हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

शील कौशिक की चार कविताएँ - सम्पादक

1-पितामह पेड़

डॉ.शील कौशिक
डॉ.शील कौशिक

वह बूढ़ा पेड़

अपनी असंख्य भुजाओं में

थामे है

असंख्य परिंदों को

जो अपनी ही मौज में

उछल –कूद मचाते

कलरव करते

बिल्कुल ऐसे ही

जैसे पिता के पेट पर कूदता है

कंधे पर चढ़ कर बैठ जाता है

छोटा बच्चा

रात को भरा पूरा होता है यह पेड़

हर सुबह विदा करते समय

चिंतित होता है वह

होती है एक अलंघ्य उड़ान

इन परिंदों की

हर शाम

प्रतीक्षारत्त रहता है बूढ़ा पेड़

और

प्रतीक्षा केवल बूढ़े पेड़ को ही नहीं

परिंदे भी होतें हैं अधीर

कि जब वो लौटें

तब तक सलामत रहे

उनका पितामह पेड़

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2-आश्वस्ति

बंगले के एक कमरे से

अक्सर

ये आवाज गूँजती है

कहाँ हो जी ?

कुछ नहीं चाहिए उसे

कोई काम नहीं

जानता हूँ मैं

मेरे यहाँ हूँ

कह देने मात्र से

मेरे अपने

आस – पास होने की

आश्वस्ति

मिल जाती है उसे

कितनी ही दूर ——

लहरें नाराज़ होकर

नन्हीं बिटिया की तरह

आगोश से छूटकर

समुद्र से कितनी ही

दूर चली जाएँ

क्रोध में कितनी ही

ऊँची उछलें

मचलकर

किनारों से

भले ही टक्कर मारें

वापिस आकर वो

समुद्र की गोद में ही

बैठती हैं ।

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3-औरत अब

औरत अब रसोईघर में

खाना ही नहीं पकाती

वह पका रही होती है अपने विचार

संकल्प में ढालने के लिए——

वह कपड़े /बर्तन ही नहीं

धो –माँज रही होती

वह साफ कर रही होती है

मन के दर्पण पर जमी धूल

आर –पार झाँकने के लिए——

हाथ में ऊन –सलाई पकड़े

वह स्वेटर ही नहीं बुन रही होती

वह बुन रही होती है रंगीन सपने

हकीकत की धूप में चमकाने के लिए —-

औरत अब रस्सी पर नट की तरह

घर और बाहर /सधे कदमों से चलती है

नए –नए क्षितिज खोजने के लिए —–

कलम हाथ में पकड़

औरत नहीं उड़ेलती कोरी भावुकता

नही छलकाती ममता ही

अपितु वह लिख रही है नित नई इबारत—

औरत अब भ्रम में नही जीती

रोक ली है उसने बोनसाई बनती जिंदगी

बचा ली ओस से भीगी पंखुरी की नमी

सहेज ली है अपने अंदर साँस लेती जिंदगी

अपना मुकम्मल प्रतिबिम्ब पाने के लिए —

औरत अब भ्रम में नहीं जीती

आगे बढ़ कर तय कर रही है वह

तमाम मील के पत्थर ।

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4-पहाड़ पर आओ तुम

पहाड़ पर आओ तुम

तो पहाड़ जैसा बड़ा दिल लेकर आना

पहाड़ पर ठंड और सूनापन है

यहाँ आओ तो

प्रेम का दुशाला

और कुछ रंगीनियाँ शहर की लेकर आना

ऊँचे बहुत हैं पहाड़

और पहाड़ पर रहने वाले पहाड़ियों का कद नाटा

गरीबी बहुत है यहाँ

आओ तुम तो

अपनी अमीरी सोच छोड़ कर आना

पहाड़ के कटाव की तरह

कटा है यहाँ का आदमी

मैदान की हलचल से

बहुत अकेला है वह

आओ तुम तो

पिता बहन बेटी और बेटे जैसी

रिश्तेदारियां लेकर आना

बहुत संतोषी और सुखमय जीवन हैं यहाँ

आओ तुम तो

अपनी जरूरतें कम करके आना

खुल कर बाँटना सुख

और खिल कर हंसना यहाँ

बहुत भोले हैं यहाँ के लोग

पहाड़ पर आओ तुम तो

झूठ का आवरण छोड़ कर आना

पहाड़ पर आओ तुम

तो पहाड़ जैसा बड़ा दिल लेकर आना

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