हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

श्रद्धांजलि ! - सम्पादक

श्रीमती राज कुमारी सिन्हा

आज फिर से जीवन ख़ाली हो गया है। एक पावन आत्मा 28 जनवरी को संसार से चली गई।उनके लिए जितना भी राजकुमारी सिन्हाकहा जाए वह कम है। पुण्यात्मा तो वे थीं ही, मुझे लगता है कि वे हमें शक्ति व प्रेम की राह दिखाने हमारे बीच आईं। यह हम सबका सौभाग्य है कि उनका लम्बा साथ हमें ईश्वर ने दिया व हम अपना जीवन कैसे  जिएँ, बड़ी बड़ी कठिनाइयों के साथ, यह सीखने का अवसर दिया।

उनका व्यक्तित्व सुन्दर व प्रभावशाली  तो था ही, वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्मठ रहीं। दुखों का सामना स्वयं तो किया ही, दूसरों का दु:ख भी बाँटती रहीं व सबके कठिन समय में साथ देने के लिए सदा तत्पर रहीं।

हिन्दी साहित्य के लिए उनका प्रेम,  उनकी रचनाओं तथा उनके पत्रों मे दिखाई देता है ,जो वे यूँ ही समय -समय पर परिवार के सदस्यों या अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए लिखती थीं। उन्होंने ख्याति पाने के लिए कभी नहीं लिखा ;परन्तु जब भी लिखा, उससे उनकी सरलता , गहनता व उच्च विचारों का परिचय मिलता है।

श्रीमती राज कुमारी सिन्हा वाराणसी के साहित्यिक वातावरण मे पली , गन्धर्व विद्यालय सेसंगीत की शिक्षा ली । विवाह उपरान्त मुम्बई मे रही। पिछले कई वर्ष कनाडा फिर अमेरिका मे रहीं। जिस किसी के सम्पर्क मे वे आईं , अपनी अमिट छाप छोड़ गईं। बालक, वृद्ध , सगे -सम्बन्धी , उनके प्रेम व मुसकान भरे मीठे व्यक्तित्व को सदा याद रखेगें। | इन्होंने प्रारम्भ से आज तक हिन्दी चेतना की सेवा की | एक अच्छी लेखिका और हितचिन्तक के नाते मदन मोहन मालवीय के विशेषांक में आपका बहुत बड़ा सहयोग रहा

उनकी एक कविता श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत है-

मैं हवा हूँ।

वसंत की बयार हूँ मैं।

गई शिविर की शीतल पवन बह,

मधुमास  की मधुमय समीर हूँ मैं।

जगत की प्राण हूँ मैं,

गति हूँ श्वास की,

उष्णता, लाली रुधिर की,

धड़कन हूँ हृदय की

क्म्पन हूँ धरा की,

स्पंदन तरु पल्लवों की

हरित दूर्वादलों की,

मुसकान फूलों के अधर की

सरित सर की लहर हूँ ,

तरंगें हूँ सलिल की।

लहक रही सरसों ,खेतों में,

मृदुल स्पर्श से मेरे,

आमों मे बौर उठे

जूही चमेली, उठे फूल,

महक रही महुआ की  डार,

पात- पात रस की फुहार,

चूम रहीं मंजरी अंक में,

मैं हवा हूँ।

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