हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

वो अंगारे लेकर आए - ठाकुर दास 'सिद्ध'

वो सम्मुख जब-जब भी आए, मनवा कारे लेकर आए।
आग बुझाने के वादे कर, वो अंगारे लेकर आए।।

वो शबनम के कतरे लाते, तो हम अपनी प्यास बुझाते।
बोलो कैसे प्यास बुझेगी, सागर खारे लेकर आए।।

आम आदमी की आँखों में, केवल रोटी का सपना है।
अपने वादों में लेकिन वो, चाँद-सितारे लेकर आए।।

मुख पर चस्पाँ कर मुस्कानें, वो मनभावन बातें करते।
गरल छुपाकर रखा ओट में, रस के धारे लेकर आए।।

‘सिद्ध’ कहे कुछ ऐसा लाते, जो लाता जग में ख़ुशहाली।
साथ नहीं वो लाए कुछ भी, केवल नारे लेकर आए।।