हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

सामग्री रोचक व सारगर्भित - संयोजक

Untitled-1अगस्त 26/2015

प्रिय त्रिपाठी जी ,

‘चेतना’ का नया अंक मिला ।पत्रिका की सारी सामग्री रोचक व सारगर्भित लगी । पढ़ने में बड़ा आनन्द आया ।मैं चेतना के विकास की आरम्भ से से साझी रही हूँ ।शिशु की तरह घुटनों पर चलना शुरू करके आज यह पत्रिका सुंदर कलेवर व स्तरीय रचनाएँ लेकर ,वयस्क रूप में हमारे सामने खड़ी है ।इसके द्वारा कैनेडा में हिन्दी के उत्थान व प्रसार के लिए आपने जो प्रयत्न किया है,वह सचमुच बहुत प्रशंसनीय है।इसके लिए मैं आपको हृदय से बधाई देती हूँ |
यह पत्र मैं विशेष रूप से आपके सम्पादकीय को पढ़कर लिख रही हूँ ।इसमें आपने जिस मानवीय समस्या के विषय में लिखा है , एक शिक्षिका होने के नाते मैं उससे परिचित हूँ ।यहाँ किसी भी प्रकार की शारीरिक असफलता के लिए सरकार प्रावधान रखती है । मेरी कक्षा में , एक समय,एक छह–सात साल का बच्चा था जो आंशिक रूप से बधिर था।उसके कारण, आस- पास के शोर को दबाने के लिए कक्षा में मोटा कारपेट लगवाया गया ।यह कारपेट उसके साथ- साथ अन्य कक्षाओं में भी भेजा जाता था ।साथ ही मुझे भी एक यंत्र बराबर पहनना पड़ता था,जिससे मेरी आवाज़ तेज़ होकर उस तक पहुँच सके ।इन सब सुविधाओं के कारण वह बच्चा कक्षा का काम सुचारू रूप से कर लेता था । न कोई उस पर हँसता था न मजाक बनाता था । उसकी उन्नति व आत्म विश्वास में कोई कमी मैंने नहीं देखी ।
मैं नहीं जानती कि भारत के विद्यालयों ने इस दिशा में कितनी उन्नति की है ।आशा करती हूँ की यदि अभी नहीं तो निकट भविष्य में इस समस्या पर ध्यान दिया जाएगा,वरना न जाने कालान्तर में मिलती रहेगी। इससे पहले भी मैं ‘चेतना’ की उपलब्धियों की चर्चा कर चुकी हूँ।डा. कामिल बुल्के के विषय में चेतना के द्वारा जो सामग्री हम तक पहुँचाई गई थी,उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।ढींगरा फाउण्डेशन हिन्दी चेतना द्वारा साहित्यकारों को दिए जाने वाले सम्मानों की घोषणा देखकर बहुत अच्छा लगा।ऊषा प्रियंवदा जी मेरे समय में प्रयाग विश्वविद्यालय में थीं ।पुरस्कृत साहित्यकारों में उनका नाम देखकर बहुत अच्छा लगा ।
आपके सम्पादकीय में डा.रघुवंश के विषय में पढ़ा। उनसे हमारे बहुत निकट के पारिवारिक सम्बन्ध रहे हैं।उनकी पंगुता केवल दोनों हाथों की थी । वे सदा भूमि पर बैठकर लिखते थे– मोती जैसे अक्षर । उनमें आत्म विश्वास की कोई कमी नहीं थी ।वे कठिन श्रम करने में समर्थ थे ।प्रयाग विश्वविद्यालय से हिन्दी में ‘ डॉक्टरेट’ करने के बाद हिन्दी विभाग में उनकी नियुक्ति का प्रश्न उठा ।शैक्षिक रूप से पूरी तरह योग्य होने के बावजूद उनकी नियुक्ति पर आपत्ति की गई ।एक शिक्षक को बहुधा ब्लैक बोर्ड पर लिखना होता है ,यह डा. रघुवंश कैसे कर सकेंगे । यह प्रश्न उठाया गया।
मुझे इस बात का गर्व है कि उस समय के वरिष्ठ आचार्यों ने,जिनमें मेरे श्वसुर डा.धीरेन्द्र वर्मा (अध्यक्ष हिन्दी विभाग), मेरे पिता (डा.बाबूराम सक्सेना) अध्यक्ष संस्कृत विभाग भी सम्मिलित थे, इन सभी ने उनका समर्थन किया।ये लोग उस समय विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य थे । इलाहाबाद के सभी साहित्यकारों ने व्यक्तिगत रूप से अपना समर्थन दिया व डा. रघुवंश की नियुक्ति हुई ।उनकी उपलब्धियों की चर्चा आपने की है । डा.रघुवंश प्रयाग विश्वविद्यालय से ही रिटायर हुए।उनकी पत्नी सावित्री जी ने उनका पूर्ण रूप से सहयोग दिया। आज उनकी चारो संतानें अच्छे पदों पर आसीन हैं ।
आज मैं आधी सदी से काफी पहले प्रयाग विश्वविद्यालय ने जो ठोस कदम इस दिशा में उठाया था , उसकी मैं मन से प्रशंसा करती हूँ ।
आशा है कि आपका स्वास्थ्य ठीक होगा । आपको व प्रिय सुरेखा को स्नेह के साथ ,
दीप्ति अचला कुमार
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