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की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

शब्दों में भावों का अनहद नाद है ‘फानूस-ए-ख्याल’ - डॉ•कुँअर बेचैन

डॉ•कुँअर बेचैन
अपनी अज़ीज़ बेटी ‘भक्ति’ को समर्पित ‘फ़ानूस-ए-ख़्याल’ नाम से प्रकाशित इन दिनों कनाडा में रह रहे श्री अरविंद शर्मा fanoose-khyal‘अंजुम’ जी की यह कृति अपने आप में एक ऐसी कृति है जो उर्दू शायरी की मिठास और जीवन के रस को अपने पाठकों और श्रोताओं तक पहुँचाने में सफल रही है। इनकी पुस्तक के प्रारम्भ को देखते ही पता चल जाता है कि ज़नाब अंजुम किस तेवर के शायर हैं और इन्होंने ये किताब अपनी बेटी भक्ति को ही क्यों समर्पित की है। जब ये कहते हैं कि ‘ख़ुदा जाने तेरा ईमाँ ऐ अंजुम कैसी ज़िद में है / एक क़दम मंदिर में है तो एक क़दम मस्जिद में है’… तो इनकी भक्ति के उस स्वरूप का दर्शन होने लगता है जो न केवल मंदिर की है और न मस्जिद की। वह तो मानवता के धर्म की भक्ति है। प्राणिमात्र की भक्ति है। समन्वय की भक्ति है। सभी धर्मों के तटों पर सेतु निर्मित करने वाली भक्ति है।… वैसे अगर भक्ति की गहराई में जाया जाय तो वह इश्क़ का ही उदात्त रूपांतर है। वह इश्क़ मजाज़ी को इश्क़ हक़ीक़ी तक ले आने की मनोरम यात्रा है। यह भक्ति कभी मीरा के मंजीरों में खनकती है, तो कभी सूरा के इकतारे पर गुंजित होती है, कभी कबीर की धुनिया की तांत पर नृत्य करती है तो कभी चैतन्य महाप्रभु की करताल पर ताल देती है। यही भक्ति चित्रकूट के घाट पर चन्दन घिसते हुए तुलसी के मानस में महकती हुई चौपाइयों-दोहों और छंदों से छलकती हुई स्वर-गंध का अनुपम प्रसाद बन जाती है तो यही भक्ति क़ुरआन की आयतों से बरसते हुए करुणा-बिन्दुओं की बौछार में स्नान करते हुए हृदय के प्रेम-महोत्सव का रूप ले लेती है और यही भक्ति श्रद्धास्पद निज़ामुद्दीन औलिया की मज़ार पर जलते हुए चराग की ज्योति का अनंत प्रकाश भी बन जाती है । तल्लीनता में लीन हो जाने वाली स्व-अनुभूति के तादात्म्य का ही तो दूसरा नाम भक्ति है।
कविता या शायरी करना या उसको प्रेमपूर्वक सुनना या पढ़ना भी भक्ति का ही एक रूप है। शायर जितना ही अपनी शायरी में डूबता है, तल्लीन होता है उतना ही वह गहरी भक्ति के अन्तः कक्ष में समाधिस्थ होता है। वहीं वह शब्दों की गागर में रस भरता है, उन्हें विविध कल्पनाओं के रंगों से रंगता है, उन्हें मनोरम बनाता है। भक्ति निखर उठती है । भक्ति छलक उठती है।… और तब वह परम सत्य का स्वर, शिव की गूंज और सुंदरं का अनंत नाद बन जाती है। एक संगीत-मंजूषा बन जाती है वह। मन उसकी स्वर-लहरियों में कभी ठहरता है, कभी झूमता है और कभी गतिशील हो उठता है। उसका प्रचलन जीवन के उस चलन को बदलने वाला बन जाता है जो चलन अनंत काल से कहीं नफ़रत, कहीं ईर्ष्या और कहीं भेदभाव के पदचिह्न छोडता चला आ रहा हैं। इसके विपरीत भक्ति का प्रचलन जीवन-पथ और उसकी ही पथ-वीथियों पर प्रेम के निशान छोड़ जाने और स्नेह-दीप ज्योतित कर जाने का विशिष्ट अमृत-महोत्सव है।
अरविंद शर्मा अंजुम की शायरी उनके अपने ही किसी शेर के दो नाज़ुक मिसरों में कही गई प्रेम की दास्तान है या यूँ कहें कि दो मिसरों-जैसे दो होठों से झरते हुए शब्द-पुष्पों का सुगंधित और सुधामय पराग है। अंजुम की शायरी किसी उपवन में फूलों के पौधों की नाज़ुक और टेढ़ी-मेड़ी डालियों पर खिले-अधखिले फूलों और अवगुंठन में अपने रूप को छुपाती हुई कलियों का अनुपम शृंगार है। इनकी शायरी के उपवन में हर मिसरा एक शाख़ बनकर सामने आता है और उस पर आने वाला हर लफ़्ज़ एक फूल-सा खिल उठता है। इन फूलों पर ह्रदय के भ्रमर गुंजार उठते हैं, भावनाओं की तितलियाँ मँडराने लगती हैं, साँसों का शीतल-मंद बयार इनका मादक स्पर्श पाकर जीवन की विचार-पाँखुरियों पर करुणा के ओस-कण बिखराने लगता है। संकल्पों के पंछी चहचहाने लगते हैं। भाव के हिरण कुलाँचें भरने लगते हैं। क्या नहीं होता अंजुम जी की शायरी के इस उपवन में। सब कुछ ही तो होता है। गीत-संगीत, नृत्य सब कुछ।…
कविता कला और भाव इन दो बिन्दुओं पर अपना वृत्त बनाती है। इसी वृत के अंदर कल्पनाएँ होती हैं, अलंकार होते हैं, भाषा-सौष्ठव होता है, प्रतीक होते हैं, बिम्ब होते हैं और विचारों की शृंखलाएँ भी होती हैं। ये वृत्त जितने ही रंग-बिरंगे होते हैं, मनोरम होते हैं, उतने ही चित्त को आकर्षित करते हैं। अरविंद जी की शायरी में जीवन केनवास की तरह है। जिस पर भावनाओं के अनेक रंग हैं। विचारों की गहरी रेखाएँ है । सुख-दु:ख की तान है। दूर-पास के अनुभव हैं। उतार-चढ़ाव हैं। आशय यह है सब-कुछ आकर्षक।…
आज के कलात्मक युग में कोई भी चित्र पहली दृष्टि में कैसा लगा, बस यही है उसकी परख । आज की कला व्याख्या नहीं चाहती ,इसी कारण मैंने इनकी किताब से अशआर के उद्धरण नहीं दिये। उनकी व्याख्या नहीं की। व्याख्या की तो पुस्तक के भीतर छुपे हुए उस तत्त्व की, उस तथ्य की, जो पुस्तक के भीतर कहीं छुपा बैठा था।… और यह सब मैंने इसलिए किया;क्योंकि मैं भी पुस्तक के बारे में प्रथम द्रष्टया यही कहना चाहता था— बहुत सुंदर।
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