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की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

सरोकार ; जीवन का आईना - श्रीधर दीपेश

सरोकार पुस्तक जीवन के विभिन्न पक्षों पर रचनाकार के विचारों का आईना है । इसमें दर्शन, 1-सरोकरचिंतन, प्रेरणा, उद्बोधन, समस्या समाधान, अनुभव भरा ज्ञान-वर्धन और जीवन की अवधारणा के संयमित गुरु हैं। कोई भी इसे पढ़कर अपनी जीवन शैली का सम्यक समाधान पा सकता है । छोटी छोटी बातों को एक करीने से विश्लेषित कर रचनाकार ने यह बताया है कि मानव जीवन क्या है ? उसकी कठिनाइयाँ क्या हैं, उनके समाधान क्या हो सकते हैं? वर्तमान में भाषणों के बड़े -बड़े कथोपकथन अवश्य दृष्टिगोचर होते हैं परन्तु जीवन-दृष्टि के वे गुरु जो हमें रोज़मर्रा के कार्य-कारण में सहयोग करें, कहीं नहीं मिलते ।डा. सुरेन्द्र वर्मा ने अपनी विद्वत्ता,अनुभव, दर्शन और कला तथा साहित्य के समग्र तत्त्वों को समाहित कर पुस्तक का प्रणयन किया है जो प्रशंसनीय है ।कहीं कहीं विचार एकांगी हो गए हैं लेकिन ये मानव स्वभाव के ही परिचायक हैं ।

रचना के अंतर्गत विभाजन भी इसी रूप में किया गया है ।‘सरोकार’ शीर्षक के अंतर्गत व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के सम्बन्धों का समाकलन किया गया है । जैसे, ‘हमारा गणतंत्र और हम’, ‘पर्यावरण और उसके प्रति हमारा बरताव’, ‘वरिष्ठ नागारिको का दुःख’, ‘प्रेम के सम्मान में’, ‘मुस्कराइए कि दुनिया मुस्कराए’, ‘समझदारी के दावे’, ‘सामाजिक रिश्तों में सद्भाव’,आदि । ये ऐसे लघु निबंध हैं जो व्यक्ति-व्यक्ति, व्यक्ति-समाज, व्यक्ति-पर्यावरण, व्यक्ति और राष्ट्र को अपने में समेकित करते हैं । इन सभी आलेखों में विचार की तारतम्यता और नवीनता को अक्षुण्ण रखा गया है । साथ ही अपने ढंग से मूल्यांकन भी किया गया है । सन्दर्भों की स्थापना हेतु यथास्थान ऐतिहासिक हवाले भी दिए गए है। संविधान की अनेक विशेषताओं का विश्लेषण काल-क्रमानुसार दर्शनीय है ।

पर्यावरण के सम्बन्ध में जो जानकारियाँ समेटी गईं हैं वर्तमान में उनकी उपयोगिता असंदिग्ध है? रचनाकार इस बात से अवगत है कि कहीं विषमताओं से भरे आज के पर्यावरण का प्रतिकूल प्रभाव प्रक्रितिऔर मनुष्य पर न पड़े ; किन्तु आज विश्व में इस प्रकार की अनेक समस्याओं का प्रकटीकरण होने लगा है । पर्यावरण सम्मेलनों का परिणाम सुखद नहीं है । विकास की दौड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता ; परन्तु विकास के जो साधन हैं उनसे पर्यावरण-प्रदूषण होता ही जा रहा है ।

श्रीधर दीपेश
श्रीधर दीपेश

वरिष्ठ नागरिकों के दुःख का विश्लेषण सराहनीय है । बुजुर्गों के तीन प्रकार- स्वप्रेरित व्यक्तित्व, समायोजित व्यक्तित्व और संकुलित व्यक्तित्व -बहुत सार्थक हैं।ये उनकी मानसिकता और दृष्टि को स्पष्ट करते हैं । मानव जीवन में वृद्धावस्था एक जटिल संकल्पना है । यह समय की परिधि में आबद्ध है । इससे मुक्ति सम्भव नहीं है । बस एक धैर्यपूर्ण जीवन-पद्धति ही इसका समाधान है । इस अवस्था में शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक कुंठाओं का जो प्रहार होता हैं, वह बड़ा ही विकट है। उससे मुक्ति साधनों के माध्यम से कभी नहीं हो सकती । शारीरिक क्षीणता, एकांत और उपेक्षा सहज ही सुलभ है । संयुक्त परिवारों में वृद्धों का जो सम्मान रहता था, वैसी स्थिति आज नहीं है, और न ही पूर्वजों द्वारा संकल्पित वानप्रस्थ की प्रवृत्ति जग पाती है । अंतिम क्षण तक स्वार्थ-भाव बना रहता है । अत: स्वप्रेरित व्यक्तित्व ही अपनी जीवनचर्या समुचित ढंग से निभा पाते हैं । समायोजित व्यक्तित्व एक सीमा तक ही स्वयं को सँभाल पाता है । तीसरी कोटि अत्यंत शोचनीय हो जाती है लेखक ने स्वप्रेरित व्यक्तित्व को संतोषजनक माना है । परिवार छिटक जाने से वृद्धाश्रम और एकांत जीवन ही आज वृद्धों की नियति बन गया है । ऐसी स्थिति में स्वप्रेरित व्यक्तित्व ही शान्ति, धैर्य और सद्भाव से रह पाता है।

पुस्तक के दूसरे खंड, मनसा वाचा कर्मणामें जीवन के विभिन्न सन्दर्भों से जुड़े लघु निबंध हैं। ‘विपत्तियाँ वरदान हैं’, ‘समयसार’, ’नहीं कहने का साहस जुटाइए’, ‘माँजता है दुःख’, ‘मूल्यों का संघात है संस्कृति’, ‘मर्यादा’, ‘भय का जंजाल’, जैसे शीर्षकों के माध्यम से जीवन की विभिन्न समस्याओं और विषमताओं को वर्गीकृत कर उसके साथ अनुभूत सत्यों को जोड़ने का प्रयास किया गया है । यह खंड युवा वर्ग के लिए अभिप्रेत है । सकारात्मक सोच, सुख की खोज, काम का बोझ –उदार दृष्टिकोण का पक्षधर हैं । स्याद्वाद, मूल्यों का त्रिवर्ग, जैसे विषयों का विद्वत्तापूर्ण दार्शनिक विश्लेषण रचनाकार की जीवन दृष्टि से संप्रेरित और अनुप्रेरित है । अलग अलग और लघु निबंध होने से यदा-कदा एक समग्र दृष्टि का अभाव सा खटकता है ।

इसी प्रकार जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए लिखे गए कुछ आलेख, जैसे, ‘सफलता की राह की बाधाएं, ‘भाग्य भरोसे’, ‘दान’, ‘चिंता बनाम चिंतन’, ‘अवकाश और आलस्य’, आदि. में जीवन की प्रेरणा भरते हुए, लेखक ने नई पीढ़ी का मार्ग दर्शन किया है । स्थान स्थान पर इनमें उसका अपना अनुभव भी छायांकित है ।

संस्मरणात्मक लेखों में व्यावहारिकता के साथ कला की मर्मज्ञता का भी दर्शन होता है । त्योहारों के प्रति आस्था के साथ तर्क का भी समावेश है जो लेखक के अपने दृष्टिकोण का परिचायक है । इस तरह कुल मिलाकर सरोकार अपने नाम के अनुकूल जीवन के सरोकारों की एक सुन्दर, उत्प्रेरक और भावगर्भित रचना है ।

सरोकार :डा. सुरेन्द्र वर्मा ; पृष्ठ”104/-, मूल्य: 200 रुपये; संस्करण:2015; प्रकाशन: उमेश प्रकाशन,इलाहाबाद

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श्रीधर दीपेशए, 22 – पत्रकार कोलोनी   इलाहाबाद (उ.प्र