हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

विशेष काव्य - डॉ.अंसार कम्बरी

दोहे : डॉ. अंसार कम्बरी

1

 सागर से रखती नहीं , सीपी कोई आस ।

एक स्वाति की बूँद से , बुझ जाती है प्यास ।।

2

राज़ छिपा कर रख नहीं , अपना मुख भी खोल ।

काहे तू खामोश है , ऐ दिल कुछ तो बोल ।।

3

चुप्पी जब तोड़ी नहीं , मैंने सारी रात ।

उसने कैसे जान ली , अंतर्मन की बात ।।

4

एक तरह रहते नहीं , जीवन के हालात ।

कभी हुए हैं दिन बड़े , कभी हुई हैं रात ।।

5

केवल गरजें ही नहीं , बरसें भी कुछ देर ।

ऐसे भी  बादल पवन , अब ले आओ घेर ।।

6

तट से नौका खोल दी , देखा नहीं बहाव ।

तूफानों से खेलना , अपना रहा स्वभाव ।।

7

चाहे दुनिया घूमिए , करिए लाख प्रयत्न ।

मन-सागर मंथन बिना , नहीं मिलेंगे रत्न ।।

8

मेहनतकश तो धूप में , जला रहा है खून ।

ठेका जिसके पास है , रहता देहरादून ।।

9

ख़त्म कभी होता नहीं , मानव मन का कोष ।

चाहे बाँटे प्रेम वो , चाहे बाँटे रोष ।।

10

विश्व बचाना है अगर , देश रखें सब मेल ।

बम चलते इस दौर में , चलती नहीं गुलेल ।।

11

घाव लगा तलवार का , भर जाता है यार ।

घाव न भरता उम्र भर , बातों से मत मार ।।

-०-

चार ग़ज़लें : डॉ. अंसार क़म्बरी

1

वो सुनहरे दिन हमें, रातें सुहानी दे गया
चाँद-तारे और सूरज सब जबानी दे गया

छीन कर सपने मेरी आँखों में पानी दे गया
वो भी प्यासा था जो दरिया को रवानी दे गया

अबके बादल मेरे आँगन में करिश्मा कर गया
साँवली सूरत में आया रंग धानी दे गया

जाते-जाते उसने दिल पर ढाई आखर लिख दिए
यानी जो पूरी न होगी वो कहानी दे गया

सर से जब ओढ़ी तो मेरे पैर बाहर हो गए
वक़्त मुझको फिर वही चादर पुरानी दे गया

प्यार लेकर आपसे, कुछ गीत देकर ‘क़म्बरी’
एक निशानी ले गया और एक निशानी दे गया

2

मुझपे वो मेहरबान है शायद
फिर मेरा इम्तेहान है शायद

उसकी ख़ामोशियाँ ये कहती हैं
उसके दिल में ज़बान है शायद

मुझसे मिलता नहीं है वो खुलकर
कुछ न कुछ दरमियान है शायद

उसके जज़्बों की क़ीमते तय हैं
उसका दिल भी दुकान है शायद

मेरे दिल में सुकून पाएगा
दर्द को इत्मिनान है शायद

फिर हथेली पे रच गई मेंहदी
फिर हथेली पे जान है शायद

बात सीधी है और गहरी है
‘क़म्बरी’ का बयान है शायद
3

ज़र्द पत्तों को गिर ही जाना था,
फिर नई कोपलों को आना था।

हमको फिर जश्ने-ग़म मनाना था,
जाम पीना था और पिलाना था।

लोग बैठे थे जिसमे राहत से,
वो मोहब्बत का आशियाना था।

आंधियों का वो खौफ़ क्यूं करता,
जब दिया ही नहीं जलाना था।

उतनी  ऊँची तो तुझमें बात नहीं,
जितना ऊँचा तेरा घराना था।

इसमें जज़्बात की मशीनें हैं,
मेरे घर दिल का कारखाना था।

आज भी शायरी में ढलता है,
‘क़म्बरी’ दर्द जो पुराना था।

-०-

4-वासंती ग़ज़ल

खिल उठी सरसों की कलियाँ दिन सुहाने आ गए,
आ गया फागुन कि हर बाली में दाने आ गए।

फूल महुवे के झरे मौसम शराबी हो गया,
आम के बागों में खुशबू के खज़ाने आ गए।

आ गया फागुन मेरे कमरे के रौशनदान में,
चन्द गौरय्या के जोड़े घर बसाने आ गए।

नाचती  – गाती हुई निकलीं सड़क पर टोलियाँ,
खिड़कियों पर चन्द चेहरे मुस्कुराने आ गए।

एकता सदभावना के रंग लेकर ‘क़म्बरी’,
आपकी महफ़िल में देखो गुनगुनाने आ गए।

-०-

दो गीत : अंसार क़म्बरी

1-प्रतीक्षा

 

तन में उसके आग लगी है, मन में मधुशाला है
लगता है परदेसी प्रियतम घर आने वाला है

कमरे की वो करे सफाई,
कोना – कोना झाड़े
आहट हो तो दरवाजे को
देखे आँखें फाड़े

घर की दीवारों में, छत में कहीं नहीं जाला है
लगता है परदेसी प्रियतम घर आने वाला है

दौड़-दौड़कर, बार-बार वो
खिड़की से भी झाँके
दर्पण में जब चेहरा देखे
आँचल से मुँह ढांके

माथे टीका, कर में कंगन, कानों में बाला है
लगता है परदेसी प्रियतम घर आने वाला है

आकर बैठी है देहरी पर
रस्ता देख रही है
सुधियों की बाहों में खुद को
कसता देख रही है

चेहरा खिला-खिला हाथों में स्वागत की माला है
लगता है परदेसी प्रियतम घर आने वाला है

पल भर में लो बीत गईं सब
सपनों वाली रातें
अब न करना   पड़ेगी उसको
मोबाइल से बातें

छलक रहा उसके अधरों पर अमृत का प्याला है
तन में उसके आग लगी है, मन में मधुशाला है
2
चाँदनी में नहा जाएगी  हर दिशा
आवरण आप मुख से हटा दें अगर

हर तरफ बज उठेगी मधुर रागिनी
रास्ता भूल जाएगी मन्दाकिनी
जो जहाँ है वहीँ पर ठहर जाएगा
गुनगुनाने लगेगी मिलन यामिनी

मंजिलें प्यार की पास आ जाएँगी
दूरियाँ आप थोड़ी घटा दें अगर

बात ऐसे हो जिसको न कोई सुने
प्रीत के क्षण निरंतर रहें गुनगुने
नेह की चूनरी ऐसे तैयार हो
एक ताना बुने, एक बाना बुने

कौन देखेगा फिर हिरनियों के नयन
आप पलकें ज़रा सी उठा दें अगर

एक वातावरण यूँ बने प्रीत का
एक संसार रच जाए संगीत का
इस तरह से मुखर हों हमारे वचन
जन्म होता हो जैसे किसी गीत का

उर्वशी, मेनका मुग्ध हो जाएँगी
आप मुस्कान अपनी लुटा दें अगर
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डॉ. अंसार क़म्बरी,‘ज़फ़र मंज़िल’,11/116, ग्वालटोली ,कानपुर -208001

मो. 9450938629