हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

 वतन की आबरू - आचार्य संदीप कुमार त्यागी ‘दीप’

 नौजवां

 है अशान्त देश फिर भी सो रहा क्यों नौजवां ?

बीज खुद ही दासता के बो रहा क्यों नौजवां ?

सरहदों पे शत्रुसेना युद्ध के लिए खड़ी।

बिलख रही है सभ्यता व संस्कृति कहीं पड़ी।।

कायरों की भाँति किन्तु रो रहा क्यों नौजवां ?

शिवा प्रताप जैसे वीर लुप्त हो गये कहाँ।

घोष वन्देमातरम् प्रलुप्त हो गये कहाँ।।

कामी बनके देश को डुबो रहा क्यों नौजवां ?

जम्मू-काश्मीर धू-धु करके देखो जल रहा।

पंचनद प्रदेश प्यारा मोम सा पिघल रहा।।

हो खड़ा समय को व्यर्थ खो रहा क्यों नौजवां ?

चाहे तो तूफान का भी तू बदल दे आज रूख।

हिमाद्रि को हिला दे और दुःख को बना दे सुख।।

फिर भी तू हताश आज हो रहा क्या नौजवां ?

2.हम होने नहीं देंगे

 वतन की आबरू नीलाम हम होने नहीं देंगे|

कोई सरहद कभी बदनाम हम होने नहीं  देंगे||

मिसाइल तोप या एटम बमों से हम भी वाकिफ हैं |

गलत अब जंग का अंजाम हम होने नहीं देंगे ||

हरेक अबला के अस्मत की हिफाजत की कसम ली है|

कही कोई घिनौना काम हम हम होने नहीं  देंगे||

जिहादी भाड़ में मत भीड़ को भूनो चनो जैसा|

तले  मजहब के कतले आम हम होने नहीं देंगे||

हरेक दिल हो खुदा का घर औ मन मंदिर अयोध्या का|

राम के नाम पर कोहराम हम होने नहीं देंगे|

बुलंदी हौसलों की मंजिलों पर हक जमाएगी |

कोई उम्मीद अब नाकाम हम होने नहीं देंगे||

दरिन्दे रौशनी के है अदू चमगादड़ों जैसे |

मगर संदीप काली शाम हम होने नहीं देंगे||

3. मुझे बस चाह है तेरी

किसी को चाहना दिल से खता बिल्कुल नहीं लेकिन
है सच्चाई कि चाहत में कभी मंज़िल नहीं मिलती ।।
नज़र के सामने ही क्यों न हो मौजूद वो दिलबर
जुबाँ कमबख़्त फिर भी वक्त पर मेरी नहीं खुलती ।।

स्वयं को खो दिया जिसने मुहब्बत में उसे यारों
कभी इज़हार ए उल्फत की ज़रूरत ही नहीं होती ।
अरे अहसास ए दिलबर ही करे महसूस जो हरदम
उसे हिजरत पै जाने की ज़रूरत भी नहीं होती ।।

तुझे पाना नहीं मुमकिन बखूबी जानता हूँ मैं,
मुझे जाने न जाने तू तुझे पहचानता हूँ मैं ।।
इबादत में खुदा़ से क्यों तुझे माँगूं मेरे दिलवर
हकीकत है खुदा तुझको ही अपना मानता हूँ मैं ।।

तुही मंज़िल तुही हमराह तू ही राह है मेरी ,
तुझे हो या ना हो मुझको बहुत परवाह है तेरी ।।
हमेशा गुनगुनाता हूँ तुझे गीतों में ग़ज़लों में।।
मैं दीवाना हूँ पागल हूँ मुझे बस चाह है तेरी ।।

-0-