हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

समत्वभाव - अनिल विद्यालंकार

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ गीता 2-38

सुख और दु:ख में , लाभ और हानि में , जय और पराजय में समान भाव रखकर तू युद्ध के लिए तत्पर हो। इस प्रकार तुझे पाप नहीं लगेगा।
मनुष्य का पूरा जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। वह बहुत बार जीवन के संघर्ष से पलायन करना चाहता है क्योंकि उसे डर लगता है कि कह ° उसे इस संघर्ष में सुख के स्थान पर दु:ख , लाभ के स्थान पर हानि , और जीत के स्थान पर हार न मिल जाए। श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो सुख-दु:ख , लाभ – हानि और हार – जीत की परवाह किए बिना कर्तव्य की भावना से निरन्तर संघर्ष करता है। जो भी चीज़ मनुष्य को स्वार्थी , संकीर्ण और भीरु बनाती है वह पाप है। जीवन में संघर्ष अनिवार्य है , पर इस संघर्ष में पाप नहीं आना चाहिए। दूसरों के हित के लिए निरन्तर संघर्ष करते हुए मनुष्य पापरहित जीवन बिताता है।
सुखदु:खे , लाभालाभौ , जयाजयौ – सुख और दु:ख को , लाभ और हानि को , तथा जय और पराजय को , समे कृत्वा – समान मानकर , तत: युद्धाय युज्यस्व – तब युद्ध के लिए तत्पर हो , एवं पापं न अवाप्स्यसि – इस प्रकार तुझे पाप नहीं लगेगा।

यदृच्छालाभ-सन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।
सम: सिद्धौ असिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥गीता 4-22

जो व्यक्ति अकस्मात् जो कुछ मिल जाए उससे संतुष्ट रहनेवाला है , सुख – दु:ख , गर्मी – सर्दी , लाभ – हानि आदि के विरोधी जोड़ों से ऊपर उठा हुआ है , ईर्ष्यारहित है , तथा सफलता और असफलता में समान रहता है , वह कोई भी कर्म करे , कभी बंधन में नहीं फँसता।
लोभ और ईर्ष्या से प्रेरित व्यक्ति कभी मुक्त होकर जीवन में आचरण नहीं कर पाता। धन जोड़ने के लिए और सामाजिक संघर्ष में दूसरों को नीचा दिखाने के लिए वह एक के बाद एक गलत कर्मों के चक्कर में फँसता जाता है। बंधनरहित स्वतंत्र जीवन जीने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सहज भाव से जीवन में जो मिलता जाता है उससे संतुष्ट रहे , और सफलता और असफलता की परवाह किए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता रहे। बिना किसी स्वार्थ के निरंतर कर्म करने वाला व्यक्ति सदा शान्त और स्वतंत्र रहता है।
यदृच्छा-लाभ-सन्तुष्ट: – अपने आप मिले लाभ से संतुष्ट रहनेवाला , द्वन्द्वातीत: – द्वंद्वों से ऊपर उठा हुआ , विमत्सर: – ईर्ष्यारहित ,सिद्धौ च असिद्धौ सम: – सफलता और असफलता में समान रहनेवाला व्यक्ति , कृत्वापि – कर्म करके भी , न निबध्ययते – बंधन में नहीं फँसता।
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