हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

वासंती गलियाँ - डॉ.भावना कुँअर

मेरी चाहत…

एक सच्चे सन्त- सी

डॉ.भावना कुँअर

पर समझ न पाया कोई

एक हाथ बढ़ा आगे…

मैंने कर दिया  न्योछवर

और तन भी और मन भी

पर छलिया निकला वो

टूटकर बिखर गए सारे ही सपने…

टूटे टुकड़े संग में ले…

मैं बढ़ाने लगी कदम

ऊबड़-खाबड़ राहों पर

जाने  क्यों  बस गिरती ही जाती…

सामने थी मौत की गहरी खाई

मेरा पैर फिसला

और मैं गिरने लगी

तभी किसी ने खींचा अपनी ओर…

देखा था मैंने

उसकी आँखों में…

झील-सा गहरा प्यार

खोलीं उसने मन की सभी परतें…

और ले गया मुझे

महकती खिलखिलाती

उन बासंती गलियों में…