि‍स पर लकड़ी का पुल बना हुआ था। पुल से पहले ढेरों गाड़ि‍याँ लगी हुई थी, इससे पता लग रहा था कि‍ बहुत से पर्यटक आए हैं यहाँ। हल्‍की बूँदें पड़ रही  थीं ;  इसलि‍ए लोग छतरी लेकर खड़े थे। एक जगह खूब भीड़ दि‍खी। पास जाकर देखा तो 25-30 ऊँट बैठे थे। कुछ ऊँट के साथ उनके बच्‍चे भी थे और सभी ऊँटों के कान में नंबर की पर्ची लगी हुई थी। हम उत्‍सुक होकर ऊँटों को देख रहे थे। तस्‍वीर लेने के लि‍ए जरा नजदीक जाने से  ऊँट घबरा के उठ गया। फि‍र भी हमने तस्‍वीरें लीं।

कोने में एक झोपड़ी जैसा था वहाँ कुछ लड़के पर्ची काट रहे थे। जि‍सका नंबर आता वह वापस आए ऊँट

पर बैठ जाता। एक ग्रुप में 8-10 लोगों को लेकर एक ऊँटवाला चलता। लोगों में बड़ा उत्‍साह था दो कूबड़ वाले ऊँट पर बैठने का। मगर दि‍क्‍कत यह थी कि‍ एक ऊँट पर एक ही आदमी बैठ सकता था। इसलि‍ए बच्‍चों ने डर से मना कर दि‍या। वैसे भी हम बहुत दूर नहीं जाने वाले थे ; क्‍योंकि‍ ऊँट से ज्‍यादा हमें आसपास के दृश्‍य में दि‍लचस्‍पी थी। फि‍र भी एक अनूठा अनुभव तो रहा। सबसे मजेदार कि‍ जि‍स ऊँटनी पर सवारी होती और  वो नजरों से ओझल होती,  तो उसका बच्‍चा जोर-जोर से आवाज लगाता। इसलि‍ए ऊँटनी भी जल्‍दी लौटकर आ जाती। हमलोग ने एक फेरा लि‍या ऊँट का और वापस आए। कुछ स्‍थानीय महि‍ला-पुरुष खड़े थे वहाँ जि‍नके साथ फोटो खिंचवाए। बहुत मासूम होते हैं लद्दाख के लोग। होंठों पर सदा सरल मुस्‍कान तैरती रहती है। वो लोग तस्‍वीरें लेने में झि‍झकते भी नहीं बल्कि क और अच्‍छे से पोज देते हैं। हमारे यहाँ के ग्रामीण आदि‍वासी लोग तो तस्‍वीर के नाम पर मुंह छि‍पा लेते हैं। शायद पर्यटकों के लगातार आगमन ने उन्‍हें दोस्‍ती करना सि‍खा दि‍या है।

हम अब  आराम से  बालू पर कुछ दूर जाकर बैठ गए। सामने ऊँचे पहाड़ थे। ये काराकार्रम के पहाड़ थे, खूब ऊँचे। आसपास कँटीली, हरी-हरी झाड़ि‍याँ  थीं । रेत का रंग भी धूसर था, बि‍ल्‍कुल स्‍लेटी। दूर तक रेत ही रेत मगर आश्‍चर्य कि बगल में ही नदी थी। दूर कतार में पॉपलर के ऊँचे पेड़ झूम रहे थे और उसके पीछे बादल पर्वत की चोटी को चूमते नजर आ रहे थे। कह सकती हूँ  कि‍ इतना कुछ एक साथ कहीं और देखने को नहीं मि‍ल सकता। मैं अब तक भारत में जि‍न जगहों पर गई हूँ , उनसे सबसे ज्‍यादा खूबसूरत है लेह-लद्दाख क्‍योंकि‍ प्राकृति‍क दृश्‍यों की जि‍तनी वि‍वि‍धता यहाँ देखने को मि‍लीं, आज तक कहीं नहीं मि‍ली थी। पर्वत पर ऐसी दरारें थी कि‍ कि‍सी पेंटि‍ग सा आभास हो रहा था। यहाँ हमें लामा भी दि‍खे और स्‍थानीय नि‍वासी भी। दूर पर्वत पर बर्फ की परत थी। एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ रेत और बीच में नदी। हल्‍की ठंड थी और गरम कपड़े की जरूरत भी महसूस हो रही थी हमें। कहीं-कहीं पहाड़ों की आकृति‍ इतनी अजीब थी कि‍ हम उसमें कोई जानवर ही  नजर आने लगता। हल्‍की हवा, गहराती शाम और दूर दि‍खती दि‍स्‍कि‍त मठ की प्रति‍मा, सफेद बादल और नीला आकाश…मन कहता कि‍ रुक जाओ यहीं, बस जाओ यहीं। मगर कब हुआ है मनचाहा।

शाम ढलने को थी। अब हम गाड़ी में बैठकर वापस मुड़े ही थे कि‍ सड़क के उस पर रेत के समंदर पर नजर पड़ी। बि‍ल्‍कुल अनछुआ- सा। लोगों के पैरों के नि‍शान नहीं थे ; क्‍योंकि‍ लोग ऊँट की सवारी के बाद वापस चले जाते थे। कुछ लोग ही इधर-इधर बि‍खरे दि‍खे। एक बार फि‍र हम रेत में चल पड़े। वहाँ रेत पर कई तस्‍वीरें खिं‍चवाई। मजे की बात कि‍ बालू के ऊपर भी हरे पौधे थे । कई जगह और उन पर बैंगनी रंग के फूल खि‍ले थे।  कुछ पौधे कहीं भी कि‍सी भी हाल में उग आते हैं। ऐसे  दृश्य  हमें प्रेरि‍त करते हैं। जबकि‍ राजस्‍थान में हमें ऐसा कुछ नहीं मि‍ला था। यहाँ सामने देखने से पहाड़, रेत और पीछे पलटने पर बि‍ल्‍कुल ऊटी -सा नजारा। हरि‍याली, पहाड़ और बादल।

बि‍ल्‍कुल मन नहीं हो रहा था उस स्‍थान से वापस आने का। पर हमें लगा कि‍ कुछ और  भी  चीजें देखी जाएँ,  सो लौटने लगे। एक जगह  गाँव के पास सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम होता है हर शाम। वहाँ स्‍थानीय नृत्‍य-संगीत देखते हैं पर्यटक। मगर अफसोस कि‍ दलाई लामा के आने के कारण आज वहाँ कोई कार्यक्रम नहीं था। हम मायूस होकर वापस उसी रेस्‍ट हाउस की तरफ चल दि‍ए, जहाँ रात गुजारनी थी। बगल में पानी की आवाज आ रही थी। लोगों ने नदी से नहर  गाँव के अंदर ही नि‍काल दि‍या है, जि‍ससे उनका रोजमर्रा का काम चलता रहे। वहाँ बाहर एक धर्म चक्र था ,जि‍से मैंने और अवि‍ ने मि‍लकर घुमाया उसके बाद रेस्‍टहाउस में। यहाँ कच्‍चे सेब, चेरी और तरह-तरह के फूलों के सानि‍ध्‍य में समय गुजारने के बाद छत पर देर तक बैठे रहे। पास ही पहाड़ी पर एक गोम्‍पा नजर आ रहा था ,मगर पता चला कि‍ खूब चढ़ाई है; इसलि‍ए जाना संभव नहीं हुआ। प्रकृति‍ वाकई बेहद दि‍लदार है। वहाँ ठंड थी। कुछ देर बाहर छत में बैठे रहे चाय के साथ। जब रात गहराने लगी तो अंदर गए।

कुछ देर में अभि‍रूप ने   चाकलेट खाने की इच्‍छा की तो हमलोग पास के दुकान में गए। वहाँ दो लोग आराम से बैठकर बाते कर रहे थे। हमने बि‍स्‍कुट और चाकलेट मांगा तो बड़े  मॉल की तरह उन्‍होंने इशारा कि‍या -आप खुद जाकर नि‍काल लो, जो चाहि‍ए। हमें अच्‍छा लगा कि‍ लोग ईमानदारी पर यकीन करते हैं। उस छोटे से दुकान में सब्‍जी से लेकर मैगी तक सब उपलब्‍ध था।

सब थक के चूर थे ;इसलि‍ए जल्‍दी ही रात का खाना खाया और सो गए। सुबह  नि‍कलना था वापस। चूँकि‍ ठंड थी ,सो रजाई में आराम से सोए। यहाँ आक्‍सीजन की कमी भी नहीं थी ;इसलि‍ए कोई परेशानी भी नहीं हुई।

सुबह जल्‍दी उठकर चाय- ब्रेड ली  और तैयार होकर पहले सेबों को चखने पहुँचे। सेब छोटे थे, सो खट्टे लगे। इसकी चटनी अच्‍छी लगती, ऐसा ख्‍याल आया। नि‍कले, तो फि‍र से स्‍वच्‍छ आकाश पर फैले बादलों पर नजर गई। रेत के टि‍ब्‍बे और बीच में हरि‍याली जैसे नखलि‍स्‍तान हो। पि‍नामि‍क गाँव से आगे का रास्‍ता सि‍याचि‍न जाता है, जहाँ हमारा जाना प्रति‍बंधि‍त है। नुबरा में ‘हॉट-स्प्रिंग ‘ है जो यहाँ से 45 कि‍लो मीटर की दूरी है।      चूँकि‍ हमने कई ‘हॉट-स्प्रिंग देखे हैं ,इसलि‍ए केवल उसे देखने के लि‍ए इतना लंबा सफर करना ठीक नहीं लगा हमें।

दि‍स्‍कि‍त मठ

हम एक बार फि‍र दि‍स्‍कि‍त मठ की  ओर थे। आज कि‍स्‍मत अच्‍छी थी। दलाई लामा थे वहाँ पर आज ,नीचे उनका सम्‍मेलन था। मठ तक गाड़ी चली गई। मठ दूर से ही बहुत खूबसूरत लग रहा था। मठ समुद्रतल से 10,310 फीट की ऊँचाई पर स्‍थि‍त है। दि‍सकि‍त बौद्ध मठ नुब्रा घाटी में सबसे पुराना और सबसे बड़ा मठ है। इसकी स्‍थापना चोंगजेम़ सि‍रेब झांगपो ने 14वीं शताब्‍दी में की थी। यह  गोम्‍फा ति‍ब्‍बती बौद्ध धर्म के गेलुप्‍पा पीली टोपी वाले संप्रदाय के अंर्तगत आता है। यह मठ ति‍ब्‍बती बच्‍चों के लि‍ए एक स्‍कूल भी चलाता है। यहाँ मैत्री बुद्ध की इतनी ऊँची मूर्ति है कि‍ खड़े होने पर भी हम उनके पैरों तक नही पहुँच पाए। दलाई लामा ने 100 फूट के ‘ मैत्रेय’ प्रति‍मा का उद्घाटन कि‍या था। दि‍स्‍कि‍त गोम्‍पा में वर्ष में एक बार तुसछोत के नाम से वार्षिक मेला आयोजि‍त होता है। उस मौके पर मठ में नि‍वास कर रहे लामा  बुद्ध और बोधि‍सत्‍वों के मुखौटे पहनकर धार्मिक नृत्‍य करते हैं,जि‍से छमस कहते हैं।  यहाँ ऊपर से पूरी नुब्रा घाटी नजर आती है ..सुंदर..नयनाभि‍राम। हमने बहुत सी तस्‍वीरें उतारी। अब हम मंदि‍र में थे । वहाँ बुद्ध शाक्‍य मुनि‍ की प्रति‍मा थी। गुरु  पद्मनाभम के साथ ही अन्‍य भी। तभी हमने मूर्ति की फोटो ली। यहाँ एक पुजारी बैठे थे। उन्‍होंने मना नहीं कि‍या। मगर जब मेरी तस्‍वीर मूर्ति के साथ ली गई और साथ में पुजारी भी उसी फ्रेम में आ रहे थे। उन्‍होंने अपनी आँखे बंद कर लीं । जब तस्‍वीर क्‍लि‍क हो गई ,तो कहने लगे कि‍ ये आपने अच्‍छा नहीं कि‍या। अब आपके साथ जरूर कुछ बुरा होगा। हमने कहा ये क्‍या बात हुई। जब तस्‍वीर नहीं उतारनी थी ,तो पहले मना करते।

अब उसके बाद वो बार-बार कहने लगे कि‍ जरूर कुछ न कुछ बुरा होगा। आगे क्‍या बुरा होना है ,यह तो पता नहीं, मगर उस वक्‍त हमें जरूर बुरा लगा और हम बाहर नि‍कल आए। मन खराब हो गया। यह सच है कि‍ कि‍सी से कुछ बोलने से नहीं होता, मगर कई बार वह बातें आपके मन में बैठ जाती हैं। मैंने वो तस्‍वीरें डि‍लीट की और गाड़ी में बैठकर नि‍कल गए। हमलोग इस बात का ध्‍यान रखते हैं कि‍ जहाँ मना कि‍या जाए, वो काम नहीं करें। खैर…जो होगा देखा जाएगा कि‍ भावना के साथ फि‍र वापस चल पड़े।

नि‍हायत खूबसूरत रास्‍ता। कुछ दूर चलने के बाद हमारे ड्राइवर की वि‍परीत दि‍शा से आने वाले ड्राइवर से बात हुई। उनकी भाषा तो हमें समझ नहीं आई ,मगर जि‍म्‍मी ने बताया कि‍ रास्‍ते में एक पुल बह गया है। वहाँ घंटों जाम लगेगा ;इसलि‍ए दूसरे रास्‍ते से चलते हैं। वह रास्‍ता आर्मी वालों के काम आता था। सामान्‍य लोगों के लि‍ए नीचे का रास्‍ता था ,जो पुल बहने के कारण अवरुद्ध हो चुका था। अब हम काफी ऊँचाई पर थे। नीचे दूसरी सड़क दि‍ख रही थी, जि‍ससे होकर हमें जाना था। दूर तक बालू में पर्यटक छोटी सी चारपहि‍ए की गाड़ी में रेत का आनंद उठा रहे थे।

हम आर्मी कैंप के पास से होकर नि‍कल रहे थे। आश्‍चर्य होता है कि‍ इतनी दूर, इतनी कठि‍न जगह पर कैसे रहते हैं आर्मी वाले। हम जि‍स जगह रुके वहाँ बोर्ड लगा था सि‍याचि‍न ब्रि‍ज। नीचे दि‍ख रहा था कि‍ पहाड़ी नदी से पूरा पुल बह गया है। ऊपर हम सि‍चाचि‍न तुस्‍कर क्षेत्र में थे। अपने ड्राइवर की सावधानी की वजह से हम नि‍कल पाए ,वरना फि‍र उस टूटे पूल से वापस जाकर ऊपर के उसी रास्‍ते से वापस आना होता, जि‍ससे अभी आए हैं। ये लंबा रास्‍ता था मगर हमें रुकना नहीं पड़ा।

बि‍च्‍छू बूटी

कुछ दूर आगे बढ़ने पर पता लगा कि‍ सड़क बंद है। रास्‍ते में चट्टान गिर जाने से रास्‍ता बंद हो गया है।

दूर तक लंबी कतार थी वाहनों की। पर वह एक खूबसूरत जगह थी। ऊँचे पहाड़, हरे-भरे । वहाँ दूर-दूर तक याक चर रहे थे। बगल में श्‍योक नदी बह रही थी। यह जगह खलसर थी।  हमने मजाक भी कि‍या कि‍ नुबरा आकर याक नहीं दि‍खा था , इसलि‍ए यहाँ रुकना पड़ा। हमारे आगे बहुत सी गाड़ि‍याँ रुकी हुई थीं। कुछ स्‍थानीय महि‍ला-पुरुष भी नदी कि‍नारे बैठे दि‍खे। दूसरी ओर कुछ टैंट लगे हुए थे। यहाँ स्‍थानीय लोग ,जो याक पालते हैं और कुछ लोग जो मजदूरी करते हैं ,वे  यहाँ रहते हैं। उधर पीछे पहाड़ी पर बर्फ थी और काले बादल भी। यहाँ हमें खूब ठंड लग रही थी।

कुछ देर तक तो सबने प्रकृति‍‍ का मजा लि‍या, फि‍र उकताने लगे। कुछ लोग सड़क पर चादर बि‍छाकर ताश खेलने लगे ,तो कुछ लोग खाने का सामान नि‍कालकर खाने लगे। हमारे पास वैसा कुछ नहीं था खाने को।  कुछ बि‍स्‍कि‍ट के पैकेट थे और कुछ सेब। वही खाया और घूमने लगे। जमीन पर तरह-तरह के फूल खि‍ले थे। सफेद डेजी, पीले फूल, सफेद फूल और बैंगनी फूल जि‍सका नाम ताग शा नागपो है। लगा..कि‍ इसलि‍ए नुबरा का दूसरा नाम फूलों की घाटी है। पत्‍थरों के पास उगे छोटे -नन्‍हें फूल बेहद खूबसूरत लग रहे थे। इनके लि‍ए ही कहा गया है ‘ लि‍ली आफ  फील्‍ड’ । ऐसे फूल जो जिंदगी से बेखबर उग आते हैं कहीं भी।

एक घंटे से ज्‍यादा हो गया हमे रुके हुए। दोपहर हो गई थी। हम सबने सुबह केवल ब्रेड खाई  थी  सो भूख लगी। आगे करीब आधे कि‍लोमीटर दूर भीड़-भाड़ नजर आ रही थी। वहाँ बैरि‍केटिंग लगा था और याद आया कि‍ आते वक्‍त हमने देखा था कुछ खाने-पीने की दुकानें भी थी। मैंने आदर्श को कहा कुछ ले आए खाने को ,क्‍योंकि‍ बच्‍चों को भूख लगी थी। वे पैदल ही चले गए लाने और मैं बच्‍चों के साथ सड़क के दूसरी तरफ आ गई, जहाँ ये श्‍योक नदी का धवल जल दि‍खता था। वहीं पत्‍थर पर दो स्‍थानीय महि‍लाएँ  बैठी थी।

मैंने भी बात करने के उद्देश्‍य से उनके पास जाकर बैठ गई। वो दोनों महि‍लाएँ  माँ-बेटी थी और वो लोग भी जाम खुलने कर इंतजार कर रही थी। हमने कुछ देर बात की। बताया उन्‍होंने कि‍ कि‍सी रि‍श्‍तेदार के यहाँ जा रही हैं। माँ वृद्ध थीं। बैठे-बैठे हाथ में लि‍ए मनके की माला फेर रही थी। उन्‍होंने अपने गले में ऊँचा स्‍कार्फ बाँध  रखा था। जरा गौर कि‍या ,तो पाया कि‍ गले में सफेद दाग था, शायद उसे छि‍पाने के लि‍ए ही स्‍कार्फ बाँधा था। उन्‍होंने कान में सोने का नीला पत्‍थर जड़ा टाप्‍स पहना था। मैंने स्‍थानीय महि‍लाओं को पत्‍थर के आभूषण पहने देखा है जि‍नमें नीले पत्‍थर का ज्‍यादा प्रयोग होता है। हमने बात की उनसे। तभी मेरी नजर पड़ी ,उनके पास रखे लाल थैले पर। उसमें कुछ पत्‍ते भर रखे थे उन्‍होंने। नाम बताया ‘दसोट या जजोट’। वहीं आसपास ढेरों पत्‍ते थे। बताया कि‍ इसको असावधानी से छूने पर खुजली होती है। इसलि‍ए इसे ‘बि‍च्‍छू बूटी’ भी बोलते हैं। स्‍थानीय लोग गर्मियों की इसकी छोटी पत्‍ति‍याँ तोड़कर सब्‍जी बनाते हैं या सत्‍तू में मि‍लाकर पीते हैं। ज्‍यादा मात्रा में तोड़कर इसे सुखाकर पास में रखते हैं,क्‍योंकि‍ ठंड में जब बर्फ गि‍रती है तो पैदावार नहीं होती कुछ। इसलि‍ए सूखी जजोट के पत्‍ते की सब्‍जी बनाकर खाते हैं। हँसते हुए कहा उस महि‍ला ने कि‍ बहुत देर से रुके थे, यहाँ तो हमलोगों ने जजोट के पत्‍ते तोड़कर जमा कर लि‍ए।

इतनी देर में ये लोग दोनों हाथों में सामान लिये गए। खूब सारे चि‍प्‍स के पैकेट और बच्‍चों के लि‍ए मैगी। वहाँ मैगी, थुपका आदि‍ ज्‍यादा खाया जाता है। मैंने उन दोनों महि‍लाओं को भी चि‍प्‍स का पैकेट पकड़ाया; क्‍योंकि‍ अनुमान था उन्‍हें भी भूख लग आई होगी।  हम सब खा ही रहे थे कि‍ पता चला रोड क्‍लि‍यर हो गया है। जल्‍दी से सबलोग अपनी-अपनी गाड़ी की ओर दौड़े। दो घंटे समय बि‍ताकर हम अब नि‍कल पाए थे।

अब हम सीधे रास्‍ते में आ गए। थोड़ी दूर के बाद यहीं से बाएँ  मुड़ता है एक रास्‍ता जो सीधे पैंगोग ले जाता है। यह जगह डरबुक थी जो तांगसे होते हुए पैंगोग सीधे ले जाती। हमें वापस खारदुंगला होकर नहीं जाना पड़ता। एक दि‍न बचता भी। मगर ऐसा नहीं हो पाया। बाएँ  मुड़ने वाला रास्‍ता बंद था। मजबूरी में हमें वापस खारदुंगला जाना पड़ा।

फि‍र वही सुंदर दृश्‍य। इस बार तो बारि‍श के कारण बर्फ गि‍र रहा था। हमलोग ने स्‍नो फाल का मजा उठाया। कुछ देर को खारदुगंला टॉप पर रूके भी। इस समय भीड़ कम थी कल के मुकाबले। बारि‍श भी हो रही थी। सबसे  कमी अखरी वहाँ शौचालय की। इतनी दूर यात्रा, और ठंड के बाद इसकी व्‍यवस्‍था जरूरी है। कभी बना होगा शौचालय मगर अब जीर्ण हालत में हैं। महि‍लाएँ परेशान दि‍खी वहाँ। खारदुंगला से तुरंत ही नि‍कल पड़े हम।

लेह महल

घंटे भर के सफर के बाद हम लेह महल पहुँचे।  एक बार फि‍र शहर हमारे आंखों के आगे था। शहर के मध्य में स्थित इस महल का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में सिंगे नामग्याल ने करवाया था। अंदर जाने के लि‍ए टि‍कट लेना पड़ा। बच्‍चों का मन नहीं था मगर हमें देखना था लेह महल। प्रवेश द्वार लकड़ी की नक्‍काशी वाला था। ऊपर एक सिंह की प्रति‍मा भी स्‍थापि‍त थी जो आक्रमण की मुद्रा में था।

इस महल में भगवान बुद्ध के जीवन को दर्शाते चित्र देखने लायक हैं। यह महल राजा सेंगे नामग्‍याल द्वारा 17वीं सदी में बनाया गया था। यह नौमंजि‍ला महल है मि‍ट्टी और लकड़ी का बना हुआ है। इस महल की देखरेख पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा की जा रही है। परन्तु इसकी हालत अत्यंत जर्जर है। महल की इमारत ल्हासा में पोताला पैलेस, जो की तिब्बत में है, की तरह है। ऊपर झरोखा भी है और एक दूसरे से जुड़े कई कमरे भी। दूसरे तल्‍ले पर झरोखे में खड़े होने पर शहर दि‍खता है पूरा।

ऊपर आने से पहले ही एक पूजा घर है। उसके बाहर लकड़ी का काम कि‍या हुआ है। कुछ कमरे ऐसे भी दि‍खे जो बाहर से ताला बंद थे। छत की बनावट थोड़ी अलग थी। एक मंजि‍ल से दूसरी मंजि‍ल घूमकर जाना पड़ता था। ऊपर-नीचे छत थे। जब डोगरा के बलों ने ,19 वीं सदी में लद्दाख पर कब्ज़ा कर लिया था, तब  शाही परिवार को महल छोड़ना पड़ा था और उन्हें स्टोक पैलेस जाना पड़ा था। यहाँ से भी शहर और पहाड़ की खूबसूरती देखने लायक है। यहाँ एक आर्ट गैलरी भी है जहाँ आप पुराने लद्दाख की झलक पा सकते हैं। मैं एकदम ऊपर नहीं जा पाई, क्‍योंकि‍ अभि‍रूप थककर रोने लगे, तो मुझे रुकना पड़ा। बाकी लोग ऊपर तक घूमकर आ गए। हम बाहर नि‍कले ,तो पास ही एक मठ और नजर आया, जो ऊँचाई पर था। कुछ लड़कि‍याँ सीधी चढ़ाई कर जा रही थी। हमारा जाना तो संभव था ही नहीं ,सो वापस होटल की तरफ चल पड़े।

होटल पहुँचकर अभि‍रूप ने कहीं भी जाने से इंकार कर दि‍या। अभी शाम ढली नहीं थी। हमें कुछ और जगह देख लेना चाहि‍ए ,ऐसा वि‍चार कर नि‍कल पड़े। बच्‍चे की जि‍म्‍मेदारी होटल के मैनेजर को सौंप दी। एक बात जरूर है। लेह में लोग आपको सीधे और ईमानदार मि‍लेंगे। वहाँ चोरी छि‍नतई जैसी भी कोई बात नहीं, न ही बड़े शहरों के  लोगों की तरह उनका व्‍यवहार है। हम नि‍श्‍चिंत होकर बच्‍चे को होटल में छोड़कर इसलि‍ए नि‍कल पाए;क्‍योंकि‍ हमें भरोसा था वे लोग बीच-बीच में जाकर उसकी देखभाल अवश्‍य करेंगे। ऐसा हुआ भी, वापस आने पर बच्‍चे के बताया अंकल आकर देख कर जाते थे और पूछकर भी कि‍ कोई जरूरत तो नहीं।

जांस्‍कर-सिन्धु संगम

शाम होने से पहले हम जांस्‍कर-सिन्धु संगम जाना चाहते थे। होटल में अभि‍रूप को छोड़ नि‍कल गए कारगि‍ल वाले रास्‍ते पर। उसी रास्‍ते एयरपोर्ट है और भी कई चीजें हैं देखने के लि‍ए। पर हमें वो संगम देखना था जो लेह से करीब 35 कि‍लोमीटर की दूरी पर है । यह नीमो गाँव के पास है। रास्‍ता बहुत खूबसूरत, पूरा लद्दाख ही बहुत खूबसूरत है। पूरे स्‍पीड में गाड़ी भगाई जि‍म्‍मी ने। वह भी चाह रहा था कि‍ शाम ढलने से पहले हम संगम पहुँच जाएँ, क्‍योंकि‍ आते वक्‍त सड़क खराब होने के कारण हमारा बहुत सा वक्‍त बर्बाद हो गया था और  मेरे मन में सिन्धु नदी, हमारी पवि‍त्र नदी देखने की जबरदस्‍त इच्‍छा थी।

हम पहले ऊपर सड़क पर  रुके। वह रास्‍ते आगे कारगि‍ल चला जाता है। ऊपर से दो नदि‍यों का संगम दि‍ख रहा था। एक बि‍ल्‍कुल मटमैली दूसरी थोड़ी साफ। बाईं ओर से आने वाली नदी सिन्धु थी और सीधे से आनी वाली नदी का संगम हो रहा था यहाँ। दोनों नदि‍यों का पानी मि‍लकर दाहि‍नी ओर चला जा रहा था। दोनों तरफ काली-भूरी कई पहाड़ि‍याँ थी और सामने बर्फ लि‍पटे पहाड़। हमने चारों तरफ एक भरपूर नजर डाली और नीचे की ओर चल पड़े। गाड़ी नदी तट तक जाती है। वहाँ एक छोटा सा शेड बना था, जि‍सके कि‍नारे कुछ बोट रखे हुए थे। लोग यहाँ न जि‍सके एक दीवार पर लि‍खा था  – ‘टूरि‍स्‍ट एंड वि‍जि‍टर्स, वेलकम टू इंडस वैली’।

इंडस वैली अर्थात सिन्धु घाटी की सभ्‍यता पढ़कर हम बड़े हुए हैं। सिन्धु घाटी की सभ्‍यता 3500 हजार ईसापूर्व थी। सिन्धु के तट पर ही भारतीयों के पूर्वजों ने प्राचीन सभ्‍यता और धर्म की नींव रखी थी। गंगा से पहले हि‍न्‍दू संस्‍कृति‍ मे सिन्धु और सरस्‍वती की ही महि‍मा थी। सि‍न्‍धु का अर्थ जलराशि‍ होता है। ति‍ब्‍बत के मानसरोवर के नि‍कट सि‍न-का-बि‍ब नामक जलधारा सि‍न्‍धु नदी का उद्गम स्‍थल है। इसकी लंबाई करीब 2880 कि‍लोमीटर है। यहाँ से यह नदी ति‍ब्‍बत और कश्‍मीर के बीच बहती है। कह सकते हैं कि‍ यह वही पुण्‍यसलि‍ला है , जि‍सकी गोद में हमारी सभ्‍यता,संस्‍कृति‍ पली-बढ़ी और जि‍सके कारण आज हम ‘हि‍न्दू’ और हमारा देश  ‘हिन्दुस्‍तान’ कहलाया। सिन्धु शब्‍द से प्राचीन फारसी का हि‍न्‍दू शब्‍द बना है क्‍योंकि‍ यह नदी भारत की पश्‍चि‍मी सीमा पर बहती थी और इस सीमा के उस पार से आने वाले जाति‍यों के लि‍ए सिन्धु नदी को पार करने का अर्थ भारत में प्रवेश करना था। यूनानि‍यों ने इसी आधार पर सि‍न्ध को इंडस और भारत को इंडि‍या नाम दि‍या था। वि‍द्वानों का मानना है कि‍ परस्‍य (ईरान) देश के नि‍वासी सिन्धु नदी को हिंदु कहते थे, क्‍योंकि‍ वे स का उच्‍चारण ह करते थे। सिन्धु शब्‍द पारसी में जाकरहिंदु और फि‍र ‘हि‍न्‍द’ हो गया। सिन्धु नदी के तट पर वेद रचे गए , ऋषि‍यों ने देवताओं का आह्रान कि‍या और अभी भी हर हि‍न्दू पूजा से पहले पावन नदि‍यों का स्‍मरण कर खुद को शुद्ध कर आचमन करता है।

बाल्मीकि रामायण में सिंधु को महानदी की संज्ञा दी गयी है। महाभारत के भीष्म में सिंधु का गंगा और सरस्वती के साथ उल्लेख है-

‘नदी पिबन्ति विपुलां गंगा सिंधु सरस्वतीम्।

गोदावरी नर्मदां च बाहुदां च महानदीम्।।’

हम उसी पावन नदी के तट पर खड़े थे। ठंडी हवा चल रही थी। आकाश काले-सफेद बादलों से आच्‍छादि‍त था। वहाँ तट पर सीढ़ि‍याँ बनी थी, जि‍ससे उतरकर हम नदी के पास गए। सबसे पहले सिन्धु का जल हाथों में लि‍या और अपने ऊपर छि‍ड़का। एक अजीब सा अहसास था। हमारे मन में बसी बातें, अनुभव और संस्‍कृति‍ इंसान के साथ-साथ चलती है। एक ओर धार्मिक महत्त्व समझ आ रहा था तो दूसरी ओर ऐति‍हासि‍क। सिन्धु सभ्‍यता और आर्यन के बारे में हर भारतीय जानता है। हम आज उसी स्‍थल पर खड़े थे, जहाँ हजारों सदि‍याँ पहले हमारी सभ्‍यता परि‍ष्‍कृत हुई थी। कहते हैं इसी सिंधु नदी के तट पर सिकंदर ने अपना अभियान खत्म किया था।

नदी का कि‍नारा वैसे भी बहुत मनोरम होता है। यहाँ दोनों नदि‍याँ मि‍लकर भी अलग लग रही थीं; क्‍योंकि‍ दोनों का रंग अलग है। यह देखना बेहद रोमांचकारी लगा।  सर्दियों में जास्‍कर नदी जम जाती है और लोग इसे पैदल चलकर पार करते हैं। मगर सिन्धु के साथ ऐसा नहीं है।

ति‍ब्‍बती भाषा में तांबें को ‘जंग्‍स’ बोला जाता है और जंस्‍कार क्षेत्र में भी तांबा मि‍लता है। अनुमान यह भी है कि‍ ‘जंस्‍कार’ का मूल अर्थ ‘ श्‍वेत तांबा’ या’तांबे का तारा’ होता है। जंस्‍कार और इसके साथ सटा हुआ लद्दाख का कुछ भाग कभी गुगे राज्‍य का हि‍स्‍सा था जो कि‍ पश्‍चि‍मी ति‍ब्‍बत तक फैला था। जंस्‍कार, जम्‍मू और कश्‍मीर राज्‍य के कारगिल जिले में उत्‍तरी किनारे पर स्थित एक तहसील है। इस जगह में, साल के लगभग 8 महीने तक भंयकर बर्फबारी होती रहती है जिसके कारण यह क्षेत्र दुनिया के अन्‍य हिस्‍सों से अलग हो जाता है। मगर लेह जाने के लि‍ए सर्दियों में एकमात्र रास्‍ता   जान्स्कर नदी ही है ,जो जम जाती है। अब लोग सर्दियों में यहाँ चादर ट्रैक के लिये जाते है, अर्थात जमी हुई नदी की यात्रा। यह काफी लोकप्रि‍य हो रहा है।

मगर अभी गर्मी थी और समय था रि‍वर राफ़्टिंग का। लोग दि‍खे भी नदी में दूर-दूर तक। मगर अफसोस हमारे पास उतना वक्‍त नहीं था। पहाड़ि‍यों की ओट से सूरज छुपने लगा था।  हालाँकि‍ यहाँ शाम बहुत देर से होती है। शाम के छह बजे हमारे शहर राँची में अंधेरा घि‍र आता है मगर यहाँ धूप नि‍खरी हुई है। हाँ, बादलों की लुकाछि‍पी चल रही थी जरूर। बहुत देर तक नदी कि‍नारे लहरों का बहाव देखते रहे हम लोग। यकीनन यह ऐसी जगह है जहाँ नदी कि‍नारे बैठकर इति‍हास को याद करते हुए बहुत कुछ मंथन कि‍या जा सकता है।

आगे जाने पर अलची का वि‍श्‍वप्रसि‍द्ध मठ था। पर शाम ढलने को थी। जि‍म्‍मी ने कहा रात हो जाएगी पहुँचते हुए। हम दूसरे दि‍न चलेंगे,तो हम लोग लौटे। थोड़े ही दूर पर लेह का एक और आकर्षण स्‍थल मैग्‍नेटि‍क हि‍ल था।

मैग्‍नेटि‍क हि‍ल

यह ऐसी पहाड़ी है जि‍से मैग्‍नेटि‍क हि‍ल के नाम से जाना जाता है। यहाँ गाड़ी बंद कर छोड़ दीजि‍ए तो वह खुद ब खुद ऊपर की ओर जाने लगती है। हम भी रुके वहाँ। ड्राइवर ने गाड़ी बंद कर दी। गाड़ी अपने आप चलने लगी ऊपर की तरफ। सभी पर्यटक यहाँ रुककर एक बार जरूर परीक्षण करते हैं कि‍ सत्‍य क्‍या है। हमने भी कि‍या। कुछ  बाइक वाले भी टेस्‍ट कर रहे थे। हमने देखा। कुछ तस्‍वीरें लीं और पास के रेस्‍तराँ में बैठ चाय मँगवाई। मैंने हनी-जिं‍जर वाली स्‍वादि‍ष्‍ट चाय पी। बाहर लोग एटीवी बाइक पर आसपास की पहाड़ि‍यों के चक्‍कर लगा रहे थे। कुछ देर बाद हम वहाँ से नि‍कल लिये।

‘पत्‍थर साहि‍ब’

अँधेरा हो गया था अब।  आठ बज गए थे। रास्‍ते में गुरुद्वारा है ‘पत्‍थर साहि‍ब’।  यहाँ एक शिला पर मानव आकृति उभरी हुई है कहा जाता है कि यह आकृति सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी का है। सेना इस पत्‍थर साहि‍ब गुरुद्वारे  का संचालन करती है।

हम पहुँचते ही दर्शन करने के लि‍ए अंदर गए। बाहर बि‍ल्‍कुल भीड़ नहीं थी। हमारे अंदर जाते ही कुछ लोग आने लगे। शायद यह उस दि‍न के अंति‍म अरदास का समय था। बाबा को अंदर वाले कक्ष में भजन के साथ सुलाया गया। एक कि‍नारे चादर पर सारे शस्‍त्र रखे गए। हम सबके हाथ में एक-एक कपड़ा दि‍या गया कि‍ आप सेवा करो। हमने भी दीवारें पोंछी। उसके बाद सब लोगों ने हलवे का स्‍वादि‍ष्‍ट प्रसाद खाया और नि‍कल आए। वहाँ एक बड़े आकार के पत्‍थर की पूजा होती है।

माना जाता है कि गुरु नानक देव जी नेपाल, सि‍क्‍कि‍म और ति‍ब्‍बत होते हुए यारकंद के रास्‍ते लेह से यहाँ पहुँचे। सामने की पहाड़ी पर एक राक्षस रहता था जो यहाँ के लोगों को मारकर खा जाता था। गुरुजी लोगों की पुकार सुनकर इस स्‍थान पर पहुँचे और यहाँ नदी के कि‍नारे आसन लगाया। लोगों को राहत हुई मगर राक्षस गुरुदेव जी को मारने के लि‍ए मौका देखकर एक  बड़ा सा पत्थर पहाड़ी के ऊपर से उनके ऊपर गिराया। जैसे ही गुरुदेव से उस पत्‍थर का स्‍पर्श हुआ, पत्‍थर मोम बन गया और शरीर के पि‍छले हि‍स्‍से में धॅँस गया। मगर गुरुजी  के तप में कोई असर नहीं पड़ा। राक्षस  उन्‍हें मरा जानकर पास आया; परंतु जीवि‍त पाकर गुस्‍से में अपना दाहि‍ना पैर उस पत्‍थर पर मारा। इस पर राक्षस का पैर भी उसमें धँस गया। तब राक्षस ने गुरुजी जैसे भक्‍त को मारने के प्रयास के लि‍ए उनसे क्षमा  माँगी। नानक देव ने राक्षस को इंसानों की सेवा करने का उपदेश दि‍या। राक्षस उसके बाद से सुधर गया। कुछ समय वहाँ रहकर नानक देव कश्‍मीर चले गए। बाद में उस स्थान पर पत्थर साहिब गुरुद्वारा बनाया गया। लद्दाखी उन्हें ‘लामा-गुरु नानक’ कहते हैं।

वहाँ जो पत्‍थर है उसका आकार ठीक ऐसा ही है, जैसे कोई इंसान उसमें धंसा बैठा हो। हमें तो बेहद अच्‍छा लगा यह जानकार  कि‍ यह सेना द्वारा संचालि‍त होता है। पुजारी से लेकर सभी सेवादार और दरबान तक सब सेना के लोग हैं। आर्मी का मेजर मुख्‍य ग्रंथी थे। लंगर भी उन्‍हीं के देखरेख में चलता है। वहाँ दातुन साहि‍ब का भी एक गुरुद्वारा बन रहा है। कहते हैं बाबा साहब ने अपना दातुन यहीं छोड़ दि‍या था। यहाँ आसपास कोई पेड़ नहीं था। बाद में बहुत वि‍शाल वृक्ष उगा मि‍सवाक( मुलहटी) का। इसलि‍ए वहाँ के बौद्ध धर्म मानने वाले और मुस्‍लि‍म भी दातुन साहि‍ब को बहुत श्रद्धा से देखते हैं।

कुछ देर वक्‍त गुजारने के बाद हम वापस लौट चले। रात हो गई थी। अब सीधे वापस होटल क्‍योंकि‍ अभि‍रूप होटल में ही था। थोड़ी घबराहट हुई थी उसे अकेले छोड़ा था इसलि‍ए मगर वो आराम से था। हम सबने साथ में डि‍नर लि‍या और सो गए।

 पांगोंग झील की तरफ

आज की मंजि‍ल थी पांगोंग झील। चि‍र प्रती‍क्षि‍त, हमारी ही नहीं, बच्‍चों की भी। नीले पानी के झील का आकर्षण हाल-फि‍लहाल के कुछ फि‍ल्‍मों ने बढ़ा दि‍या ,जि‍समें प्रमुख हैं ‘थ्री इडि‍यट’ और ‘जब तक है जान’। हम एक बार फि‍र सिन्धु के कि‍नारे-कि‍नारे चल पड़े बादलों से बात करते और बर्फ की चमक को आँखों में भरते। रास्‍ते में पड़ने वाले मॉनेस्‍ट्री, काले बादल और सरसों के पीले खेतों से गुजरते हुए चल पड़े झील की ओर।

हम अब लेह-मनाली हाईवे पर थे। पल-पल बदलता आकाश का नजारा और धुंध। पांगोग के लेह-मनाली हाईवे पर कारु से एक रास्‍ता पांगोंग के लि‍ए बाएँ मुड़ता है और सीधा रास्‍ता मनाली की ओर जाता है। कारु से चांगला करीब 40-45 कि‍मी की दूरी पर है। रास्‍ते में ऊँचे-ऊँचे भूरे पहाड़ मि‍लेंगे ,तो नीचे घाटी में हरे रंग के खेतों के बीच पीले सरसों के खेत जैसे धरती की चादर पर पैचवर्क कि‍या गया हो। पांगोंग झील जाने के लि‍ए आपको पाँच घंटे का सफर तय करना होगा। रास्‍ते की मुश्‍कि‍लें अलग     है ,मौसम की मेहरबानी रही तो समय पर पहुँच सकते हैं।

चूँकि‍ सुबह का वक्‍त था और बादल घि‍रे थे सो रास्‍ते धुँधले मगर बहुत आकर्षक लग रहे थे। एक ट्रक से मजदूर हमारे ठीक आगे उतरे। जि‍म्‍मी न बताया कि‍ लैंड स्‍लाइडिंग के कारण सारा दि‍न मजदूरों की जरूरत पड़ती है। कारू से चांगला की दूरी लगभग चालीस-पैंतालीस कि‍लोमीटर की है मगर रास्‍ता खराब होने के कारण हमें इतने में ही दो-तीन घंटे लग गए।

चांगला दर्रा

हम चांगला पहुँचने वाले थे। यह दर्रा ति‍ब्‍बत के एक छोटे से शहर तांगत्‍से को जोड़ता है। दूर से ही बर्फ ढकी चोटि‍यॉं नजर आने लगीं। आर्मी के कैंप भी थे। लोग सभी उतर रहे थे। वहाँ कई छोटे-छोटे दुकान थे खाने पीने के सामान वाले। हमारे ड्राइवर जि‍म्‍मी ने चेतावनी देते हुए कहा कि‍ दस मि‍नट में यहाँ से नि‍कलने की कोशि‍श कीजि‍एगा। देर तक ठहरे तो झील देखकर लौटना मुश्‍कि‍ल होगा आज। हम उतरकर फ्रेश होने गए और कुछ खाने पीने के लि‍ए एक दुकान में घुसे। पर्यटकों की भीड़ थी वहाँ। स्‍थानीय दो महि‍लाएँ फटाफट लोगों की फरमाइशें पूरी कर रही थीं और उसके सहयोग के लि‍ए दो-तीन लोग थे। बच्‍चों ने मैगी ली और हमने थुकपा खाया। यह बड़ा स्‍वादि‍स्‍ट लगा मुझे। थुकपा मांसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह से बनाया जाता है। चूँकि‍ मैं शाकाहारी हूँ तो अपने मुताबि‍क चीजें तलाशती हूँ।

जि‍म्‍मी तुरंत खड़ा हो गया कि‍ क्‍या लेंगे हम और फौरन स्‍थानीय बोली में आर्डर कराके ले भी आया। मुझे लग गया कि‍ कोई तो बात है ,वरना यह बि‍ल्‍कुल सर पर खड़ा नहीं रहता। हमने जल्‍दी से अपना नाश्‍ता खत्‍म कि‍या और बाहर आसपास देखने लगे कि‍ क्‍या है यहाँ।

यहाँ के स्‍थानीय घुमंतू जनजाति‍यों को चांगपा कहा जाता है। मगर इस जगह को चांगला पास या चांगला दर्रा कहा जाता है। इस दर्रे में स्‍थि‍त चांग-ला बाबा के मंदि‍र के नाम पर ही इस दर्रे का नाम चांगला पास हुआ और इसकी ऊॅँचाई लि‍खी हुई थी 17688 फीट। इसे दुनि‍या का तीसरा सबसे ऊॅँचा दर्रा कहा जाता है। मगर तंग्‍लनगला दर्रे की ऊँचाई 17582 फीट है और उसे दूसरा सबसे ऊॅँचा दर्रा कहा जाता है। कई बार लैंड स्‍लाइडिंग होने से सड़क अवरुद्ध हो जाती है तो कई बार ग्‍लेशि‍यर का पानी बहने से सड़के बह जाती हैं।जो भी जो..यहाँ बहुत ठंढ़ थी। हमने कुछ तस्‍वीरें खींची और नि‍कल पड़े। हमारा सारथी पहले से गाड़ी में बैठा हमारा इंतजार कर रहा था।

चांगला से हम आगे नि‍कले। डरबुक और मांगसे के बीच बहुत सुंदर नजारा था। चांगला पास से उतरते ही नीचे खाई में कई फौजी जीपें पलटी दि‍खाई दी। जि‍म्‍मी ने बताया कि‍ वह इसलि‍ए हड़बड़ा रहा था कि‍ आर्मी की गाड़ि‍याँ लगातार खुलनी शुरू हो जाएँगी। इसके बाद जबरदस्‍त जाम लग जाएगा तो हम वक्‍त पर पहुँच नहीं पाएँगे। चूँकि‍ हमें रात वहाँ रुकना नहीं था। कुछ दूर ही गए थे कि‍ एक नदी या झील जैसी जगह आई। जमी हुई बर्फ और बीच-बीच में पानी। बेहद खूबसूरत नजारा। कुछ लोग वहाँ उतर के पास जा रहे थे। मगर हम नहीं रुके। कुछ दूर पर सड़क के बायीं तरफ हमें एक झील दि‍खा। वहाँ बोटिंग के लि‍ए नाव भी थी। पर अफसोस..हम नहीं रुक सकते थे। आगे कुछ तंबू लगे दि‍खे और याक भी बधे थे। जि‍म्‍मी ने बताया कि‍ ये लोग याक पालते हैं और दूध का व्‍यापार करते हैं।

अब हम ऐसे रास्‍ते में थे जहाँ के नजारे तो काफी खूबसूरत थे मगर वीरान था। बायीं तरफ पि‍घली बर्फ की नदी की कलकल ध्‍वनि‍ ध्‍यान खींच रही थी मगर वक्‍त की कमी के कारण उतरना मुश्‍कि‍ल था। जि‍म्‍मी ने एकदम दृठ़ता से मना कर दि‍या। नतीजा रास्‍ता बेहद उबाऊ लगने लगा। डर से मैं भी चुप रही कि‍ कहीं शाम ढल गई तो पैंगोग का सुंदर नजारा नहीं देख पाएँगे।  हालाँकि‍ मेरा मन था कि‍ एक रात पैंगेाग के कि‍नारे गुजारा जाए मगर कुछ परि‍चि‍तों ने बि‍ल्‍कुल मना कि‍या था रुकने से। कहा-रात बेहद ठंडी होती है। ऐसे में बाहर नि‍कलने का मन नहीं होगा। बेहतर है बच्‍चे हैं साथ तो न रुका जाए। तो हमलोग उसी दि‍न लौटने के हि‍साब से गए।

रास्‍ते में काले-भूरे पहाड़ और नीले आसमान पर तैरते बादल बेहद आकर्षक लग रहे थे। मगर रास्‍ता नि‍र्जन था। आगे थोड़ा खुला मैदान शुरू हुआ जि‍से चांगथंग  (उत्‍तरी मैदान) के नाम से जाना जाता है। यहाँ अचानक ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। देखि‍ए..उधर। हम झपाक के गाड़ी से उतरे; क्‍योंकि‍ वैसे भी बैठे-बैठे ऊब गए थे। मैदान में उतरकर देखा तो सड़क कि‍नारे चूहे जैसे दि‍खने वाले खरगोश के आकार के मोरमेट दि‍खे। यह एक खोह के ठीक पास में बैठा था। उसकी पीठ हमारी ओर थी। आहट सुनकर जरा भी नहीं डरा। आराम से अपने दोनों पंजों पर बैठा हुआ दूर नि‍हार रहा था जैसे योग की मुद्रा में बैठा हो। आसपास हरा घास का मैदान था और उस पर पीले फूल खि‍ले थे। अब हम और करीब गए इस डर के साथ कि‍ कहीं भाग न जाए। मोरमेट काफी चंचल होते हैं और सर्दियों में भूमि‍गत सुरंगों में शीत-नि‍द्रा में चले जाते हैं और गर्मियों में बाहर नि‍कल आते हैं।

हम पास गए तो वह मुड़कर देखने लगा ,पर भागा नहीं। उसकी ओर कुछ देने के लिए जैसे ही  हाथ बढ़ाया ,तो वह अपनी दो टाँगों में उठकर खड़ा हो गया। चूँकि‍ बाहर का भोजन इन्‍हें नहीं देना चाहि‍ए ,सो हमने भी नहीं दि‍या। हालाँकि‍ बच्‍चे गाड़ी से खाने की चीज लाकर देने की जि‍द कर रहे थे, पर मना कर दि‍या उन्‍हें। उसके आगे के दो बड़े दाँत बहुत आकर्षक लग रहे थे। कुछ देर हमलोग देखते रहे। पास ही मैदान में याक भी दि‍खे जो घास चर रहे थे। हमलोग थोड़ी ही देर में वहाँ से नि‍कल गए।

आगे कुछ दूर और ऐसा ही रास्‍ता मि‍ला…वीरान। कब पहुँचेंगे सह सोचकर हम बेसब्र होने लगे। जि‍म्‍मी ने सांत्‍वना दी, बस अगले मोड़ के बाद बाद हम पैंगोंग होंगे। यहाँ से आपलोगों को झील दि‍खेगी। जैसे मोड़ मुड़े, वाह..दूर से दि‍खती झील की पहली झलक ने हमें पागल कर दि‍या। रास्‍ते की सारी नि‍राशा हवा हो गई। हमने देखा तीन ओर पहाड़ि‍यों से घि‍रा नीले-हरे पानी की झील। रेतीला मैदान, भूरी-काली पहाड़ी, उसके पीछे के पहाड़ों में लि‍पटी बर्फ, स्‍वच्‍छ नीला आकाश और झक सफेद बादल और उनका अक्‍स झील पर।

लेह से पांगोग झील की दूरी लगभग 150 कि‍लोमीटर है। पांगोग त्‍सो या पांगोग झील एक ऐसी झील है जो 134 कि‍मी लंबी है। यह लद्दाख से ति‍ब्‍बत पहुँचती है। इसका पानी खारा है और यह कुछ-कुछ देर में रंग बदलती है। सर्दियों में पूरी झील जम जाती है। इस पर आप गाड़ी चला सकते हैं। इस झील का तीन हि‍स्‍सा चीन के पास है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 14,000 फुट की है। और 700फुट से लेकर चार कि‍लोमीटर चौड़ी है। यह झीली इतनी खूबसूरत है कि‍ आप घण्टों देखना चाहेंगे। हम बि‍ल्‍कुल करीब थे झील के। जहाँ पार्किंग हैं उसके आसपास सैकड़ों दुकानें थी खानेपीने की। कुछ होटल भी। पर हमारा ध्‍यान बि‍ल्‍कुल उधर नहीं गया। हम गाड़ी पार्क कर दौड़े झील की ओर।

दूर तक नीली झील..भूरे पहाड़ और नीला आसमान। बादलों का अक्‍स पानी पर प्रति‍बिम्बि‍त हो रहा था। अपेक्षाकृत भीड़ कम थी। लोग इस छोर से उस छोर तक फैले हुए थे। हमने कुछ तस्‍वीरें नीली झील की ली ही थी कि‍ तुरंत पानी का रंग बदल गया। अब वो हरा या कहि‍ए फि‍रोजी हो गया। अद्भुत नजरा। सबसे पहले अभि‍रूप पानी में उतरे। वाकई गदगद महसूस कर रहे थे वो, क्‍योंकि‍ लद्दाख में आकर पंगोंग झील देखना ही उनकी चाहत थी। पानी स्‍वच्‍छ और पारदर्शी था। कुछ देर हमलोग कि‍नारे बैठकर नि‍हारते रहे। यह ढील इतनी अद्भुत है कि‍ इसे शब्‍दों में बांध पाना मुमकिन नहीं। आपको अपनी आँखों से खुद देखना होगा, तभी इसकी सुंदरता महसूस कर पाएँगे।

‘थ्री इडि‍यट’ ने इस झील को और प्रसि‍द्ध कर दि‍या है। ऑल इज वेल का बड़ा-सा पोस्‍टर लगा था और वैसी ही कुर्सियाँ लगी थीं,जो फि‍ल्‍म में दि‍खाई गई हैं।  जि‍स पर पर्यटक बैठकर फोटो नि‍कलवा सकते थे और इसे लि‍ए पैसे देने पड़ते। वैसा ही पीला स्‍कूटर खड़ा था, और करीना कपूर ने जो शादी वाला लहँगा पहना था, उसे पहनकर लड़कि‍याँ बड़े चाव से तस्‍वीरें खिंचवा रही थी। उधर परंपरागत लद्दाखी ड्रेस याक पर लादे कुछ लोग थे ,जो कि‍राए पर कपड़े देकर कुछ देर के लि‍ए आपको स्‍थानीय नि‍वासी होने की अनुभूति‍ दे सकते थे। जाहि‍र है, हमने भी कुछ तस्‍वीरें खिंचवाई ।

अब हम दूसरी  गए। यह वही जगह थी जहाँ फि‍ल्‍म के अंति‍म सीन में आमि‍र खान खड़ा होता है। वहाँ पानी के अंदर कुछ पत्‍थर थे और उस पर बैठकर फोटो खिंचवाने वाले लोगों की कतार लगी थी। बहुत सी तस्‍वीरें लीं हमने। तभी पानी का रंग फि‍र बदला। अब वो कालापन लि‍ये  भूरा था। हम वाकई प्रकृति‍ का आनंद ले रहे थे। हालाँकि‍ एक बात जो केवल मैंने महसूस की कि‍ वहाँ पहुँचने के बाद मैं बेहद शांत हो गई। एक जगह से उठने का बि‍ल्‍कुल मन नहीं हो रहा था। पर बाकी लोगों के साथ ऐसा कुछ नहीं था। शायद ऑक्‍सीजन की कमी हो गई होगी।

बहरहाल, खूबसूरती को आँखों में बसा रहे थे हम। वहाँ भी रंगीन पताकाएँ लगी हुई थी। कुछ तस्‍वीरें और ली फि‍र पास में बने छोटे-छोटे रेस्‍तराँ में गए और थोड़ा कुछ खाया। हमें लौटना था उसी शाम और रास्‍ता बेहद ऊबाऊ था। इसलि‍ए हमलोग शाम ढलने से पहले ही नि‍कल गए। वापसी में पहाड़ी नदी के ठंडे पानी का मजा लि‍या। खूब शीतल जल था और कुछ देर तक पैर डालकर बैठने से आराम आया। चेहरे पर भी शीतल जल के छींटों  ने सफर की थकान जरा कम की।

थि‍कसे मठ

पैंगोग जाते वक्‍त जि‍तना लंबा रास्‍ता लगा था, उतना लौटते में नहीं लगा। जाते वक्‍त हमलोगों को थि‍कसे

मठ मि‍ला था; मगर जाने की हड़बड़ी में हमने देखा नहीं था। अब जब वापस आ रहे थे ,तो आश्चर्य था कि‍ जब हम थि‍कसे मठ के समीप पहुँचे तो सूरज अस्‍ताचल की ओर जा ही रहा था, कोई हड़बड़ी नहीं थी उसे, इसलि‍ए हम भी आराम से मठ-दर्शन को चल पड़े।

सिन्धु नदी के कि‍नारे-कि‍नारे चलते हुए आए थे। थि‍कसे मठ दूर से जि‍तना खूबसूरत है, उतना पास से भी है।मठ के अंदर जाने से पहले ही दूसरी तरफ हमारी नजर पड़ती है। चूँकि‍ मठ ऊँचाई पर है; इसलि‍ए शहर दि‍खता है।  ढलती शाम की पीली परत पेड़ पौधों से लेकर घरों तक है जो और खूबसूरती प्रदान कर रही है इस दृश्‍य को। अंदर रंग-बि‍रंगे खूबसूरत फूल हैं। हम  सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। सीढ़ि‍यों के साथ-साथ धर्म चक्र को घुमाते चलते हैं। वहीं लामा मि‍लते हैं। कहते हैं – जल्‍दी जाइए। एक मंदि‍र खुला है। कुछ देर में वह भी बंद हो जाएगा। पूरा परि‍सर खाली है। दीवारों पर चि‍त्र बने हुए है। अंदर जाने के रास्‍ते में अगल-बगल दो शेर वि‍राजमान है। सिंहद्वार से प्रवेश हो रहा हो जैसे। गजब की शांति‍ है चारों ओर। हम जल्‍दी से ऊपर जाते हैं। बुद्ध की भव्‍य प्रति‍मा का दर्शन होता है। महात्मा बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा  देख कर हम मंत्र-मुग्ध रह गए।

वापस नीचे आकर भि‍त्‍ती चि‍त्र पर नि‍गाहें डालते हैं। अद्भुत चि‍त्रकारी की गई है। यह मठ लेह के सभी मठों से आकर्षक और खूबसूरत है। स्‍थानीय भाषा में थि‍कसे का अर्थ पीला होता है। यह गोम्‍फा पीले रंग का होने के कारण थि‍कसे गोम्‍फा कहलाया। 12 हजार फीट की पहाड़ी पर बनी हुई यह गोम्‍फा ति‍ब्‍बती वास्‍तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। यह मठ गेलुस्पा वर्ग से संबंधित है। वर्तमान में यहाँ लगभग 80 बौद्ध संन्यासी रहते हैं। अक्टूबर-नवम्बर के बीच यहाँ थिकसे उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह मठ लेह से 25 किलोमीटर दूर है। यहाँ से सिन्धु घाटी का बहुत खूबसूरत नजारा दि‍खता है। 12 मंजि‍लों वाले इस मठ में कई भवन,मंदि‍र और भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ हैं। लकउ़ी की नक्काशियाँ हमारा मन मोह रही थी। सभी कक्ष बंद कि‍ए जा रहे थे। लामाओं को हमने नीचे उतरते देखा और यह सोचा भी कि‍ कि‍ती आसानी से ये लो ऊँचे-ऊँचे मठों में आराम से रहते है। हमें तो एक बार ही चढ़ना कठि‍न लग रहा है। बाहर के द्वारों पर भी बेहद आकर्षक नक्‍काशी है। पीछे साँझ का सौदर्य चरम पर है।

हम बाहर नि‍कल आते हैं। गुम्‍फाओं के पास ठहरकर कुछ और समय गुजारने की इच्‍छा है। बेहद ठंडी हवा है जो हमारे थके जि‍स्‍म को सुकून दे रही है।  अब आज के दि‍न कुछ और करना संभव नहीं। खाना और सोना ही आज का अंति‍म लक्ष्‍य है।

लेह के गोम्‍फा

सुबह एक बार फि‍र पूरी हि‍म्‍मत सँजोकर हम नि‍कल पड़े। मगर आज बच्‍चों ने इंकार कर दि‍या। कहा बेहद थके हैं। होटल में ही आराम करेंगे। आपलोग मठ घूम आओ। सबसे पहले हम पहुँचे कर्मा दुप्‍ग्‍युद चोएलिङ्ग मठ जो लेह से करीब 9 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। इस मठ की देखभाल ति‍ब्‍बती बौद्ध धर्म के एक संप्रदाय करमापा द्वारा की जाती है। करमापा का शाब्दिक अर्थ है ‘ जो बुद्ध की गति‍वि‍धि‍यों का पालन करे’। यह मठ ति‍ब्‍बती बौद्ध धर्म के प्रोत्‍साहन और उनकी संस्‍कृति‍ के संरक्षण के लि‍ए कार्य करता है।  जैसा कि‍ हर मठ खूबसूरत है यहाँ का, हमें काफी पसंद आया। बाहर काफी बड़ा प्रार्थना स्‍थल दि‍खा जो बेहद शानदार था। अब हम आगे नि‍कले दूसरे मठ की ओर।

शे मोनेस्‍ट्री

शे पैलेस या शे मोनेस्‍ट्री लेह से लगभग 15 कि‍लोमीटर की दूरी पर है। जब हम पहुँचे तो धूप कड़क हो चुकी थी। ऊपर थोड़ी सी चढ़ाई के बाद ही हमारी साँसें फूल गई। हम ठहर-ठहरकर और पानी पीते हुए आगे गए। आगे आठ स्‍तूप बहुत खूबसूरत लग रहे थे और आँखों को भा रहा था सफेद रंग। जगह-जगह मुरादों वाला पत्‍थर रखा हुआ था। सफेद-चि‍कने पत्‍थर, एक के ऊपर एक रखे हुए। घुमावदार रास्‍ते को पार करते हम मंदि‍र तक पहुँचे। पीतल की वि‍शाल बौद्ध  प्रति‍मा देखने योग्‍य है। तांबे और पीतल की प्रति‍मा के ऊपर सोने की परत चढ़ाई हुई है।  1650 के आसपास इसका नि‍र्माण हुआ था। इसे अब यह जर्जर अवस्‍था में है मगर बौद्ध मंदि‍र में जब आप प्रवेश करेंगे तो आपको बहुत शांति‍ का अनुभव होगा। भि‍त्ति-चि‍त्र भी बेहद अच्‍छे हैं। बाहर नि‍कलने से पूरा लेह नजर आता है।

हम नीचे उतरे तो बाहर एक गोलगप्‍पे वाले को देखा। मेरी नजर से पहली बार गुजरा था यह। हमारे तरफ तो खूब खाया जाता है। मन कि‍या स्‍वाद ले यहाँ। अच्‍छा लगा। उस लड़के से पूछा -कहाँ के हो ? जैसा कि‍ अनुमान था, जवाब मि‍ला बि‍हार के भागलपुर। हमने बताया कि‍ हम भी उधर के हैं। गोलगप्‍पे जि‍से इधर राँची में फुचका कहा जाता है,  वह लड़का हमसे खुल गया। बताने लगा कि‍ उसका एक साथी यहाँ मजदूरी करने आया। लौटकर बताया तो हम भी साथ चले आए और पानीपूरी का ठेला डाल लि‍या। उसका साथी कहीं और ठेला लगाता है।  आश्‍चर्य नहीं अगली बार कुछ बरस बाद लेह जाने का मौका मि‍ले तो हर नुक्‍कड़-चौराहे पर हमें गोलगप्‍पे खाने को मि‍ले।

शे पैलेस के सामने सड़क पार कर एक छोटा सा ति‍ब्‍बती बाजार था, जि‍समें कुछ इमीटेशन ज्‍वेलरी मि‍ल रहे थे और घर सजाने के सामान। हमने कुछ खरीदा और नि‍कल पड़े ;क्‍योंकि‍ बस आज का दि‍न था हमारे पास। पंगोग और नुब्रा जाते-आते हम स्तोक महल जो लेह से 17 किमी दूर स्थित है, बाहर से ही देख लि‍ए थे।  स्तोक महल में शाही परिवार के लोग रहते हैं। यहाँ के संग्रहालय में लद्दाखी चित्र, पुराने सिक्के ,शाही मुकुट, शाही परिधान एवं अन्य शाही वस्तुए संगृहीत है।

गोस्‍पा तेस्‍मो भी लेह महल के पास ही बनाया गोस्पा अर्थात बौद्ध मठ एक शाही मठ है. महात्मा बुद्ध की प्रतिमा से सुसज्जित यह मठ पर्यटकों को दूर से ही आकर्षित करता है। हमने भी दूर से ही प्रणाम कि‍या। और भी कई मठ दि‍खे, जो बेहद आकर्षक लगे,मगर समय का अभाव था। रास्‍ते में पड़ने वाले खूबसूरत चेमरे मोनेस्‍ट्री chemery monastery की तस्‍वीरें भी सहेज ली थी।

‘ द इडि‍योटि‍क वॉल’

अब हमे जाना था हेमि‍स की ओर। मगर उसके पहले रास्‍ते में ड्राइवर जि‍म्‍मी ने पूछा- “वो स्‍कूल देखना है जहाँ थ्री इडि‍यट की शूटिंग हुई थी।”हमने कहा- “हाँ, देखते चलते हैं।”

कुछ ही देर में हम स्‍कूल के बाहर थे। हमारे जैसे कुछ और लोग भी अंदर जा रहे थे। बहुत खूबसूरत साफ परि‍सर। घुसते ही बाईं तरफ एक कैफ़ेटेरि‍या है ‘ द रैंचो कॉफी शॉप ‘ । बच्‍चे अपने कक्ष में पढ़ाई कर रहे थे। इस स्‍कूल का नाम है द्रुक व्‍हाइट लोटस स्‍कूल। इसे उस फ़िल्‍म के बाद से रैंचो स्‍कूल कहा जाने लगा है। 2010 में बादल फटने के बाद यह स्‍कूल पूरी तरह बर्बाद हो गया था,परंतु आमि‍र खान और सेना के सहयोग से फि‍र से यह सुचारू रूप से चलने लगा है।

स्‍कूल के अंदर एक दीवार है जि‍स पर लि‍खा है ‘ द इडि‍योटि‍क वॉल’ और ‘ ऑल इज वेल’ । दीवार में फि‍ल्‍म के कई दृश्‍य पेंटिंग कर उकेरे गए है। बड़ा अजीब लगा देखकर कि‍ कई पर्यटक फि‍ल्‍म में सू-सू वाले सीन की एक्टिंग करते हुए फोटो खिंचवा रहे थे। हम तुरंत ही वहाँ से नि‍कले।

 हेमि‍स मठ 

अब हेमि‍स की ओर। कुछ दूर बाद बेहद खूबसूरत द्वार मि‍ला। रास्‍ते की बेमि‍साल खूबसूरती का जि‍क्र क्‍या करूँ। ऊँची पहाड़ी में हमारी गाड़ी चढ़ती जाती है और हम अभि‍भूत होते जाते हैं। खासकर यह सोचकर कि16वीं सदी में जब आवागमन की पर्याप्‍त सुवि‍धा भी नहीं थी, तब इतने दुर्गम मठों का नि‍र्माण कि‍स तरह कराया गया होगा।

मठ पहुँचने के पहले ही कई छोटे-छोटे लामा मि‍ले हमें। अपने हाथों में थैला उठाए, तो कुछ तालाब में नहाते मूँड़े सिर वाले लामा। बहुत अच्‍छा लगा देखकर। मठ के पास पहुँचकर पहले टि‍कट लेना पड़ा। इसके बाद हम जब अंदर आए तो वाकई आँखें हैरत से खुली रह गईं।

लेह से करीब 45 कि‍लोमीटर की दूरी पर है हेमि‍स मठ। इसका नि‍र्माण 1630 ई में स्‍टेग्‍संग रास्‍पा नंवाग ग्‍यात्‍यो ने करवाया था।1972 में राजा सेंज नापरा ग्‍वालना ने मठ का पुर्नर्नि‍माण करवाया। मठ की स्‍थापना धर्म की शि‍क्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से की गई थी। जब हम पहुँचे तो बहुत भीड़ नहीं थी। पहले एक मंदि‍र में गए। वहाँ बुद्ध की एक सुंदर प्रति‍मा थी। मोहक, सौम्‍य। प्रति‍मा ने नारंगी रंग का वस्‍त्र धारण कि‍या हुआ था। प्रति‍मा छोटी थी। अब हम मुख्‍य मंदि‍र की ओर चले, जो बि‍ल्‍कुल पास ही में था।

यह मूर्ति अपेक्षाकृत बड़ी थी और परि‍धान का रंग पीला था। यहाँ का मुख्‍य आकर्षण ताँबे की धातु में ढली भगवान बुद्ध की प्रति‍मा है। लामा बैठकर मंत्रोच्‍चारण कर रहे थे। बि‍ल्‍कुल शुद्ध आध्‍यात्‍मि‍क वातावरण, जहाँ ध्‍यान लगाने का मन करे। अभी इस मठ की देखरेख द्रुकपा संप्रदाय के लोग कि‍या करते हैं। हेमि‍स में जाकर जब मन्‍त्रोचार के बीच आप दर्शन करते हैं बौद्ध मूर्ति का तो नि‍:संदेह आत्‍मि‍क शांति‍ का अनुभव करेंगे।

बाहर दो छोटे चबूतरे में लाल और सफेद रंग के दो झंड़े हवा में उड़ रहे थे। परि‍सर बहुत बड़ा है। इसके बाद हम तीसरे कक्ष में गए। यहाँ बौद्ध की प्रति‍मा थी मगर उ्ग्र मुखमुद्रा थी। लकड़ी के कई खंभों पर टि‍का था छत। वहीं से लकड़ी की सीढ़ि‍याँ ऊपर तक गई। हमलोग भी छत गए खूबसूरत मठ है साथ ही पीछे की पहाड़ी से और खूबसूरती बढ़ गई। अब हम बाहर आकर भि‍त्तिचि‍त्र देखने लगे। मठ की दीवारों पर जीव चक्र को दर्शाते कालचक्र को भी लगाया गया है। उधर दूर पहाड़ि‍यों के ऊपर भी एक बुद्ध प्रति‍मा दि‍खी। कुछ देर परि‍सर में घूमने और दो मंजि‍ला मठ के दर्शन के बाद हम संग्रहालय देखने के लि‍ए गए। यहाँ एक समृद्ध संग्रहालय भी है। यह मुख्‍य मार्ग से काफी दूर पर है और बहुत ही वि‍शाल परि‍सर में है।

इस संग्रहालय में हेमि‍स मोनेस्‍ट्री का इति‍हास और पुराने राजाओं की तस्‍वीर के साथ कई महत्त्वपूर्ण जानकारी भी दी गई है। मगर तस्‍वीर लेने की इजाजत नहीं।  यहाँ हर वर्ष वार्षिक उत्‍सव का भी आयोजन कि‍या जाता है। यह प्रत्येक वर्ष गुरु पद्यसंभवा, जिनके प्रति लोगों का मानना है कि उन्होंने स्थानीय लोगों को बचाने के लिए दुष्टों से युद्ध किया था, की याद में मनाया जाता है। इस उत्सव की सबसे खास बात मुखौटा नृत्य है जिसे देखने के लिए देश-विदेश से कई लाख लोग आते हैं।

स्तकना गोम्‍पा

अब वापस लेह शहर की ओर। सिन्धु के कलकल को महसूसते हुए वापस लौट चले कि‍ अब अब आज भर इस सुंदर संसार का हि‍स्‍सा बनना है। भर लो आँखों में खूबसूरती। हमारे साथ-साथ सिन्धु भी बलखाती चल रही थी कि‍ मेरी नि‍गाह दूर एक मठ पर पड़ी। जि‍म्‍मी से पूछा-कौन सा मठ है। उसने बताया स्तकना। मुझे वह इतना खूबसूरत लगा कि‍ वहीं गाड़ी सड़क कि‍नारे रोक दी। जाने की इच्‍छा को त्‍यागना पड़ा ,क्‍योंकि‍ कई कि‍लोमीटर अंदर जाना पड़ता।  हालाँकि‍ लेह से इसकी दूरी मात्र 25 किमी दक्षिण में है। स्तकना यानी (टाइगर नाक) की आकार की एक पहाड़ी पर स्थापित एक बौद्ध मठ है। इसका निर्माण लगभग 1580 में महान विद्वान संत चोसजे जम्यांग पालकर ने किया था।

शाम होने से पहले सिन्धु का कि‍नारा, गोल-गोल पत्‍थर और पीछे नदी के कलकल के साथ दूर स्‍तकना मठ। नदी के दोनों पाट के कि‍नारे हरे-हरे पेड़। उसके ऊपर आसमान में सफेद बादल। नजर हटाना मुश्‍कि‍ल है वाकई। मैं बहुत देर वहीं ठहरी रही। मन नहीं हो रहा था कि‍ नजर हटाऊँ वहाँ से।

हॉल ऑफ फेम

मुसाफि‍र कहाँ ठहर पाते हैं बहुत देर। अब नि‍कले तो सीधे पहुँचे हॉल ऑफ फेम । लद्दाख में भारतीय सेना की वीरता व कुर्बानियों का इतिहास समेटने वाले हॉल ऑफ फेम को एशिया के सर्वश्रेष्ठ 25 संग्रहालयों की सूची में शामिल किया गया है। यह संग्रहालय देश के पाँच संग्रहालयों में सबसे ऊपर है। हॉल ऑफ फेम का निर्माण लेह में 1986 में हुआ था। इसमें लद्दाख में सियाचिन ग्लेशियर व कारगिल में पाकिस्तान से हुए युद्धों के साथ अन्य सैन्य अभियानों में भारतीय सेना की उपलब्धियों के साथ क्षेत्र की कला व संस्कृति को भी सँजोया गया है।इसमें युद्ध स्मारक के साथ वार सीमेट्री, एडवेंचर पार्क बनाकर लोगों को समर्पित किया गया है। सेना की शौर्य गाथा जान पाए यहाँ आकर हम। साथ ही वहाँ से कुछ गरम कपड़े खरीदे।

अब वापस होटल की ओर । रास्‍ते में बाजार का एक चक्‍कर जहाँ लोग हाथों में छोटे-छोटे धर्म चक्र घुमाते हुए सूखे खूबानी और बाकी दैनि‍क उपयोग की चीजें बेच रहे थे। हम वापस होटल आए और रात में प्रसि‍द्ध ‘ति‍ब्‍बती कि‍चन’ में कैंडि‍ल लाइट डि‍नर लि‍ए। बस ..सुबह लेह से दि‍ल्‍ली की उड़ान फि‍र वापस अपने घर रॉची।

संपर्क:रश्‍मि‍ शर्मा ,(स्‍वतंत्र पत्रकार और लेखि‍का),रमा नर्सिंग होम, मेन रोड,रांची , झारखंड-834001

ई मेल- rashmiarashmi@gmail.com