हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

‘वीणा’ का विशेषांक ‘सृजनात्मकता के नौ दशक’ - डॉ.कविता भट्ट

‘वीणा’ का विशेषांक ‘सृजनात्मकता के नौ दशक’:  ‘वीणा’का विशेषांक ,अक्टूबर, 2017; 90 वर्ष की यात्रा पर केन्द्रित है। इस अंक में सम्पादन का चरम कौशल दृष्टिगोचर हुआ। ऐतिहासिकता, प्रस्तुतीकरण, विषयवस्तु, सुसमायोजन एवं अन्यान्य दृष्टियों से यह गागर में सागर की भाँति है। यह वीनाप्रत्येक पाठक हेतु संग्रहणीय एवं स्मरणीय है। किसी भी पत्रिका हेतु यह लम्बी अवधि अनेकानेक उतार-चढ़ावों तथा चुनौतियों से युक्त होती है; किन्तु वीणा ने यह यात्रा अनवरत पूर्ण की तथा हिन्दी साहित्य जगत्त् में मील का पत्थर सिद्ध हुई। अनेकानेक विरोधी विचारधारा वाले रचनाकारों एवं आन्दोलनों को साक्षी की भाँति प्रस्तुत करना तथा उसी वातावरण में अपना अस्तित्व बनाये रखना किसी भी पत्रिका के लिए ऐतिहासिक एवं उल्लेखनीय होता है। यह वीणा ने कर दिखाया। वर्तमान सम्पादक श्री राकेश शर्मा एवं उनके समस्त सहयोगियों के अथक परिश्रम का फल है कि वीणा की अभी तक की इतनी लम्बी यात्रा को इतने रोचक एवं सारगर्भित ढंग से पाठकों के समक्ष रखा गया। अनेक पीढ़ियों के लेखकों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक ही मंच पर प्रस्तुतीकरण हुआ है। इसीलिए इस अंक का प्रत्येक पृष्ठ मानस पटल पर छाप छोड़ता चला गया। नौ दशक की अवधि में अनेक साहित्यिक विभूतियों ने वीणा के तारों को झंकृत किया; जिनकी प्रतिध्वनि सदियों तक गुंजायमान रहेगी। इन ध्वनियों की पिटारी के रूप में वीणा का यह अंक हिन्दी साहित्य के लिए ऐतिहासिक, अकल्पनीय एवं अनुपम धरोहर है।

वीणा की अभी तक की अनवरत यात्रा का सुन्दर निरूपण सारगर्भित, क्रमबद्ध, व्यवस्थित एवं सुनियोजित ढंग से हमें पढ़ने को मिला। वीणा का प्रत्येक प्रयास इसी प्रकार साहित्य की लता को अभिसिंचित, परिपोषित एवं पल्लवित करता रहेगा; ऐसा मेरा विश्वास है। यह ऐसे ही साहित्यिक अन्वेषणों हेतु निरन्तर ऊर्जावान एवं गतिशील बनी रहेगी; ऐसा विश्वास है।

महात्मा गांधी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘, डॉ0 पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, भगवतशरण उपाध्याय, प्रेमचन्द, महादेवी वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, हरिवंशराय बच्चन, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गजानन माधव ‘मुक्तिबोध‘, बालकवि बैरागी, मैथिलीशरण गुप्त, भवानी प्रसाद मिश्र, उपेन्द्र नाथ ‘अश्क‘ बी0एल0 आच्छा एवं डॉ0 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ आदि जैसे महान रचनाकारों को एक ही विशेषांक में प्रस्तुत करना स्वयं में एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए वीणा सारगर्भित विशेषांक पढ़ने को मिला; यह सुखद है। साहित्य के बहुत सारे आयामों को प्रस्तुत करते हुए भी यह विशेषांक पूर्णतः कसा हुआ, रोचक तथा ज्ञानवर्धक है।

यों तो वीणा का प्रत्येक अंक सारगर्भित होता है; किन्तु इस अंक में विशेष यह है कि यह पाणिनि शास्त्र जैसे व्याकरणीय विश्लेषण, बालरक्षा जैसे ज्वलंत, समकालीन एवं प्रासंगिक विषय, साहित्य समीक्षा जैसे विशुद्ध साहित्यिक विश्लेषण तथा हस्तरेखा एवं भावी विज्ञान जैसी ज्योतिषीय विवेचना को एक साथ प्रस्तुत करना वस्तुतः श्रमसाध्य एवं दूरदर्शिता युक्त है। इसके साथ ही राष्ट्रभाषा और राष्ट्र लिपि, हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना, हिन्दी साहित्य की राष्ट्रीय परम्परा, भारतीय साहित्य- गयी सदी, साहित्य और जीवन तथा साहित्य कला आदि जैसे साहित्यिक विषयों को एक ही अंक में प्रस्तुत करना वस्तुतः सराहनीय है। इसके अतिरिक्त अनेक महान रचनाकारों जैसे सुमित्रानन्दन पन्त और महादेवी वर्मा का साक्षात्कार एक ही अंक में पढ़ने का अवसर वस्तुतः पाठकों हेतु अत्यंत सुखद तथा ज्ञानवर्धक है। ऐतिहासिक आलेखों को भी इस अंक में पुनर्मुद्रित किया गया है; जिससे ज्ञानवर्धक आलेख पढ़ने को मिले। उल्लेखनीय है कि वीणा के इस अंक में एक ओर तुलसी जैसे महान कवि तुलसीदास को प्रगतिशील बनाकर प्रस्तुत किया गया वहीं दूसरी ओर प्रेमचंद जैसे महान रचनाकार के उपन्यासों का सार प्रस्तुत किया गया। प्राचीन से लेकर अर्वाचीन तक अनेक कवियों की सुन्दर कविताओं को एक ही अंक में प्रस्तुत करना भी अति महत्त्वपूर्ण है। साथ ही कहानियों में प्रेमचन्द से लेकर टैगोर से होते हुए सूर्यबाला तक पहुँचना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। गीत-गजल को भी बहुत ही व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है। सार यह है कि यह अंक अतिरोचक एवं अविस्मरणीय है। हिन्दी साहित्य में अब तक प्रकाशित विशेषांकों का जब भी मूल्यांकन किया जायेगा; तब ‘वीणा’के प्रस्तुत विशेषांक ‘सर्जनात्मकता के नौ दशक’ विशिष्ट होगा एवं इसे सम्मिलित किये बिना आगे बढ़ना सम्भव नहीं है। सम्पादक एवं उनकी मण्डली को साधुवाद।

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