हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

सुबह का सपना - डॉ.गुणशेखर

बाहर पसरे सन्नाटे और अंधेरे को चीरते गोलियों सरीखे स्वरों में  ‘अल्ला हो अकबर’ के नारे गूँज रहे थे और मैं सबसे कोने वाली फोल्डिंग के नीचे दम साधे पड़ा था.भय को लपेटे रात की सारी कालिमा

डॉ.गुणशेखर
डॉ.गुणशेखर

मेरे कलेजे में धँसी जा रही। आज फिर पूरा आस्तिक हो गया था और कुछ-कुछ अन्धविश्वासी भी कि सवेरे देखा गया सपना सच होता है.मुझे लग रहा था कि आंटी जी सही कह रही थीं कि जिसकी मौत देखी जाती है ,उसकी उम्र बढ़ जाती है.मौत जिसकी देखी जाती है उसकी नहीं होती, किसी दूसरे की होती है.मंगलेश की मौत देखी थी । आंटी के अनुसार उसकी तो उम्र बढ़ गई थी और मेरी  मौत निश्चित हो गई थी.

यह जानते हुए भी कि भीड़ के पागलपन से राम और अल्लाह भी नहीं बचा सकते हैं, मैंने फटाफट राम और अल्लाह दोनों को याद कर डाला.मन ही मन दोनों से ऐसे कह रहा था जैसे उनकी बाँह पकड़ कर भरोसा दिलारहा होऊँ  ,’मैं नास्तिक कब हुआ था.वह तो लोगों को बेवकूफ बना रहा था.तुमने कबूतर,हाथी और प्रहलाद को बचाया है. मेरी भी रक्षा करो भगवन!’ फोल्डिंग के नीचे मैं छिपा था रिज़वान ने उस पर गद्दे रजाई डाल दिए थे.लोग दरवाज़ा तोड़ें उसके पहले ही रिजवान ने कमरे के दोनों पल्ले तक खोल दिए थे.उसने ईमानदारी दिखाने वाले सारे टोटके आजमा रखे थे। आँधी इतनी तेज़ थी कि पल्ले हवा से फड़-फड़ फटाक ,फड़-फड़ फटाक  करके रणभेरी बजा रहे थे.मुझे तो हर फटाक की आवाज़ पर मौत दस्तक देती हुई लग रही थी.भय और प्यार के अतिरेक में अनुमान की आँखें असल से भी तेज़ हो जाती हैं। मैं अँधेरे में भी पड़े-पड़े तलवारों और गड़ासों की चमक साफ़-साफ़ देख पा रहा था.अचानक किसी की लात दरवाज़े पर लगी.दरवाज़ा मिमियाकर शांत हो गया .वैसे ज़रा-सी हवा पर अँगड़ाता था.चरर-मरर चरमर चरमर करके तब शान्त होता था   ; पर आज एक  ही लात में कैसा मेमना बन गया.मैंने इस बीच हनुमान चालीसा भी पूरा कर लिया था.जिसने दरवाज़े पर लात मारी थी   ;उसने रिजवान से कड़कती आवाज़ में पूछा भी  ,“वो काफ़िर कहाँ गया?” रिजवान ने अनभिज्ञ बनकर दुहराया, “कौन काफ़िर भाईजान?” उसने तलवार हवा में ऐसे लहराई कि उसकी साँय की सरसराती प्राणहारी शीत लहर सीधे फोल्डिंग के नीचे घुस आई.रिज़वान ने  तुरंत बिगड़ी बात को सँभाला .बोला, “कौन, वो पंडित.. ?भाईजान!”

उसने तपाक से कहा, “हाँ-हाँ, वही साला पंडत जो महमूद अंसारी पेट्रोल पंप वाले की छोरी पटाए हुए है.” इसके आगे भी वह कुछ बड़बड़ाया पर वह बहुत स्पष्ट न था , “वही क्या कहते हैं?”इस बात पर ही वह काफ़ी देर तकअटक- अटक कर हकलाता हुआ बोलता रहा.अबकी रिज़वान ने एक अटकाव के बीच में ही खीप की तरह उसके द्वारा अपेक्षित नाम जोड़कर उसका विश्वास लूटना चाहा,” क्या खालसा कालेज वाला मंगलेश ?भाईजान!”

इस बात पर तो वह बहुत ही  खुश हो गया .बोला ,”हाँ,हाँ वही। कहाँ है साला?हम लोगों ने उसको भी खोजा पर कहीं मिला ही नहीं.पता बता दो तो मालामाल कर देंगे।” वह रिजवान से  पूछताछ कर  ही रहा था कि दस-बीस लोग “अल्ला हो अकबर” ‘के नारे लगाते हुए वहाँ आ पहुँचे.भीड़ कुछ हरकत करे उसके पहले ही भीड़ को सुनाते हुए रिजवान बोल उठा, “हाँ,भाईजान वे दोनों कल ही तो गाँव गए हैं.कल पक्का आ जाएँगे.जैसे ही वे आएँगे तो हम आपको खुद चलके बता देंगे.” वह फिर बोला , “उसका क्या नाम है?रिजवान ने कहा , “हाँ,मंगलेश.” वह लुंगी उठाकर चलते हुए फिर बोला , “भूलना नहीं .हमको मुंडी चाहिए मुंडी .तुम भूलेंगा तो तुम्हारी मुंडी कटेंगा.और वो साला महमूद! ढफाली की औलाद.उसका तो पेट्रोल पंप फूँकेंगा.उसके तहमद में पेट्रोल डाल के अपुन खुद आग लगाएँगा। कौम  की इज्ज़त लुटा रहा है। उसको कौन नहीं जानता है कि वह साला खुद बिराहीम पुर वाले रहमान ढफाली की औलाद है. वह आँख मूँद लेंगा तो क्या सारी जात-बिरादरी वाले मूँद लेंगा .देखना तंदूरी चिकन टिक्के की तरह फूँक  के धर देंगे साले को.’’

फोल्डिंग के नीचे दम साधे पड़े-पड़े मेरे दिमाग में रह-रह के वह सपना कौंध रहा था जो मंगलेश ने कल देखा था.कल सुबह-सुबह डर के मारे काँपता हुआ वह मेरे पास आकर  बोला था ,” मेरा सूटकेस रख लो मैं गाँव जा रहा हूँ.”मैंने उसे समझाया ऎसी कौन-सी आफ़त आ गई जो इतने सुबह निकल पड़े.रुको चाय बनाता हूँ.पी लो तब आराम से निकलना.अभी जाड़ों में इतना कुहरा पड़ता है कि छह वाली बस भी घंटा भर घुर्र-घुर्र करके सात बजे ही निकल पाती है.सवारियाँ ही नहीं निकलती हैं इन दिनों.कल चलो तो मैं भी चल दूँगा.उसने कहा ,”एक दिन क्या एक घंटा यहाँ नहीं रुकूँगा.”मुझे लगा कि इसके पिता जी की तबीयत ज्यादा खराब थी कोई बुरी खबर न हो.यही सोचकर उसे बांह पकड़ के ज़बरन बिठा लिया.उठकर ब्रश पर मंजन चुपड़ा और बाथरूम की ओर जाने लगा तो वह भी खड़ा हो गया.मुझे लगा कि यह भी मंजन–वंजन करेगा.लेकिन वह तो बस पूरी तरह से निकल भागने के मूड में था.मैं वाशबेसिन तक भी न पहुँच पाया था कि उसने टोका ,”अच्छा,मैं निकल रहा हूँ.दरवाज़ा बंद कर लो.’’उसकी इस बेहूदी हरकत पर गाली देने का मन हुआ लेकिन दिया नहीं .मन मार लिया .सोचा हो सकता है कोई बुरा हादसा हो.ऐसे में आदमी बदहवास तो हो ही जाता है.ब्रश लिए-लिए दौड़ा और इस बार थोड़ा झटके से उसे बाँह से पकड़ के फोल्डिंग पर ऐसे बिठाया कि वह उसी में धँस गया.वह सँभलते-सँभलते भी ऐसा लड़खड़ा के नीचे आया कि सड़ी प्लास्टिक के तड़ातड़ करके दो-तीन पट्टे टूट गए.वह तो पहले से ही झोल मार रही थी अब तो और झूला बन जाएगी यही सोच-सोच के पट्टों से ज्यादा मैं टूट रहा था पर कसमसा के रह गया.

उसके लाख मना करने पर भी मैंने चाय चढ़ा ही दी.वह चाय बनाते समय बार-बार उठ-उठ कर भगोने में झाँक रहा था.इससे उसकी बेचैनी साफ़ झलक रही थी.पहली बार तो पानी रखते ही उसने भगोने में झाँका .उसके झाँकने की शैली से लगा कि अपना खुद का डरा हुआ चेहरा  वह पानी में देख रहा था.बीच-बीच में वह पूछ भी रहा था, “सवेरे के सपने सच हो जाते हैं क्या?’’जितनी बार वह पूछता मैं टाल जाता.मुझे लगता कि इसने ज़रूर अपने पिताजी की मौत का सपना देखा होगा.इसलिए इतना डरा हुआ है.लेकिन पूछता तो पूछता क्या। मैंने सुना था डर से चेहरा पीला पड़ जाता है.इसकी सच्चाई जानने के लिए मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा. उसका चेहरा सच में पीला पड़ गया था. दूसरा और कोई दिन होता तो मैं पूछता कि आज पिता की कीमत समझ में आई.लेकिन आज की स्थिति को देखते हुए यह ओछी हरकत होती जो मित्र के साथ करना ठीक नहीं थी.एक बार को मेरे मन में यह भी आया कि कह दूँ कि कहीं जेबू के भाइयों ने गंड़ासा लेकर तो नहीं दौड़ाया?ये सब बातें मन की थीं मन में ही रखना उचित था.उससे दो कपें निकालने के लिए कहा .वह फ़ौरन निकाल लाया.पहले जो आसानी से उठता नहीं था आज कहते ही काम कर रहा था और कभी-कभी कहने से पहले ही इच्छित सामान उठाकर हमारे हाथ में दे रहा था.स्टोव पर पानी रखते ही अदरक कस दी थी। छन्नी लाके बगल में रख गया था। मुझे आश्चर्य था कि पांडा जैसा आलसी प्राणी अचानक अपने चरित्र के विपरीत चीते जितना  तेज़ कैसे हो गया है.

हम दोनों चाय पीके बाहर निकल लिये थे.वह पीछे मुड़-मुड़कर ऐसे देख रहा था ,जैसे उसका कहीं कुछ गिर गया हो और वह उसे पाने के लिए सर्कस की लाइट की तरह दूर तक नज़रें फेंक रहा था.आज कुछ ज्यादा लम्बे डग भी रख रहा था.वह अकेले निकलने में डर रहा था.मुझे भी लगा अगर घर पर कुछ अनहोनी हुई तो एक मित्र का साथ रहना ज़रूरी है.इसीलिए उसके एक-दो बार कहने पर ही मान गया.उसने मेरा किराया देने का प्रस्ताव भी रखा ;लेकिन मौके की नजाकत को देखते हुए वह मुझे किसी भी कीमत में उचित नहीं जान पड़ा.बस स्टॉप पर पहुँचते ही  वह, ‘बस आए तो पुकार लेना’ कहकर चाय की दूकान की एक टुटही बेंच पर बैठकर अखबार पढ़ने लगा.वह अखबार ऐसे पढ़ रहा था कि उसका पूरा चेहरा अखबार से ढका रहे.वह कपड़े भी पुराने-धुराने और मैले-कुचैले पहनकर आया था.वे कपड़े इधर कई महीनों से मैंने उसके शरीर पर नहीं देखे थे.इससे लग रहा था कि पूरे शोक के माहौल में वह पहले से ही आ गया था.मुहर्रमी शक्ल और मातमी कपड़े.बार-बार मन मसोसकर रह जा रहा था.मैं उसके घर वालों को कोस रहा था कि इसके घर वालों ने एक फोन भी नहीं ले रखा है ,जो उसी से हाल-चाल ले लूँ.आज दो तारीख है। अंकल जी आज ही कस्बे से घर का किराया लेकर लौटे होंगे। कस्बे वाले मकान पर भी फोन नहीं है.किराएदार के पास मोबाइल है ;लेकिन उसका नंबर मंगलेश मुझे देता ही नहीं.सोचता है किराएदार की बेटी को उसकी  पोलपट्टी बताकर उसका पत्ता कटवा दूँगा.मंगलेश से कहूँ तो कहूँ क्या कि वह किराएदार को क्यों फोन करे?वह इसे अपनी मज़ाक उड़ाना  मानकर दु;खी हो जाएगा.अंकल के पड़ोसी मिश्रा जी से मेरी खूब पटती है.उनके यहाँ फोन है भी तो उनसे इसके पिताजी छत्तीस का रिश्ता रखते हैं.ये रात में गए होंगे ब्रह्म मुहूर्त में निकल लिए होंगे.उन्हें कानोंकान ख़बर न हुई होगी.अंकल और मिश्रा जी मे पुरानी तनातनी के चलते उनसे ख़बर सीधी ही मिले यह भी आशा नहीं की जा सकती.इसीलिए चुप मार गया.यह तनातनी जबसे घर बनवाया है तभी से है। मंगलेश बताता है कि उसके  पिता जी और मिश्रा जी ने साथ-साथ ज़मीन ली थी.इसके पहले दोनों साथ जिएँगे,साथ मरेंगे की तर्ज़ पर जीने का वादा करके ज़मीन लिखाकर अपने-अपने किराए के घरों में लौटे थे.घर बने तो साथ-साथ जीने की कसमें चरमरा के टूट गईं.इस टूटन की शुरुआत मिश्रा जी की ओर से ही हुई थी .पहले उनका घर बना था बाद में मंगलेश का.उनका घर बनने के पांच साल बाद अंकल  ने भूमि पूजन किया फिर साल भर बाद नींव भराई.मंगलेश की दो बहनों की शादी में अंकल खाली हो गए थे;इसलिए फुटकर-फुटकर काम करा रहे थे.मिश्रा जी प्रायः अंकल जी से इसपर चुटकी लेते थे.बात-बात में उनसे प्लानिंग–प्लानिंग कहते रहते थे .मिश्रा जी की यही बात अंकल को  चुभती थी.इसके बाद जब अंकल घर बनाने लगे ,तो घर बनते समय मिश्राजी एक महीने की छुट्टी लेकर गाँव चले गए.वैसे रहने पर भी किचकिच कुछ कम न था. बिजली-पानी देने और चाय-पानी पूछने में मिश्रा जी कम मिसराइन बहुत नाक–भौं सिकोड़ती थीं.उनके रहते हुए भी अंकल ने नगरपालिका से पानी के टैंकर खरीदकर समर्सेबल की बोरिंग करवाई थी.मिश्रा जी के  अगले बंगले वाले कुशवाहा जी के यहाँ से बिजली लेकर घर का काम करवाया था.कुशवाहा जी भी किसी लोमड़ी से कम न थे.इस काम के लिए उन्होंने पूरे तीन हज़ार वसूले थे.इसके बावजूद अधबीच में हाथ खड़े कर दिए थे.अंत में खुद बिजली लेने के फैसले ने बिजली विभाग ने अपनी ऐसी परिक्रमा कराई कि अंकल जी के हाथ-पैर ही फूल गए.बिजली वाले कभी कोई कागज़  माँगते कभी कोई.घर नहीं था तो राशन कार्ड नहीं बन सका. राशन कार्ड नहीं बन सकने से आधार कार्ड नहीं बन पाया और आधार कार्ड नहीं बन पाने से ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन पा रहा था.सभी कोई न कोई कागज़ माँग रहे थे  ; लेकिन यह कोई नहीं बता रहां था  कि यह समस्या हल कैसे होगी.अंततःआंटी का हार गिरवीं रखा गया.बिजली विभाग के ही एक कर्मचारी ने बीस हज़ार की घूस लेकर सब पेपर तैयार कराए और बिजली का कनेक्शन भी दिला दिया .पहले बिना पक्का मकान बने बिजली का कनेक्शन लेने से ट्रांसफ़ॉर्मर दगा जा रहा था और उससे जिस जेई की  नौकरी जा रही थी  ; घूस लेने के बाद उसी ने आकर तार जोड़े.अब न ट्रांसफ़ॉर्मर दगा और न उसकी नौकरी गई.उन्हीं पेपरों के बल पर बैंक का क़र्ज़ भी फ़टाफ़ट पास हो गया था. अंकल नए-नए थे यदि मिश्रा जी मदद कर देते तो वही काम दस हज़ार में हो जाता.आदर्शवादी मिश्रा जी भी ऐसे ही घर बनवाए थे  ; लेकिन अंकल को नहीं बता रहे थे.अंकल को बस इसी बात से चिढ थी कि मिश्रा जी हरिश्चंद्र बनने का ढोंग क्यों करते हैं?घूस देते हैं  ; तो खुलकर कहते क्यों नहीं. दूसरी बात यह कि मित्र वही है जो ज़रूरत पर काम आए.इसके लिए अक्सर वे गोस्वामी जी की उक्ति भी दुहराते थे ‘धीरज,धरम,मित्र अरु नारी.आपतकाल  परखिए चारी.’ इस कसौटी पर मिश्रा जी फेल हो गए थे ,तबसे अंकल उनसे चिढ़ने लगे थे.जब वे यह उक्ति मेरे सामने सुनाते तो मुझे लगता था कि जैसे वे मुझे ही सुना रहे हैं कि मित्र बनो तो साथ निभाओ.आज उसी उक्ति को याद करके मंगलेश के साथ चल पड़ा था.

आज दो बसें कैंसिल हुई थीं.तीसरी आई तो तीन बसों की सवारियाँ उस जर्जर बस पर टूट पड़ीं.मैंने मंगलेश को पुकारा वह अब भी अखबार पढ़ रहा था.वह इतने ध्यान से तो कभी कोर्स की किताबें नहीं पढता था ,जितने ध्यान से अखबार पढ़ रहा था.दो-तीन बार चिल्लाने पर भी जब उसने नहीं सुना; तब तो मुझसे नहीं रहा गया.दौडकर उसके पास गया और अब बस भी करो यार कहकर उसे बाँह पकडकर घसीट लिया.बस के दरवाज़े के बीचोबीच घमासान मचा था. निकलने वालों से ज्यादा घुसने वाले ताकत लगा रहे थे.इस युद्ध में कुछ नया देखने को मिल रहा था.पहली बार देखा कि विजयी भी धराशायी हो रहे थे.निकलने वाले सड़क पर ढेर हो रहे थे और भीतर जाने में सफल होने वाले बस  की गैलरी में.इस धमा चौकड़ी में पहले से ही बैठी एक सवारी के सर में सूटकेस का कोना ऐसा धँसा कि लगे बस स्क्रू कसना बाक़ी है.उसकी झक्क सफ़ेद शर्ट उसी के खून से बांबे डाइंग की छींट की तरह बेलबूटेदार हो गई थी.किसी तरह हम दोनों भी मेले के इसी रेले में बस के भीतर पहुँच गए थे.कंडक्टर घूसे मार-मार कर ठूँस रहा था ;लेकिन सवारियाँ टस से मस नहीं हो रही थीं.

आधे घंटे तक तो यही होता रहा.किसी का सामान ऊपर पहुँच गया था पर सवारी नीचे रह गई थी ; तो कोई सवारी ऊपर पहुँच गई थी पर सामान नीचे ही पड़ा रह गया था.इंसान और सामान की इस आवाजाही में आधा घंटा और बर्बाद हुआ.कंडक्टर ने इस बीच कपड़े-लत्तों के हिसाब से लोगों की लानत-मलामत की.अपने कपड़ों के कारण ही इस कार्रवाई के लपेटे में मंगलेश भी आ गया था.उसके भी बेमतलब एक तमाचा कंडक्टर ने जड़ दिया था.इस पर मैंने भी भीड़ का लाभ उठाकर कंडक्टर को हूल दिया था.मेरी हूल इतनी सटीक बैठी थी कि वह बस  काँखकर रह गया था.पूरे एक मिनट तक तो वह पेट पकड़े कसमसाता रहा। उसके बाद हूल के बदले में बहुत ज़ोरों से प्रश्नवाचक भाव में इस  टीस के साथ कि, “किस मादर..ने” माँ की गाली दी ,पर किसको दी यह न उसे पता था न औरों को.लेकिन मुझे पता था कि वह लक्ष्यहीन गोली किसको लगेगी। वह गाली गोली की तरह सीधे मुझे ही आकर लगी थी।  सो मुझे पता था कि पक्का मुझे ही दी गई है.एक बार को मेरे कलेजे में हूक–सी उठी कि साले को फिर से हन  दें लेकिन मंगलेश के हालात के कारण बेबात बात बढ़ाने के डर से मन मसोसकर रह गया।

टिकट कटने शुरू हुए.बीस फिटी बस में कंडक्टर द्वारा दसियों कोस की परिक्रमा करके कट भी गए.इसके बाद भी बस रुकी रही. कंडक्टर अब गिनती कर रहा था.बार-बार पूछता कोई स्टाफ़ या एमएसटी?वह माँ-बहिन की गाली बकता फिर गिनती शुरू करता.अंत में थक हार कर उसने एक-एक का टिकट देखना शुरू किया.वह रिरियाता ,खीझता और गरियाता हुआ आख़िर तक पहुँचने वाला ही था कि एक मरियल-सा युवक टिकट के पैसे कंडक्टर को दिखाने लगा.कंडक्टर ने पैसे थामने के पहले तीन-चार झापड़ उसे रसीद किए ,फिर जी भर के गालियाँ दीं.बाद में इसका कारण पता चला कि कल ही उस कंडक्टर ने हज़ार रुपए का जुर्माना भरा था.दूसरे लोग मुँहामुँहीं कर रहे थे कि, ‘कल तक तो टिकट ही कहाँ देता था.?इसने तो लाखों कमा लिये होंगे .हज़ार भर  भी दिए तो क्या?’इस जद्दोजहद मे बस काफ़ी देर में चल पाई.जाड़े में भी पसीना छूट रहा था.सरकार बदलने के बाद जाड़ा न लगने से ‘अच्छे दिन’ आ जाने का विश्वास हो रहा था. कुछ दूर चलकर बस रुक गई.कंडक्टर ने बोनट खोल कर इंजन में पानी उँडेला.पुरानी सरकार की तरह इस बस से भी खूब भाप निकली.हम लोगों के साथ-साथ इंजन भी गर्म हो गया था.मंगलेश ने कई बार कोंच-कोंचकर कुछ पूछना चाहा ,तो मैंने झिड़क दिया .मैं जानता था कि वही सपने वाली बात करेगा.अबकी बस चली तो मंगलेश से बिल्कुल न रहा गया.आखिर उसने पूछ ही लिया, “अमा यार बताते क्यों नहीं कि सवेरे के देखे सपने सच हो जाते हैं क्या?”अबकी मैंने उसे डाँटते हुए कहा यह किस बेवकूफ ने तुमसे कहा.मैंने आगे उसे समझाया कि अब सपना मत सुनाने लगना.मेरी इस हिदायत से आगे पूछना चाहते हुए भी वह चुप हो गया.

सुबह सात बजे के चले-चले  तीन बजे हम अपने गाँव पहुँच रहे थे.दूरी पूछिए तो केवल सत्तर किलोमीटर की थी.इससे पहले तो साइकिल से चलकर आया जा सकता था;लेकिन अब साइकिल चलाता कौन है। सब आराम तलब हो गए हैं। जब बस अड्डे पहुँचे तो आज बाज़ार का दिन होने के बावजूद उतरने में वह हड़बड़ी नहीं थी जो चढ़ने के समय सब दिखा रहे थे.बस अड्डे के पीछे ही बाज़ार लगती है.यहाँ बस तीन घंटे खड़ी रहेगी.इसलिए केवल उतरने वाले लोग थे.दूसरे सब अपने गंतव्य पर आ चुके थे; इसलिए किसी में हड़बड़ी नहीं थी.हम दोनों भी बस से उतर लिये .गाँव के रास्ते पर मुड़ने ही वाले थे कि अंकल दिख गए.उन्हें देखकर मेरी साँस में साँस आ गई। मुझे लगा कि अब मंगलेश भी सामान्य हो गया होगा । मज़ाक-मज़ाक में उसके सीने पर हाथ रखा,तो उसकी साँसें अब भी सामान्य न  थीं। उसकी छाती धौंकनी –सी फूल-फूल कर तेज़-तेज़ हवा छोड़ रही थी। अंकल  गाँव से बाज़ार आ रहे थे.हम दोनों ने लपक के उनके पैर छुए.उन्होंने भी लम्बे-लम्बे आशीर्वाद दिए.उन्होंने अपने स्वभाव के अनुसार संक्षेप मे कुशल क्षेम पूछी और कहा , ‘ज़ल्दी से घर पहुँचो।  भूखे होगे.’इतना कहके लम्बे डग भरते हुए आगे बढ़ गए.रिटायर होने के बाद से अंकल गाँव वाले घर में ही रहने लगे थे.कस्बे वाले घर को किराए पर उठा दिया था. कस्बे वाले घर में जो एक कमरा अपने लिए छोड़ रखा था दीवाली के आस-पास के कुछ दिनों के लिए उसी में रहने आ जाते थे.वह भी इसलिए आ जाते थे कि कब्ज़ा बना रहे.गाँव में रहने के उनके अपने तर्क थे। खुले में शौच जाने को मिलता था। नीम की दातुन और श्यामा गाय का ताज़ा-ताज़ा धारोष्ण दूध। लेकिन कस्बे में न रह पाने का सबसे  बड़ा कारण वे बिजली को मानते थे। उनका साफ मानना था कि गाँव में बिजली के बिना रहा जा सकता है ;लेकिन शहर में नहीं.

मंगलेश बताता है कि उसे गाँव में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.इस बात के लिए जब वह अपने पिता पर खीझता है, तो इसपर अंकल कहते हैं, ‘तुम्हें कौन गाँव में रहना है.शहर में पढ़ना और शहर में नौकरी करना.मैं उसके क़स्बे वाले घर में भी गया हूँ.उसमें एक किराएदार हैं मनोहर लाल.उनकी बेटी है रम्या .यथा नामे तथा गुणे.रूप टपकता है.बिल्कुल ऐश्वर्या राय लगती है.ढेले जैसी बड़ी-बड़ी बिल्लौरी आँखें.कमर को छूते खुले बाल.मंगलेश बताता है कि जब वे दोनों छठी में पढ़ते थे ,तो एक दिन इसने रम्या से यह क्या कह दिया कि, “रम्या! तुम्हारे खुले बाल ही अच्छे लगते हैं।’ उस दिन से उसने केश बाँधना ही छोड़ दिया.इसके लिए वह स्कूल के दिनों में क्लासटीचर और  प्रिंसिपल से खूब सताई भी गई  ;लेकिन बाल न बाँधे तो न बाँधे.बचपन में कही गई अपने प्रिय की बात उसने गाँठ बाँध ली है.अपने मंगलेश के लिए उसकी अनुपस्थिति में भी वह खुले बालों में ही रहती है।अब तो वह खुद भी खुले बालों में ही सुकून महसूस करती है.

मंगलेश में भी रम्या के प्रति खिंचाव कम नहीं है.किराया लेने हर महीने मंगलेश ही जाता है.कभी-कभी इतनी देर में बरेली से निकलता है कि बाजपुर तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो जाए.ज़्यादातर देर के बहाने से वह वहीं रुक भी जाता है.पैसे चोरी हो जाने,छिन या कट जाने का भय दिखाकर पिता जी को भी मना लेता है. पिता जी जान भी जाते होंगे तो भी क्या.आखिर उनकी भी देह में भी दिल तो है ही.मंगलेश को कई बार यह पंक्ति गुनगुनाते सुना है,”लरिकाई कौ प्रेम कहउ अलि कैसे छूटे.”

घर पहुँचते ही आंटी ने एक चूल्हे पर फटाफट चाय चढ़ा दी थी  और दूसरे पर सब्जी छौंक दी.हम दोनों को चाय पकड़ाकर वह आटा गूँथने लगी थी । इतने में मंगलेश ने फिर पूछ लिया , “प्लीज़ बताओ न सुबह का देखा सपना सच हो जाता है क्या ?”वह इतना धीरे बोला था कि ध्यान कहीं और होने के कारण मैं सुन न सका। अबकी मैंने बिना। डाँटे उससे  पूछा- सपना क्या है?उसने कहा “सपना वहीं चलकर बताएँगे.” पर आंटी ने सपने की बात सुन ली थी. वह बोली, “सुबह-सवेरे के देखे सपने टरते नाय हैं बचवा.” इस वेद वाक्य से वह काँप गया था.उस बीच आंटी रोटी सेंकने लगी थी और उनका मुँह चूल्हे की ओर था.मैं बगल में ही बैठा था.इस वज़ह से मंगलेश के डर को भाँप गया था.मैंने बात टालने की गरज से कहा कुछ सपने उलटे भी होते हैं जैसे किसी का मरना देखना या शादी आदि.आंटी जैसे हरकत में आ गईं और बोलीं, “हाँ,बचवा.किसी की मौत देखना उइकी ज़िन्दगी बढ़ना है.माने अल्प टलना.अउर सादी–बियाह देखने का मतलब हइ कि जीकी सादी होइ रही है ऊ पक्का भगवान के घरे जाई.” इसके बाद मैंने बारी-बारी से कई सपनों और उनके फल के बारे में आंटी से शंका समाधान किया.मंगलेश हर सपने पर टोकता पर जब तक सब्जी नहीं पक गई मैं पूछता रहा  और वे समाधान करती रहीं.

चार रोटी सिंकते ही उन्होंने सारे शंका समाधानों को बीच में छोड़ चूल्हे की आग आगे खींच ली.दो थालियाँ निकालीं और दोनों में दो-दो रोटी रखके हम दोनों के सामने रख गईं.संदूक में रखा घी का डब्बा उठा लाईं.उसमें से दो ढेले घी निकाला। एक को कटोरे में गर्म किया और दूसरा वैसे ही रहने दिया। जाड़े के कारण खूब कड़े हो गए घी के दो ढेले बाहर रख लिये.जिस ढेले को गरम किया था,उसमें से एक-एक चम्मच घी हम लोगों की सब्जी में डाला और डब्बा संदूक में रखके उल्टे पाँव  लौट आईं। लौटते ही हम लोगों की थाली में बची एक-एक रोटी में वह घी का ढेला खूब रगड़-रगड़कर रोटियों को तर करके हटीं, तो  चूल्हे के पास बैठ गईं. लकड़ियाँ चूल्हे में सरकाईं और फिर से रोटी सेंकने में लग गईं.

मंगलेश ने माँ को गीली लकड़ियाँ सुलगाने में उलझी देखकर फिर फुसफुसाते हुए मुझसे कहा ,”मैंने ठीक पाँच बजे सपना देखा है कि जेबू के भाइयों को जैसे पता चला कि वह मुझसे प्यार करती है ,तो सबसे पहले उन्होंने उसका सर कलम किया और फिर वही खून भरी तलवार लेकर मेरे कमरे पर आ गए.कुण्डी खटखटाई तो मैंने दरवाज़ा खोल दिया.बिना कुछ कहे- सुने जेबू के छोटे भाई छुट्टन ने छूटते ही मुझे बाहर घसीट लिया और मेरी छाती पर चढ़कर बैठ गया और अपने बड़े भाई जो तलवार हवा में लहरा रहे थे ,उन्हें इशारा कर दिया. इसके बाद बिना कोई विलम्ब किए उन्होंने सटाक से मेरी गर्दन उड़ा दी.मैं भी कैसा कि उस कटी हुई मुंडी से भी अपनी मुंडी और धड़ दोनों देख पा रहा था.”सपना सुनाते समय उसके माथे पर पसीने की बूंदे साफ-साफ झलक रही थीं। मैंने कहा निश्चिन्त रहो यह सब बकवास है.सपने अवचेतन की उपज हैं.जब हम सोते हैं तो हमारा चेतन मस्तिष्क तो सोता है; लेकिन अवचेतन नहीं.उसकी रील चलती रहती है; लेकिन वह चेतन तो है नहीं;इसलिए गलत –सही या आगे-पीछे का होश उसे नहीं रहता.इसलिए सपनों में कोई तारतम्य या तर्क नहीं होता.मनोविज्ञान में सबकुछ स्पष्ट किया गया है.क्वार्टर पर चलकर तुम्हें इत्मीनान से समझाएँगे.क्वार्टर के नाम पर उसके झुरझुरी छूटने लगी.पसीने की बूँदे और बड़ी-बड़ी होकर टप-टप टपकने लगीं।

मंगलेश कहता रहा कि, “मुझे अपनी मौत की चिंता नहीं है.मैं तो अपनी जेबू के नाम पर दस दफा ख़ुशी-ख़ुशी गर्दन कटवा सकता हूँ.मुझे चिंता है तो अपनी जेबू की कि मेरे न रहने पर वह जी नहीं पाएगी.”जेबू है ही ऐसी कि उसके लिए कई ज़िंदगियाँ कुर्बान कर दो तो भी कुछ नहीं। मुझे लगता था कि कई भले ना हों पर मेरी  कुर्बानी तो कभी भी की जा सकती है.उसके लिए कभी मैं भी मीठे-मीठे सपने देखा करता था .कई बार तो सुबह-सुबह भी उसके सपने देखे  ;लेकिन वे कभी सच न हुए.सच हुए तो उसके जिसे गुलाब और गेंदे तक के फ़र्क का शऊर नहीं. एक बार सुबह-सुबह मैंने सपने में देखा कि जेबू मुझसे कह रही  है कि, “मुझे मंगलेश अच्छा नहीं लगता.वह किताबों में खोया रहता है.तुम्हीं मुझे कहीं घुमाने ले चलो.”उसके बाद वह मेरे साथ मसूरी घूमने गई है.मसूरी  पहाड़ों की रानी है तो जेबू हमारे  दिल की.माल रोड से अकादमी तक हम दोनों बाँहों में बाहें डाले पैदल ही कब पहुँच गए पता ही नहीं चला.इतनी ही दूर में गुलाब की पंखुड़ियों-से उसके होठ वादियों की नर्म-नर्म कोमल धूप में भी  इतना मुरझा गए थे कि लगता था अभी झर जाएँगे.यह सपना देख ही रहा था तब तक रिजवान ने मेरी चादर खींच ली थी.रिजवान की नादानी भरी मज़ाक से मेरा सुहाना सपना टूक-टूक हो गया था.

इन दिनों मैं और मंगलेश  बरेली कॉलेज के पीछे वाले इलाके में आधा किलोमीटर के दरम्यान ही रह रहे थे.मैं,रिजवान और मंगलेश सहपाठी थे.साथ में जेबुन्निसा जिसे हम तीनों प्रेम से जेबू कह लिया करते थे,वह भी पढ़ रही थी. जेबू के हृदय –क्षेत्र के चुनाव में शुरू-शुरू में तो हम तीनों ने पर्चे भरे थे  ;लेकिन बाद में मंगलेश की दावेदारी प्रबल देखकर हमने और रिजवान ने अपना नामांकन खुशी-खुशी वापस भी ले लिया था और वह अपने प्रेम का चुनाव निर्विरोध जीत गया था.हमारे  कॉलेज में अघोषित रूप से अपने ही धर्म और जाति में प्रेम करने का प्राकृतिक कानून था.हमारे कॉलेज क्या पूरे देश में यही माहौल है.इस अंधे क़ानून की छत्र-छाया में सभी छात्र-छात्राएँ अपनी ही जाति से प्रेमी-प्रेमिका का चुनाव करते थे ;लेकिन हम तीनों को जेबू ही अच्छी लगी थी.वैसे भी हमारे कॉलेज में लड़कियों का अकाल था.जेबू के हाथ से निकलने के बाद न तो मैंने किसी को पसंद किया और न किसी ने मुझे.अब हम लोग स्नातक में थे.जेबू को उसके घर वाले पढ़ाना नहीं चाहते थे.वह लगभग विद्रोह करके पढ़ रही थी.मैं और मंगलेश दोनों संस्कृत लेने लगे ,तो उसने भी ले ली थी.उस दिन रिज़वान को लग गया था कि उसने अपना नामांकन सही समय पर वापस लिया था. हम तीनों के बीच का उसका नाम ज़ेबू था. वैसे सार्वजनिक रूप से बातचीत के लिए हम लोगों ने उसका नाम मोनालिसा रख रखा था.प्रेम की कूट भाषा वाली  शब्दावली भी हम लोगों ने किसी भावी मुसीबत से बचने के लिए ही गढ़ी थी.घर वालों के कहने के बाद भी उसने उन्हें समझा दिया था कि संस्कृत में अंक अच्छे मिलते हैं.मेरे कहने पर उसने घर वालों को यह भी समझाने में सफलता पा ली थी  कि संस्कृत और उर्दू दोनों फ़ारसी से निकली हैं.संस्कृत के रूप भी फारसी के मीरम,मीरी ,मीरवी की तरह चलते हैं। इसके प्रमाण के रूप में उसने मौलवी जी के सामने अपने अब्बा को फ़ारसी के मीरम ,मीरी,मीरवी सहित सारेरूप सुनाते हुए साथ में संस्कृत की गम् धातु  की पाँचों लकारों के रूप  भी सुनाए थे.मौलवी जी बड़ी मस्जिद के थे। बड़े मस्जिद के होने के कारण मौलवी जी की दाढ़ी की ही तरह  ही  शान भी थी। वे सामने थे ,तो उन्होंने अपने अज्ञान को शेखी में बदलते हुए जेबू की बात पर मुहर लगा दी. इसके बाद विरोध तो दूर इसकी तहकीकात तक उन्होंने कभी नहीं की.इसका मतलब यह कतई नहीं था कि जेबू के अब्बू नादाँ थे.वे पढ़े-लिखे दानां इंसान थे.वे दिलदार और उदार इंसान थे और जेबू को बहुत चाहते भी थे.इसीलिए अपनी बेटी की संस्कृत शिक्षा उन्होंने नहीं रोकी.उनके दोस्तों ने विरोध किया तो उन्होंने सबसे पहले दारा शिकोह के द्वारा उपनिषदों के और फिर  संस्कृत ग्रंथों के अरबी में अनुवाद की मिसालें देकर उन्हें चुप करा दिया.जो भी विरोध करता वे मौलवी जी की सहमति की बात करके उसे शांत कर देते थे। मौलवी जी किसी को क्या कहते, वे तो पहले ही समर्पण कर चुके थे.

जेबू बहुत संस्कारी थी.उसने भी केवल और केवल मंगलेश का सपना पाल रखा था.शुरू-शुरू में मुझे जो भ्रम हुआ था वह भी केवल इसलिए था कि मंगलेश का मान रखने के लिए वह मुझसे विनम्र व्यवहार करती थी.मैं नम्रता और प्रेम को एक ही माने बैठा था.प्रेम नम्रता  नहीं समर्पण चाहता है.अपने प्रेय की प्राप्ति की सम्भावना पर चोट होते ही वह  नाग-नागिन का रूप ग्रहण कर लेता है.वह बड़ी सीधी थी पर मजाल है कि मंगलेश किसी  भी लड़की से ज़रूरत से ज़्यादा लभर-चभर कर ले.मंगलेश के लिए भी जेबू की वक्र भृकुटि ही काफ़ी थी.मैं और रिज़वान तो जानबूझकर कई लड़कियों से उसके सामने बातें करते थे कि वह चिढ़े पर वह चिढ़ती ही न थी.इससे हम दोनों अपनी औकात समझ चुके थे ;लेकिन एक ईर्ष्या –सी मंगलेश से होने लगी थी.शायद इसी कारण इन दिनों मेरे साथ-साथ सभी दोस्त उससे कहने लगे हैं ,’’सुन्दरता वह नागिन है जिसे सपेरा भी नहीं नाथ पाता है.”यह तो मज़ाक की बातें थीं वरना उसकी सुन्दरता के लिए नागिन कहना बहुत बड़ा अपमान था.वह तो हूर या अप्सरा भी नहीं परी थी.हिमालय की चोटी पर पसरी बर्फ-सी पूरे सफ़ेद झक्क लिबास में रहने वाली परी.हूर या अप्सरा तो वासना जगाती है ,पर परी निर्लोभ प्रेम.उसकी बाल-सुलभ चेष्टाओं वाले निर्धूम प्रेम की लौ पर मैं भी मर मिटा था.लेकिन वह सब अब सपना हो गया था जिसे देखा तो हम तीनों ने था पर नसीब एक ही को हुआ.नास्तिक और भाग्य में विश्वास न करने वाले मुझको जेबू के सामने पड़ते ही दोनों में विश्वास जाग उठता है.शुरू के दिनों में मंदिरों में भी जाके ईश्वर से जेबू को ही माँगा ;लेकिन उसने उसे मंगलेश की झोली में डाल दिया.ईश्वर से चिढ़कर और मंगलेश से छिप-छिपाकर अपने ही कमरे में रिजवान के साथ वज़ू वगैरह का महीनों अभ्यास किया.एक दिन गेड़ुआ से पानी लेते हुए देखकर मंगलेश ने जब मुझे टोका ,तो मैंने जेबू से प्रेम करने के बावजूद ऐसी  दक़ियानूसी हरकत पर धिक्कारा था। वह शर्मिंदा भी हुआ था। साल भर तक बिना नागा के हर जुम्मे बड़ी मस्जिद भी गया. इसी के लिए मैंने रिजवान के साथ अलग कमरा लिया और मंगलेश से बहाना  बनाया कि रिज़वान मुझसे पैसे नहीं लेता है। इसी वजह से उसके साथ रह रहा हूँ.रिजवान भी मुझे मस्जिद इसलिए ले जाता था कि आज नहीं तो कल ये मुसलमान बन जाएगा.उसे विश्वास था कि एक इंसान को प्यार के बल पर  मुसलमान बना लेने की वज़ह से उस पर अल्लाह की रहमत होगी.सब अलग-अलग एक ही सपना देख रहे थे.परी जेबू का सपना. जो सपना मंगलेश देख रहा था ,वही मैं देख रहा था और रिजवान भी तो वही देख रहा था.वह अपना पक्ष हम तीनों में सबसे प्रबल मानता था और हम सबको समर्पण के लिए कहता  था.उसके अनुसार उसे तीन कारणों से ज़ेबू के अब्बू उसे ही चुनेंगे.पहली बात तो वह मुसलमान है.दूसरी यह कि वह भी अंसारी है और जेबू भी और तीसरी यह कि मेरे अब्बू के हिस्से में दो-दो पेट्रोल पंप हैं.उसके इस तर्क के ज़वाब में मैं कहता यदि मैं धर्म बदल कर इस्लाम कबूल कर लूँ तो..?इसपर रिजवान मुस्कुरा के कहता ,”हाँ,तब कुछ उम्मीद की जा सकती है पर पलड़ा तब भी मेरा ही भारी रहेगा.”ये ख़याली पुलाव सबसे ज़्यादा पकाए तो हम और रिज़वान ने लेकिन उन्हें खाने की बारी आई तो झपट ले गया मंगलेश बिलौटा.मंगलेश और जेबू के प्यार को जानते हुए भी रिजवान ने ज़मानत ज़ब्त होने के बावजूद अपनी दावेदारी अब तक नहीं छोड़ी थी.

हम,रिजवान और मंगलेश में एक बात थी कि तीनों में परस्पर अटूट विश्वास था.दूर से देखने वालों को तो इस प्रेम में त्रिकोण दिखता था; लेकिन हम तीनों को पता था कि यहाँ तो बस एक सीधा-सरल ऋजु कोण है जिसके एक छोर पर जेबू है और दूसरे पर मंगलेश.यह सत्य जानते और स्वीकारते हुए भी रिजवान अपने धर्म की इकलौती डोर को इस प्रेम की डाल में फँसाकर कर रोज़ दो-चार पींगें मार ही लिया करता था.सब कुछ जानते हुए भी रिजवान ने कभी दगा नहीं की.वह चाहता तो अपने अब्बू के ज़रिए ज़ेबू के अब्बू के सामने यह राज़ फाश कर सकता था ;पर किया कभी नहीं.वह भी उसूलों वाला इंसान था.वह प्रेम को बल या छल से नहीं दिल से जीतकर पाना चाहता था ;इसलिए वह मंगलेश का प्रतिद्वंद्वी तो अब भी था ,पर शत्रु किसी भी नज़रिए से नहीं.

उन गुंडों के जाते ही भीड़ छँट गई.उसके छँटते ही रिजवान ने बाहर का माहौल भाँपा.कुछ घर से ऊबे मर्द,औरतें और बच्चे अब भी ओस से भीगे धान के पुआल की तरह सड़क पर बिछे थे.बाहर निकलते समय रिजवान ने मुझे समझाया था कि वह बाहर से ताला लगाकर जा रहा है और आस-पास ही रहेगा.वह पड़ोसी महिला से पूछ रहा था कि , ‘क्या हुआ आंटी.”वे भी उसी की तरह यही जानने बाहर आई थी.कमोवेश औरों की भी वही स्थिति थी.हो-हल्ला करने वाले तो चले गए थे.रिजवान की एक भी मिनट आवाज़ मेरे कानों में न पड़ती तो मुझे लगता कहीं वह उसे बताने तो नहीं चला गया.उस पर मुझे आशंका होने लगती.पहले पल्ले खोल दिए थे.अब ताला लगाके जाने का क्या औचित्य है?उस समय मुझे मेरे बाबा याद आने लगे.वे कट्टर हिंदू थे.वे कहते थे ,”कूकुर पानी पियइ सुरुक्का ,तबहूँ बिस्वास न किहेउ तुरुक का.”यह सोच ही रहा था कि रिजवान ने किवाड़ भड़ाक से खोल दिए.बाहर की भीड़ की नज़र और मुझे सुरक्षित होने के भ्रम में रखने के लिए वह तो ताला लगाने का नाटक करके गया था.उसके लौटते ही खतरे की आशंका के बावजूद मेरी साँस में साँस आई.जान साँसत में हो तो दोस्त क्या खुद की साँसों पर से भी विश्वास उठने लगता है.

घंटे भर में ही सड़क की बची भीड़ भी छँट गई थी.अबतक रात के दो बज चुके होंगे.रिजवान ने बाहर निकल कर फिर आहट ली तो बड़ी मस्ज़िद से भी कोई आवाज़ नहीं आ रही थी.बाहर निकलने के लिए यही समय हम दोनों को उचित लग  रहा था.पूरी सडक सुनसान थी.बस कुत्ते भौंक रहे थे.
हम दोनों कमरे से निकल लिये थे.मुहल्ले की तीन चार गलियों तक तो मौन  रहे.लेकिन मुख्य सड़क से बस अड्डे तक के रस्ते भर यही बात करते रहे कि  आज़ादी के सपने तो हमारे पूर्वजों ने भी देखे थे सच कहाँ हुए.आज़ादी के  बाद  हम देश को सँवारने का सपना ही देखते रहे हैं. पता नहीं वह कभी सच भी  होगा या नहीं.हम अपने मन का  जीवन साथी पाने का सपना देखते हैं.उसके साथ  रंगीन सपने बुनते हैं और जीवन को सफल बनाने का सपना देखते हैं.लेकिन सौ  में निन्न्यानबे के सपने चूर-चूर ही होते हैं.सरे आम मुण्डियाँ कटती  हैं.इस मामले में हिन्दू हों या मुसलमान एक-सी कट्टरता दिखाते हैं.अपने  कलेजे का टुकड़ा बता-बताकर गोदी में झुला-झुलाकर खिलाए जाने वाली संतानों  का कलेजा चाक करते इन्हें रंच भी दया नहीं आती है.बचे हुए एक के भी सौ  में से एकाध  सपने ही सच  हो पाते हैं.कुछ ही दिनों पहले एक हिन्दू लड़की  से प्रेम करने के कारण मेरठ में एक मुस्लिम युवक की हत्या हो गई थी.उसी  का बदला  लेने के लिए मंगलेश और मुझे खोजा जा रहा था.हम दोनों को दुःख था  कि मंगलेश का एक सपना जो बुरा था ,वह तो सच होकर पीपल के पेड़ –सा हरहरा  रहा था; लेकिन जिस सपने को  हरियर होना था उसकी तो मुंडी ही कट गई
थी.
भीड़ छँटते ही रिजवान भीतर आया था और मुझे भीतर से घसीटता हुआ  बाहर लाया था। लगभग देहरी पर से ही दौड़ने लगे थे। भय के कारण हमारी  साँसें बातें करने लगी थीं। दौड़ने क्या चलने तक की कूव्वत हम दोनों की  देह में न थी पर ‘सपना’ दौड़ाए जा रहा था. लग रहा था कि अगर टाइम पर न  पहुँचे तो फिर अगर कहीं सवेरे ही मंगलेश अपना सपना भूलकर ‘उलटे बाँस  बरेली’ को चल दिया तो एक और  मुंडी कटनी  तय है.वह भी सपने की नहीं सपना  देखने वाले की । छाती के भीतर गुब्बारा फूल रहा था.हम दोनों के दोनों  भौनिहा भैंसे जैसी भारी-भारी साँसे लेकर बिन माँगी मौत बुला रहे थे.

एक जगह जब थोड़ा ठिठके भी कि सही से साँस ले लें.इतने में पिछले  मोड़ जिससे हम मात्र तीन-चार मिनट पहले पार हुए थे,वहाँ अचानक कुत्ते  ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगे तो कुछ लोगों के पीछा करने की आशंका पर हम दोनों  फिर दौड़ने लगे थे.

-गुणशेखर
(डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा),
प्रोफ़ेसर (हिंदी),क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय ,
क्वाङ्ग्चौ,चीन ।

Prof. Ganga Prasad Sharma
Guangdong University of foreign studies ,
Guangzhau, China

“drgpsharma”<2845009097@qq.com