हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

समय की गति के साथ भागने वाले - पुष्पा मेहरा

साक्षात्कार

[समय की गति के साथ भागने वाले ,आधुनिक हिंदी साहित्य – जगत् की अनेक विधाओं पर लेखनी मुखर करते, वरिष्ठ साहित्यकार श्री अजितकुमार के साक्षात्कार के कुछ अंश —- पुष्पा मेहरा ]

अजितकुमार
अजितकुमार

प्रश्न- आपका बचपन कैसा बीता ? पारिवारिक और सामाजिक परिवेश कैसा था ?
उत्तर- मेरे जीवन के आरंभिक 5-6 वर्ष तो गाँव में बीते जहाँ कोई साहित्यिक परिवेश न था लेकिन सबसे गहरी और मार्मिक स्मृतियाँ उसी अवधि की हैं । फिर स्कूली पढ़ाई के विचार से हमारे माता-पिता सपरिवार जिला मुख्यालय के अपने घर में आ गए । वहाँ पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं, पारिवारिक और सामजिक परिवेश के नाते शुरू से ही साहित्य की विभिन्न विधाओं, विशेषकर कविता के प्रति मेरी रुचि जाग्रत हुई । इस समय तक मेरी माँ श्रीमती सुमित्रा कुमारी सिनहा साहित्य जगत् में प्रसिद्ध हो चली थीं और हमारे घर में युवा तथा प्रतिष्ठित कवियों-लेखकों का आना-जाना होने लगा था । मुझे अपनी माँ के जैसा सुमधुर कंठ तो नहीं मिल सका था ;लेकिन आरंभिक तुकबंदी मैंने आठ-दस साल की उम्र से ही शुरू कर दी थी । उस समय की अपनी 2-3 बाल-कविताओं की पंक्तियाँ जैसे- ‘बिगड़ी घड़ी बिगड़ी घड़ी’, ‘मैं हूँ सबसे बड़ा गवैया’ , ‘युद्ध न जाने क्यों होता है’ की धुंधली स्मृतियाँ मन में अब भी बनी हुईं हैं ।
प्रश्न – बचपन में आप पर किसकी छाप अधिक पड़ी ?
उ- मेरे प्रथम गुरु तो थे- मेरे नाना डॉक्टर महेश चरण सिनहा, जिन्होंने सिखाया था- ‘ट्राई एन्ड ट्राई अगेन ब्वायज, यू विल सक्सीड एट लास्ट’ गोकि जीवन का अनुभव इसके विपरीत रहा । न कोशिश की, न सफलता पाई । लेकिन मेरे वास्तविक गुरु थे- मेरे माता-पिता जिन्होंने साहित्य से प्रेम करना और जीवन में ईमानदारी बरतना सिखाया ।
प्रश्न – आपके पिताजी द्वारा संस्थापित युगमंदिर प्रकाशन में उस समय के जो कवि लेखक आया करते थे उनके विषय में भी कुछ बताइए । उनमें से किनका प्रभाव आप पर विशेष रूप से पड़ा ?
उ- वह समय 1940 से 1948 तक का मेरे लिए विशेष महत्वपूर्ण इस अर्थ में रहा कि मेरी स्कूली शिक्षा इसी अवधि में पूरी हुई और जिन साहित्यकारों के संपर्क में मैं अपने माता-पिता के नाते विशेष रूप से आया उनमें प्रमुख थे सर्वश्री रामविलास शर्मा, नंद दुलारे वाजपयी , शिव मंगल सिंह सुमन, जानकी वल्लभ शास्त्री, शम्भू नाथ सिंह, गिरजाकुमार माथुर, शालिग्राम मिश्र, और मुख्यत: निराला जी जो अनेक वर्ष हमारे घर में अतिथि के रूप में रहे , तबके कितने ही रोचक संस्मरण मेरी यादों में संचित हैं और यदा-कदा उनके विषय में मैंने लिखा भी है । इसी क्रम में, रामविलास जी के अक्खड़, साफ़गो बैसवाड़ी अन्दाज़ और गिरिजाकुमार के मधुर-कोमल मालवाई विन्यास की भी कितनी ही स्मृतियाँ हैं जिनमें से ‘दिया-बाती’ का वह गीत तो आज भी विभोर करता है जो श्री माथुर ने तीन-चौथाई सदी पहले गाकर सुनाया था- ‘नदी किनारे गांव हमारा, आधी रात नाव ले आना । पतला- पतला चाँद खिला हो, दूर कहीं ज्यों दीप जला हो.. पास एक सूना झुरमुट है, जल्दी में तुम भूल न जाना ..’’
प्रश्न : आपके उन्नाव के घर में निरालाजी काफ़ी अरसे तक रहे उस समय उनके सानिध्य का आप पर क्या प्रभाव पड़ा कि आपने उन्हें ही अपना दीक्षा गुरु माना ?
उत्तर : निराला जी को लंबे समय तक निकट से देखने जानने का जो अवसर मुझे मिला उसमें उनके लगभग त्यागियों तपस्वियों जैसे स्वभाव को देखकर उनके प्रति बड़ी श्रद्धा हुई । मनोविदलन उनमें अवश्य बढ़ता गया था और कल्पना तथा वास्तविकता के बीच अंतर बहुत बार वे नहीं कर पाते थे । निराला जी न्यूनतम साधनों से भी उत्तम लेखन कर सकने में इसी कारण समर्थ हुए थे । तभी मेंने अनुभव किया कि महत्वपूर्ण लेखन के लिये ये बाहरी सुविधाएँ जरूरी नहीं होती , आंतरिक प्रेरणा और निरीक्षण की गहराई के साथ कल्पनाशीलता के मिश्रण से वह संभव हो सकता है |
प्रश्न : निरालाजी के अतरिक्त अपने पैतृक निवास स्थान, उन्नाव में आप अन्य किन- किन कवियों के संसर्ग में आते रहे ?
उत्तर : उन दिनों के कविसम्मेलनों के लोकप्रिय कवि शंभुनाथ सिंह, आशुकवि देवेन्द्रनाथ पांडे, बलवीर सिंह रंग, मेघराज मुकुल, श्यामनारायण पांडे आदि भी हमारे घर आया करते थे । शंभुनाथ सिंह के गीतों का संग्रह ‘धूप-छांह’ युगमंदिर’ से प्रकाशित भी हुआ था । कविसम्मेलनों में तब बच्चन के अलावा ये कवि बड़ी रुचि से सुने जाते थे । शंभुनाथजी का प्रसिद्ध गीत ‘’समय की शिला पर मधुर चित्र कितने, किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए’’ तो मुझे इतना अच्छा लगता था कि उसकी धुन पर कुछ पंक्तियाँ मैंने भी जोड़ी थीं , किन्तु उच्च शिक्षा के वास्ते इलाहाबाद जाने पर ‘नयी कविता’ का रंग मुझपर कुछ ऐसा चढ़ा कि मातृसंस्कारों वाली गीतात्मकता तो छूटी ही, ‘नये, और नये, और नये’ की निस्सार खोज में अग्रजों या समवयस्कों से भी कुछ विशेष सीख न सका ।
प्रश्न :विश्वविद्यालय के स्तर पर आपको किन – किन-लेखकों- मित्रों ने अधिक प्रभावित किया ? उस अवधि के आपके मित्रों की साहित्यिक अभिरुचियाँ क्या थीं जिनकी ओर आप उन्मुख हुए ?
उ- विश्वविद्यालय के स्तर पर मैं अपने गुरु कविवर बच्चन के निकट संपर्क में आया और यह संबंध आजीवन बना रहा । उनके अतिरिक्त इलाहाबाद में ही अज्ञेय जी से निकटता हुई जो निरन्तर बढ़ती गई । ये दोनों भी मेरे साहित्यिक गुरुओं में रहे यद्यपि शैक्षिक अध्यापकों में से डॉ. धीरेंद्र वर्मा के प्रति मन में विशेष आदर हुआ । जहाँ तक मित्रों का संबंध है, वरिष्ठ मित्रों में श्री धर्मवीर भारती से और समवयस्कों में श्री ओंकारनाथ श्रीवास्तव से अतिरिक्त निकटता रही , ये मित्र अपने मानवीय गुणों और साहित्यिक उपलब्धियों के नाते सदा मेरे प्रिय रहे । यथासमय ओंकारनाथ श्रीवास्तव का विवाह मेरी छोटी बहन कीर्ति चौधरी से हुआ | अनंतर कीर्ति चौधरी ‘तीसरा सप्तक’ में सम्मिलित हुईं |
प्रश्न : आपका पहला कविता संग्रह कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर : मेरा पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ 1958 में छपा था । उसकी तब बहुत चर्चा हुई थी । सारी बातें तो याद नहीं, लेकिन संपूर्णानंद जी को जहाँ वे कविताएं कुछ समझ में नहीं आई थीं, वहाँ बालकृष्ण राव ने मुझपर बच्चन, अज्ञेय और शायद भवानी का असर देखा था, जबकि उस समय के किशोर अशोक बाजपेयी ने अपनी सर्वप्रथम समीक्षा के लिए यह किताब चुनते हुए लिखा था कि जितना ‘अकेला’ वे अपने को कहते-समझते हैं, वास्तव में उतने हैं नहीं । अन्य आलोचक भी ‘नव-लेखन’ की इस बुनियादी समस्या से अपनी-अपनी तरह जूझे थे कि वह अपनी अलग डफली बजा रहा है, या संग-साथ खोज रहा है ?
प्रश्न : नयी कविता की केन्द्रीय विचारधारा के बारे में आपका क्या दृष्टिकोण है ?
उत्तर :मैं समझता हूँ कि परंपरा तथा प्रयोग के बीच कशमकश और तालमेल की प्रक्रियाएं विकास-क्रम का बुनियादी हिस्सा होती हैं । हिन्दी में छायावाद का युग आन्दोलन की शक्ल में भले ही आज सक्रिय न हो पर मनोभाव के स्तर पर वह न मिट सकनेवाली वैसी ही सचाई है, जैसी यथार्थवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद या शास्त्रीयतावाद । जब एक की अति हो जाती है तो दूसरा उभरने का यत्न करता है और विन्यास बदलते चलते हैं ।
सभी जानते हैं, ‘नयी कविता’ जब आन्दोलन के स्तर पर रूढ़ होती दिखी तो ‘क़िस्म –क़िस्म की कविताओं- दिगम्बरी, सूर्योदयी, श्मशानी, नंगी, भूखी-पस्त-जुझारू आदि-आदि तरह-तरह की कविताओं के स्वर उभरने लगे थे । प्रगीत या मुक्तक के क्षेत्रों में भी नवगीत, अगीत, युवा गीत जैसे आन्दोलन सक्रिय हुए । कवियों- आलोचकों-पाठकों सभी के लिए स्थिति अराजक होती गई है । विधाएं भी परस्पर गडमड हुई हैं । आज बता सकना कठिन है कि हिन्दी कविता की केन्द्रीय धारा कौन सी है । इंटरनेट के उन्मुक्त प्रसार से उपयोगी-अनुपयोगी या क़ीमती और बेकार के बीच तमीज़ कर सकना संभव नहीं रहा । सूचना की अतिशयता के इस युग में जहाँ दिग्भ्रम एकमात्र गति दिख चली है, साहित्यिक मूल्यों का सन्धान तथा निरूपण, पुन:निरूपण जितना कठिन, उतना ही आवश्यक भी हो उठा है ।
मैं समझता हूँ कि दावों-प्रतिदावों के बावजूद जिस तरह कविता के क्षेत्र में ‘अन्धायुग’, ‘कनुप्रिया’ ‘अँधेरे में’, ‘असाध्य वीणा’ ‘साये में धूप’ ‘मगध’, ‘रामदास’ आदि को… और कथा के क्षेत्र में ‘मैला आंचल’ ‘राग दरबारी’,‘तीसरी क़सम’, ‘आपका बंटी’,‘दोपहर का भोजन’ आदि को स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी की श्रेष्ठ साहित्यिक उपलब्धियों की भांति मान्यता मिल चुकी है. उसी तरह विश्वसनीय मानदंडों पर खरी उतरनेवाली कितनी ही अन्य रचनाएँ और भी पहचानी जाएंगी और भले ही श्रमसाध्य तथा विवादास्पद किन्तु उतनी ही प्रीतिकर भी यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी । इस कठिन किन्तु अनिवार्य दायित्व का वहन हमारी मेधा और मनीषा निरन्तर करती जाएगी|
प्रश्न- अज्ञेय और मुक्तिबोध को लेकर हिन्दी में जो मतभेद हुए, उन्हें आप किस रूप में समझते हैं ? क्या आप स्वीकार करते हैं कि कविता सदा देश – काल की स्थिति से प्रभावित होती रही है ?
उ.- ये दोनों निस्संदेह उच्च कोटि के कवि-लेखक-चिन्तक थे और हैं, जिनके बीच उस तरह के तमाम अन्तर थे जैसे किन्हीं भी लेखकों के बीच होते या हो सकते हैं । हिन्दी में दिक़्क़त यह आ पड़ी कि ये दोनों अन्य बहुतों के साथ द्वितीय महायुद्धोत्तर शीतयुद्ध की चपेट में आ गए । हथियारों की लड़ाई थम जाने के बाद भी पूंजीवाद और समाजवाद की ठेकेदार जिन दो शक्तियों के बीच जो वैचारिक संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा और जो किसी न किसी रूप में अब भी जारी है, उसने जहाँ बहुत से भ्रमों का संवर्धन किया, वही अपूर्व रचनात्मक ऊर्जा भी प्रस्फुटित हुई । इन तमाम ब्योरों की चर्चा हिन्दी में बहुत विस्तार से हुई है । आगे चलकर उन पर और भी विचार अवश्य होगा । लेकिन बिलकुल हाल में सहिष्णुता-आक्रामकता को लेकर देश में जो नई बहस उठ खड़ी हुई है, उससे सामान्य जन की ही भांति लेखक भी बेतरह प्रभावित हुए हैं ।
प्रश्न : आपके लेखन पर किन-किन कवियों का प्रभाव पड़ा ?
उत्तर : मेरे लेखन पर किसका कितना प्रभाव पड़ा, कहना में मेरे लिए मुश्किल है । जो भी गुरु माने, व्यक्तित्व के नाते, उनकी नक़ल करूँ, यह विचार मन में कभी न उठा । आज के कवि सम्मेलनों के रूप से मैं अवश्य क्षुब्ध हूँ ;क्योंकि उनके माध्यम से सुरुचि घट रही है और वे काव्यास्वाद के नहीं, बल्कि घटिया मनोरंजन के बाज़ारू मंच हो चले हैं ।
प्रश्न- 1953 से 1998 के अपने संपूर्ण सेवाकाल में से 6 वर्ष (1956 -62) विदेश मंत्रालय में अनुवादक के पद पर कार्य करते हुए आप कविवर बच्चन जी से किस रूप में प्रभावित हुए ?
उत्तर – उनकी कर्तव्यनिष्ठा के साथ उनकी मनुष्यता और अपने प्रत्येक परिचित को प्रेरित- उत्साहित करने की क्षमता, उन्हें असामान्य व्यक्तित्व का स्वामी बना सकी थी । इस नाते वे सदा मेरे आदर-सम्मान के केंद्र में रहे । नवलेखन के प्रति मेरी अनुरक्ति को उन्होंने वैसा ही मान दिया ,जैसा उनकी रचनाशीलता और स्वयं उनके प्रति मेरे मन में था ।
प्रश्न: आपके अब तक सात कविता -संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । 1958 में छपे ‘अकेले कंठ की पुकार’ के बाद सातवाँ संग्रह ‘ऊसर’ 2001 में छपा । इन पिछले 14 वर्षों में क्या आपने कविता नहीं लिखी ?
उत्तर – नहीं, इस अवधि में मैंने बहुतेरी कविताएँ लिखीं और वे पत्र-पत्रिकाओं में स्फुट रूप से प्रकाशित भी हुई हैं, किंतु स्वास्थ्यगत कारणों से मैं उसे पुस्तक रूप में संगृहीत न कर सका । जो पुस्तकें इस बीच छपीं, वे मुख्यत:, गद्य की विधाओं में थीं जैसे ‘सफरी झोले में कुछ और’(यात्रा), ‘दिल्ली हमेशा दूर’(ललित निबन्ध), ‘जिनके संग जिया’(संस्मरण) और ‘धीरे-धीरे,धीरे-धीरे’(अंकन) । अब 2016 में आठवाँ कवितासंग्रह ‘कुछ आधी, सब अधूरी’ नाम से छपाने का विचार है । साथ ही ‘अ से ऊ तक’ शीर्षक के अंतर्गत सभी सातों अनुपलब्ध कविता संग्रहों को एक जिल्द में निकालने का विचार है ।
प्रश्न : कहा जाता है कि कविता मानव-मन की अनुभूतियों से जुड़ी होती है, और अपने समय, समाज तथा परिवेश को भी आत्मसात् करती है । आपकी अपनी रचनाओं में यह सब किस रूप में झलका है ?
उत्तर- इसका बहुत कुछ उत्तर तो आपके प्रश्न में ही निहित है । जो बचा होगा, वह पाठक मुझसे बेहतर बता सकेंगे ;क्योंकि किसी भी रचना की असली कसौटी तो उसके पाठक ही होते हैं । तुलसीदास बता गए हैं- ‘सो कबित्त बुधजन आदरहीं, उपजहिं अनत, अनत छवि लहहीं।‘
प्रश्न –कुछ वर्ष पूर्व समकालीन साहित्य समाचार’ के मुखपृष्ठ पर अंकित आपकी कविता की चंद पंक्तियाँ मुझे आज भी याद आ रही हैं –
‘मन से मन की बात कहें /सम्बन्धों को जिएँ, सहें/जितना गहरा प्यार करें /उतना ही आज़ाद रहें’ । क्या ये पंक्तियाँ आपके निजी स्वभाव को झलकाती हैं?
उत्तर.- किन्हीं अंशों में ज़रूर.. लेकिन इसे जीवन का पूरा सच नहीं कहा जा सकता । कई बार अपनी प्रिय वस्तुओं को कसकर पकड़े रखना भी ज़रूरी होता है । यह कहावत तो आपने भी सुनी ही होगी कि ‘क़लम, किताब और स्त्री दूसरे के हाथ में जाते-जाते चली ही जाती हैं।’ तो उदारता -कृपणता या कोई भी रुख-रवैया जड़-स्थिर नहीं कहा जा सकता; वह देश, काल, पात्र , स्थिति के अनुसार बदलता रह सकता है.। भले ही सिद्धान्तत: मैं मानता हूँ कि व्यक्ति को मुक्त रहना चाहिए और अन्य को भी मुक्त रखना चाहिए ।
प्रश्न-‘आजाद’ शब्द अपनेआप में बहुत व्यापक क्षेत्रों से सम्बन्ध रखता है। इसी संदर्भ में, मैं आधुनिक कविता के स्वरूप और उसके बारे में आपके विचारों से अवगत होना चाहती हूँ |
उत्तर – यह अत्यन्त विवादास्पद विषय है और इसके बहुत से आयाम हैं । एक आज़ादी तो यह हुई कि लेखक जो भी चाहे लिखे, उसे हर तरह की छूट है । इस प्रसिद्ध उक्ति में यह विचार गुंजित होता है कि ‘कवि निरंकुश होता है’; लेकिन जिन अंशों में कविता एक सामाजिक क्रिया है और कवि एक सामाजिक प्राणी है, उसे मर्यादा में रहना होता है अन्यथा समाज, सत्ता या क़ानून उसके खिलाफ़ क़दम उठाते हैं । श्लील-अश्लील, क़ानूनी-ग़ैर क़ानूनी, उचित-अनुचित के बीच रगड़-झगड़ दुनिया भर में होती रही है; आगे भी होगी.. रचनाएँ ज़ब्त हुई हैं, पाबंदियों के खिलाफ़ संघर्ष हुए हैं, पाबंदियाँ हटीं भी हैं… लेकिन अन्य स्तर पर यह विवाद रुचि-भेद, युग-भेद जैसे स्तरों पर चलता है |
प्रश्न : क्या आप छंदोबद्ध कविताओं को ही कविता मानते हैं ? आज के युग में अपनाई जाने वाली नाना कविता विधाओं के बारे में आपका क्या मत है ?
उत्तर- छन्दहीन कविता को यदि कोई कविता मानने से इनकार कर दे, तो दूसरे को भी अधिकार है कि वह गीत या तुकबन्द कविता का उपहास करे । आज जहाँ नए-नए काव्यरूप- तेवरी, ताँका आदि-आदि सामने आ रहे हैं, वहीं पुराने दोहा-सवैया-कवित्त जैसे छन्दों या हाइकु, सॉनेट, रुबाई जैसी प्राचीन शैलियोंकी भी वापसी नज़र आती है ।ऐसे में यही कहा जा सकता है कि दुनिया में रंगबिरंग सबके लिए जगह रही है और बनी रहनी चाहिए- पुरानी बोतल में पुरानी शराब.. नयी बोतल में पुरानी शराब..नयी बोतल में ताज़ी-टटकी शराब के शौकीनों के साथ-साथ वे भी हैं और होंगे जो सादे पानी, कड़वी दवा या फल के रस को भी शराब जैसा मज़ा लेते हुए पियें.. जबकि ऐसों की भी कमी नहीं जो सबकुछ से बेज़ार हों । मैं समझता हूँ कि कविता को असली खतरा उन्हीं से है जिनको चारो ओर कुछ भी अच्छा नहीं लगता.. जो बेझिझक कह सकते हों कि ‘कविता में क्या रखा है; चलो, हम अपनी रक़म वसूलें..या जो बेधड़क बोल दें- ‘यह तो कविता है ही नहीं’ या जो इतना जड़-निष्ठुर हो चुके हों कि संसार का रस-माधुर्य अथवा जगत् का दुख-दारिद्र्य कुछ भी उनको नहीं व्यापता। ऐसों के लिए ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कह गए थे कि उनको कविता की बड़ी ज़रूरत है; वही उनका उपचार कर सकती है, जीवन की सार्थकता का बोध करा सकती है ।