हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

वंचित संवेदना का साहित्य - डॉ.विष्णुकांत

साहित्य में समय-समय पर विभिन्न धाराओं को प्रभाव देखा जाता रहा है। युगीन परिस्थितियों के फलस्वरूप साहित्य में परिवर्तन एवं नवीन वादों एवं विमर्शों का परिलक्षण हुआ है। दलित साहित्य का उद्भव महाराष्ट्र में मराठी साहित्य में एक साहित्यिक-सामाजिक विद्रोह के रूप में हुआ है, जिसके माध्यम से दलित, शोषित समाज का विद्रोह मुखरित हुआ, उसी तरह सदियों से सताई जाती रही स्त्रियों की वेदना स्त्री विमर्श के माध्यम से मुखरित हुई. आदिकाल से ही स्त्रियों का जितना शोषण समाज द्वारा किया गया उतना किसी अन्य का नहीं माना जा सकता;  क्योंकि हर जाति में स्त्री सिर्फ़ स्त्री है और शोषण उसकी नियति। आदिवासी शब्द आदि और वासी का संधिरूप है जिसका अर्थ मूल निवासी होता है, पंरतु मूल निवासियों का विस्थापन तथा घर से बेघर किया जाना निरंतर चालू है। जंगलों में जीवन व्यतीत करते आदिवासी बहुत दयनीय अवस्था में जीते हैं। आदिवासियों की संवेदना का परिचय हमें आदिवासी साहित्य दिलाता है। तीन धाराएँ, तीन दिशाएँ, तीन संवेदनाएँ  परंतु तकलीफ या दर्द सभी का समान और वह है समुचित रूप से शोषण। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब सभी का दर्द समान है और मर्म भी समान है तो उसके लिए अलग-अलग नामों का प्रचलन क्यों। वह इसलिए हो सकता है कि भारत तो है ही विविधताओं का देश। ऐसे में जब सब कुछ भिन्न-भिन्न हैं, तो भले ही दर्द समान हो; परंतु एक तो हो ही नहीं सकते, भले ही हम अनेकता में एकता का दंभ प्रदर्शित करते रहें। इतिहास साक्षी है भारत के लोग कभी एक नहीं रहे। किसी न किसी रूप में फूट देखी ही जाती रही। उसमें से वर्ण-व्यवस्था का जहर तो ऐसा घुला हुआ है सम्पूर्ण भारतीय समाज में कि उसे मुक्ति पाई ही नहीं जा सकती। ऊपर से  भले ही समता का दिखावा किया जाता रहे; परंतु अंदर से हम कभी एक रहे ही नहीं और हो भी नहीं सकते।
समाज एक न था, न है और न हो सकता है फिर भी हम सभी एक ही समाज के अंग हैं और इसी भावना को बलबती करता है डॉ। विजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा वंचित संवेदना का साहित्य (2015)  शीर्षक से तीन ग्रंथों की एक कड़ी का संपादित किया जाना। प्रस्तुत पुस्तक के तीन खंड हैं-प्रथम खंड दलित-विमर्श, द्वितीय खंड स्त्री विमर्श तथा तृतीय खंड आदिवासी विमर्श पर आधारित है। तीनों ही खंडों में देश के जाने-माने साहित्यकारों, विमर्शकारों की रचनाएँ  शामिल करके एक बहुत ही कठिन कार्य सम्पन्न कर दिखाया है संपादक ने। तीन धाराओं को एक साथ प्रस्तुत करने से प्रतीत होता है कि गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम कर दिखाया है। शामिल किए गए सभी लेख हिन्दी साहित्य में दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श के क्रमिक उभार, इनकी सैद्धांतिकी, उपलब्धियों और सीमाओं के विवेचन को समर्पित हैं।
प्रथम खंड में दलित विमर्श के 27 सुचिंतित आलेखों के माध्यम से भारतीय समाज में दलित प्रश्नों को उकेरा गया है। दलित समाज के सम्बंध में संपादक की मान्यता है कि आज भी दलित सिर्फ़ और सिर्फ़ दलित हैं तथा सदियों से चला आ रहा जातिगत संघर्ष आज भी उनके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय समाज में छुआछूत का यह आलम है कि एक अनपढ़ ब्राह्मण शिक्षित एवं ज्ञानी दलित को अपने समान समझने को आज भी तैयार नहीं है। मैत्रेयी पुष्पा (अछूत स्त्रियाँ मंदिर में) , शरण कुमार लिम्बाले (दलित सिर्फ़ दलित होता है) , गुर्रमकोंडा नीरजा (दलित आत्मकथाओं का समाजभाषिक संदर्भ) , तुलसीराम (लिखी नहीं, रोई जाती हैं दलित आत्मकथाएँ) , ऋषभ देव शर्मा (मानवाधिकारों की लड़ाई में दलित कहानियाँ) , कमल साहू (दलित साहित्य की भाषा) , भारती सागर (ग्रामीण भारत में दलित महिलाओं की प्रस्थिति एवं मुद्दे) , राजेशचंद्र पांडेय (दलित विमर्श: पुनः चिंतन) तथा विजेंद्र प्रताप सिंह (दलित, दलित साहित्य, भाषा और समकालीन कथासाहित्य में दलित चेतना) जैसे संग्रहणीय आलेखों से युक्त इस खंड के लेख दलित चिंतन को बखूबी उकेरते हैं।
द्वितीय खंड स्त्री विमर्श पर आधारित है। पल-पल कहीं-न-कहीं सताई जा रही औरतों वाले हमारे महान देश की 21वीं शताब्दी की वैश्विक उपलब्धियाँ गिनवानी हों तो शायद घरेलू हिंसा और बलात्कार या कुल मिलाकर स्त्रियों पर अपराध के मामले में हमारे देश को निर्विवाद रूप से स्वर्णपदक मिलने चाहिए. दरअसल हमारा समाज ऊपर-ऊपर से तो बदला हुआ दिखाई देता है पर भीतर से यह घोर जड़ता का शिकार है। स्त्रियों के मामले में तो हम अपनी मानसिकता को तिल भर भी बदलने को तैयार नहीं हैं। दोगले आचरण का हमारा पुराना इतिहास है। हम स्त्रियों को सदा से पूजते भी आए हैं और उन्हें सताने में भी हमारा सानी कभी नहीं रहा। आज भी हम स्त्रियों को आगे आने या ऊपर आने के लिए खूब लफ्फाजी करते हैं और साथ ही उनके प्रति भोगवादी रवैये को तनिक भी बदलना नहीं चाहते। आज स्वाधीन होती हुई भारतीय स्त्री के चारों तरफ पुरुष-वर्चस्व ने नई तरह की गुलामी की बाड़ लगा दी है। हम आज भी स्त्री को पुरुष से कमतर आँकते हैं और उसके मनुष्य होने के अधिकार को व्यावहारिक रूप में चरितार्थ नहीं होने देते। स्त्री विमर्शात्मक साहित्य भारतीय समाज के इस दोगले और घिनौने चहरे को बेपर्दा करने का काम करता है। वह इतना भर चाहता है कि स्त्री रूप में जन्म लेने के कारण किसी जीव को मनुष्य होने के अधिकार से वंचित न रखा जाए. इस समुदाय की वंचित संवेदना को (अथवा वंचित समुदाय की संवेदना को) इस खंड में भली प्रकार विवेचित किया गया है। मृदुला गर्ग, सुधा अरोड़ा, संगीता पुरी, सुषम बेदी, सुशीला टाकभोरे, गुर्रमकोंडा नीरजा, रोहिणी अग्रवाल, गिरिराजशरण अग्रवाल, प्रीत अरोड़ा और विजेंद्र प्रताप सिंह सहित 29 लेखकों ने इस खंड में बहुत सूक्ष्मता और ईमानदारी और विस्तार के साथ हिन्दी के स्त्री विमर्शात्मक साहित्य की व्यापक पड़ताल की है। स्त्री विमर्श पर शोध करने वालों के लिए यह एक आवश्यक ग्रंथ है।
वंचित संवेदना का साहित्य शीर्षक ग्रंथ-त्रयी का तीसरा खंड आदिवासी विमर्श को समर्पित है। इस खंड में रमणिका गुप्ता, निर्मला पुतुल, मधु कांकरिया, हेमराज मीणा, गंगा सहाय मीणा, विनोद विश्वकर्मा, विजेंद्र प्रताप सिंह, सातप्पा लहु चव्हाण आदि सहित 25 विमर्शकारों के आदिवासी और जनजातीय साहित्य की पड़ताल करने वाले आलेख सम्मिलित हैं। संपादक ने यह स्पष्ट किया है कि स्त्री और दलित विमर्श की तुलना में आदिवासी विमर्श की प्रकृति और प्रवृत्ति नितांत भिन्न है। स्त्री विमर्श जाति के प्रश्न को नहीं समझता। केवल स्त्री अधिकारों तक सीमित रहता है। दलित विमर्श जाति को इतना अधिक महत्त्व देता है कि स्त्री-प्रश्न को भी जातियों में बाँट लेता है। लेकिन आदिवासी विमर्श विकास में पिछड़े हुए स्त्री पुरुषों का जातिनिरपेक्ष विमर्श है। वह अपनी रचनात्मक ऊर्जा आदिवासी विद्रोह की परंपरा से लेता है। इसलिए आदिवासी साहित्य को अन्य साहित्य की तुलना में विद्रोही साहित्य या जीवनवादी साहित्य कहा जाता है। आदिवासी विमर्श को उन्होंने उस परिवर्तनकामी चेतना का रचनात्मक हस्तक्षेप माना है जो देश के मूल निवासियों के वंशजों के प्रति किसी भी प्रकार के भेद भाव का पुरजोर विरोध करती है तथा उनके जल-जंगल-जमीन और जीवन को बचाने के हक में उनके आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ खड़ी होती है। अपने अद्यतन संदर्भों के कारण यह खंड सामान्य पाठकों और शोधार्थियों दोनों ही को अत्यंत उपादेय प्रतीत होगा।
प्रस्तुत ग्रंथ त्रयी के प्रकाशन के पीछे संपादक की मंशा तीनों विमर्शों की सामग्री को एक साथ पाठकों तथा शोधार्थियों के लिए उपस्थित कराने की रही है। संपादक ने समन्वयक दृष्टिकोण अपनाते हुए आमुख में स्पष्ट किया है कि “वंचित संवेदना का साहित्य” शीर्षक से दलित विमर्श की प्रस्तुत पुस्तक आप सभी को सोंपते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। यूँ तो दलितों से सम्बंधित पुस्तकों का नाम रखते समय अधिकांशतः दलित शब्द का सहारा लिया जाता है परंतु मैं दलित शब्द का सहारा न लेते हुए भी दलित विमर्श की पुस्तक प्रस्तुत करने की धृष्टता कर रहा हूँ। यही मान लीजिए कि लीक से हटकर कुछ प्रस्तुत करने का विचार रहा है। यह नाम रखने के पीछे। …इस नाम का चयन करने के पूर्व मैंने कुछ स्थापित विचारकों से विचार विमर्श किया, कुछ ने नाम बदलने का सुझाव दिया, कुछ ने सिरे से नकारा, कुछ ने स्वागत किया। सभी को साधुवाद। …इसी शीर्षक से आपको दो पुस्तकें और भी पढ़ने को मिलेंगी स्त्री विमर्श तथा आदिवासी विमर्श पर आधारित। संपादक के उक्त कथन से स्पष्ट होता है कि वह नाम के विवादों से दूर रहते हुए तीनों विमर्शों की अच्छी सामग्री पाठकों को देने के प्रति आग्रही हैं और वे इस कार्य में सफल भी हुए हैं। तीनों ही विमर्शों जाने माने चिंतकों के साथ नए आलोचकों की रचनाओं को भी स्थान दिया गया है जिससे कि दोनों पीढ़ियों के विचारों से सुधि पाठक जगत परिचित हो सके.

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वंचित संवेदना का साहित्य, खंड-1-दलित-विमर्श, खंड-2-स्त्री-विमर्श, खंड-3-आदिवासी विमर्श,संपादक-विजेंद्र प्रताप सिंह, सहायक प्रोफेसर (हिंदी) , राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जलेसर, एटा, प्रकाशन वर्ष-2015,प्रकाशक-आकांक्षा पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली,
खंड 1-296 पृष्ठ, खंड 2-296पृष्ठ, खंड3-222 पृष्ठ,समेकित मूल्य-रु.2400 तीनों खंड

-0-डॉ .विष्णुकांत,सहायक प्रोफेसर (अंग्रेजी) ,राजकीय महिला महाविद्यालय, कुरावली,मैनपुरी, उत्तर प्रदेश