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विसंगतियों को दूर करने की शुभेच्छा - अनिता मण्डा

ऐसे दिन का इंतज़ार- जैसा का कि नाम से ही ध्वनित हो रहा है कि यह एक ऐसे समय की प्रतीक्षा है या शुभेच्छा है जब मानव समाज में कुछ बेहतरीन घटित हो। धर्म-जाति के विवादों से परे मानवता का विकास हो और नई पीढ़ी इन विवादों से अभिशप्त न हो।

1111बोधि प्रकाशन से संकलित ब्रज श्रीवास्तव के इस कविता-संग्रह में  मध्यम आकार की 73 कविताएँ हैं। इनमें फैलाव की जरूरत भी नहीं। कविताओं के विषय वर्तमान जीवन के आस-पास घटित घटनाओं और परिवेश की विसंगतियों से आए हैं।इन कविताओं की भाषा प्रांजल तथा संवेदना गहन है। कविताओं का अन्तर्गठन अच्छा है, प्रतीकों में दुर्बोधता नहीं है। अत्यधिक बिम्बों के माध्यम से कोरा बौद्धिक आत्मालाप न होकर सहजता, सहृदयता, सरलता है।

मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है और कवि संवेदना के स्तर पर अन्य लोगों से कुछ ज्यादा ही अनुभव करता है; इसलिए समाज में कुछ भी घटित हो रहा है ,उसे गहराई से देखता समझता है। टूटते मूल्यों, सूखते रिश्तों के सोते कवि मन को आहत करने को काफी हैं। इन परिस्थितियों से उपजे अवसाद से पार पाने के लिए अच्छे की कामना करता है। सकारात्मक को बढ़ावा देता है। यह एक शुरुआत ही सही पर कुछ तो हो रहा है इस क्षेत्र में।

ब्रज श्रीवास्तव अपनी रचना प्रक्रिया पर कहते हैं – ” कविता.. कविता मेरे लिए क्या नहीं है, मन की बात कहने का ज़रिया है, एक उपाय है तनाव को शिफ्ट करने का। सुंदरता को महसूस करने के लिए एक सूत्र है, कुदरत के कामों पर खुद को ही चकित कराने की वजह है, संवेग को तरीके से धारण करने का साधन है,अपने मानसिक अनुकूलन के लिए जरूरी है मेरी कविता। दरअसल तो वह मुझसे झिलमिल तारे की तरह जुड़ी है लगने में कभी बिलकुल सगी, कभी निस्पृह। कभी अपनी मुस्कान से मेरे साथ होने का भरोसा देती हुई, कभी मेरी तरफ पीठ किए बैठी हुई। कविता मुझे, अपनी पीठ पर बैठाकर तेजी से उड़ती हुई एक चिड़िया है जिस पर मैं नन्ही जान की तरह डरता, और रोमांचित होता रहता हूँ।”  संग्रह की पहली कविता ‘माँ की ढोलक’ में कवि पुराने समय की बात याद करते हुए जब कहता है ‘दरअसल तब लोग लय में जीते थे’  तो वह वर्तमान जीवन के बदलावों को रेखांकित करता है तथा परिणामस्वरूप खोई जीवन की लय का महत्व बताता है।

विरोध की आवाज उठाने के संदेश को बोझिल बनाए बिना किस तरह से कहा जाता है यह कविता ‘यह सोचना ठीक नहीं’ (पेज 59) में दिखता है ‘हमारा प्रतिरोध करना ही/ हमारे होने के हस्ताक्षर/ छोड़ता है कई बार’

‘सवाल सच का’ कविता सच को विभिन्न दृष्टियों से देखती हुई वर्तमान में विभिन्न देशों शस्त्रीकरण को मानवता के विरुद्ध देखती है, विश्व-बन्धुत्व के विचार को पोषित करते हुए कवि कहता है कि ‘धरती से बाहर कोई मुल्क नहीं’

कविताओं का मूल स्वर शुभेच्छा है कविता ‘एक मनोकामना’ (पेज 14) में यह स्वर चरम पर है ‘सूरज बस इतनी ही करे आँखें लाल/ कि हरियाते रहें जीवन के पौधे’।

वर्तमान जीवन की आपाधापी को कविता ‘दौड़’ में इस तरह से देखा गया है कि भागते समय की दौड़ में सब भाग रहे हैं पर कोई भी पदचिह्न छोड़ने या कोई उल्लेखनीय कार्य करना भी सम्भव नहीं हो पा रहा।

अधिकतर कविताएँ अनुभव से उपजी कविताएँ हैं ; जिनमें कोरी भावुकता न होकर जमीनी ठोसपन है, गहराई है। भोगे हुए की पीड़ा का स्वर है।

वर्तमान जीवन की विसंगतियों महँगाई, बजट, आतंकवाद, हत्याएँ, आंदोलन के कारण जीवन में प्रेम का स्थान दोयम दर्जे का हो गया है। यह भाव कविता ‘मेरी दिनचर्या में’ में पूरी शिद्दत के साथ मुखरित हुआ है ‘प्रेम पंक्ति में खड़ा रहा संकोच के साथ’

‘वह प्रसंग’ में स्वप्न में बम ब्लास्ट देखकर ‘जीवन बेसुरा महसूस’ होने की बात करते हुए दुःस्वप्न से बाहर आने का स्वप्न देखने की बात है। जबकि यह मात्र दुःस्वप्न नहीं है। आक्रोश कहीं भी जोर नहीं पकड़ता, बात को रेखांकित कर कवि अलग हट जाता है, जिसका असर तुरंत नहीं दिखता पर आपकी स्मृति में वो स्वर स्थान बना लेता है।

‘माँ प्रवास पर है’ (पृष्ठ 78) कविता माँ को समुद्र की तरह देखना और पिता के न रहने पर उपजी उदासी का चित्र तथा माँ के घर से बाहर रहते हुए भी मन संतान में रहना, यहाँ स्त्रीमन को सहजता से उकेरता है।

स्मृतियों के सहारे आई कविताएँ आम आदमी की अनुभूतियाँ हैं। ‘याद’ (पृष्ठ  20) समय स्थान परिवर्तन के बाद भी जो चीज़ बची रहती है ,वो है याद ‘तुम्हारे और मेरे मैं के बड़े होने के बीच एक चीज धीमें से पलती रही।’

‘उसका आत्मकथन’ (पृष्ठ21) प्रगति की होड़ में युवाओं से छूटे जा रहे नैसर्गिक जीवन और अनजाने ही इन्सान के मशीन में तब्दील हो जाने की बात है। प्रतिस्पर्धा, मल्टीनेशनल कम्पनियों में नौकरी, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को जुटाने की जुगत में जीवन जीने का समय मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाता है। जीवन पैसे कमाने का उपक्रम भर बन जाता है उस पर विडम्बना यह कि उस पैसों का उपभोग करने का समय भी नहीं मिलता। यह एक बड़ी सोच है जो कि इस कविता में उभरकर आई है।

आतंक मानवता के लिए अभिशाप है और यह मानव का ही उपजाया हुआ है। कवि आतंक उपजाने वालों को भेड़िये की श्रेणी में रख सहानुभूति रखता है इसके शिकार हुए लोगों से।एम्बुलेंस को आशाघोष कहकर नई स्थापना की है।शीर्षक कविता ‘ऐसे दिन का इंतज़ार’ (पेज 61) में वर्तमान हालात की फ़िक्र है, धर्मान्धता, जातिवाद, पोंगापंथी, आडम्बर, मानवता विरोधी गतिविधियों आदि सबको समाहित किया है अपनी बात में।

कविताओं में विषय विविधता पर दृष्टिपात करते हुए पाते हैं कि बुजुर्गों पर, वृद्धाश्रम, किन्नर, बरसात, भिखारी, श्रमिक, मोहल्ले के लड़के आदि विषय व्यापक रूप से आएँ  हैं।  कहीं-कहीं संवेदना की गहनता इतनी तीव्र है कि आँखें नम हुए बिना नहीं रहती ‘अंतिम यात्रा में’ ऐसी ही एक कविता है। केदारनाथ त्रासदी पर पाँच कविताएँ इसी श्रेणी की हैं जिनमें व्यंग्य का पुट भी है।

आज़ादी के सत्तर साल बाद भी मुल्क की तस्वीर  नहीं बदली है । आज भी बचपन शापित है मजदूरी करने को। शिक्षा, अधिकारों की बातें तो केवल भाषणों का हिस्सा भर बन कर रह गई हैं। इसी भाव पर केंद्रित ‘बच्चों की दुनिया में’ (पृष्ठ  27) बहुत ही मार्मिक कविता है। गरीबी ने बच्चों से हँसता-खेलता बचपन छीन जिम्मेदारी का बोझ अभी से कंधों पर रख दिया है। कवि को दुःख है कि ‘अभी भी हो रहा है ये /बच्चों की दुनिया में।

एक अच्छा व्यंग्य ‘है किसकी वजह से’ कविता में चुटीले अंदाज़ से आया है कि सिर्फ मानव के कार्य व्यापार से ही प्रकृति को बहुत क्षति हुई है। वर्तमान राजनितिक धार्मिक विसंगति के परिप्रेक्ष्य में ‘टोपी’ कविता व्यंग्य की तासीर रखती है। कविता ‘अपना पक्ष’ में ‘आखिर तुम कैसे हो/ तुम किस ओर हो / इंसानियत की तरफ़/ या सियासत की तरफ़ / अपना पक्ष तय करो/ तुम्हारे बारे में कुछ / तय हो जाए/ इससे पहले।’ बहुत कम शब्दों में कटाक्ष है।

‘ख़बरों का अर्घ्य’ – कविता में दिवंगत पिता को इस दुनिया के हालात सुनाते हुए कवि वर्तमान हालात पर दृष्टिपात करते  है- बढ़ी हुई भीड़, आबादी, कृतघ्नता, संचार क्रांति, भ्रष्टाचार का ज़िक्र  करते हुए ‘आख़िरी ख़बर यह कि/ अब ख़बरों से ही तय हो रही है / राजनीति की दिशा भी।’

‘देवी’ कविता में अपने शोषण के खिलाफ मौन रहने वालों को कवि चेतावनी देता है कि लोग तुम्हें देवता तो बना देंगे, लेकिन बदले में तुम्हारा सर्वस्व ले लेंगे। गेहूँ को विषय बनाकर कोई कविता इतनी अर्थपूर्ण भी हो सकती है ‘ग़नीमत मानता हूँ यही/ कि तुम लड़ते-झगड़ते नहीं/ हत्या और मारपीट नहीं करते/ मुझे खाने या न खाने का मुद्दा बनाकर।’

कुछ कविताओं में बिम्ब-विधान चमत्कृत करता है। कविता ‘अलविदा का गीत’ की शुरुआत कुछ इस तरह से ‘जिसे वह प्यार करते रहे/ उस पानी की आँखों में / आज पानी है।’ यहाँ पानी की आँखों में पानी देखना नए रूप में आया है।

प्रेम कविताओं में ‘ये कभी खत्म न हो’ ,’नहीं बदला’ , ‘हम और तुम’ ‘प्यार’ इनका स्वर लगभग एक जैसा है। कवि प्रेम को जीवन का जरूरी अंग मानता है। संयोग के क्षण ही वियोग में स्मृति का आधार बन सहारा बनते हैं। प्रेम नफ़रत का विरोध है, प्रेम पतझड़ के समय की बहार है। प्रेम की तलाश स्वयं की तलाश है। प्रेम मुश्किल समय में आशा का महीन स्वर है। ‘इसके रहते हमारे पास फटका नहीं अवसाद/ एकांत ने डसा नहीं हमें।’

आशा का स्वर बहुत बड़ी विशेषता है कवि की। अच्छी खबर शीर्षक कविता में कवि कहता है ‘अच्छी ख़बर अभी बस यही है/ कि दरवाज़ा तोड़कर/ बाहर आने में/ नाकाम हो रही है / बुरी ख़बर।’

कहीं -कहीं यह भी महसूस होता है कि कवि का लहज़ा टाइप्ड हो रहा है, अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आकर भी कभी कभार लिखना ठीक रहता है।

भाषा के तौर पर गौर करने योग्य बात है कि कवि ने स्वतः आ रही भाषा को ही लिया है, न उसे उर्दूनिष्ठ करने की चेष्टा की है, न संस्कृतनिष्ठ। आम जन की भाषा में उर्दू- हिन्दी का मिश्रण एक साथ प्रवाह से आ रहा है और प्रेम कविताओं को ताज़गी व मिठास दे रहा है।

इतने विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि काव्य संग्रह काफी अच्छा बन पड़ा है। जरूर पढ़ना चाहिए। अपनी अनुभूति की मिट्टी को गूँध कभी कवि दीपक बना रहा है जिसकी रौशनी में अँधेरे से लड़ा जा सके, कभी सुराही जिससे कि प्यास के समय में प्रेम की तृप्ति पा सकें।  ज़मीं से जुड़ी कविताओं का विस्तार गगन तक है।

 ऐसे दिन का इंतज़ार(कविता) : ब्रज श्रीवास्तव,मूल्य-100 ₹,  पृष्ठ- 96, संस्करण -2016,  प्रकाशक -बोधि प्रकाशन,एफ-77, सेक्टर 9, रोड नं. 11,करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम,जयपुर- 302006,ई-मेल: bodhiprakashan@gmail.com

संपर्क-अनिता मण्डा,आई-137 द्वितीय तल, कीर्ति नगर,नई दिल्ली 110015

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