हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

सुर्ख गुलाब - डॉ.हरदीप संधु

स्कूल ऑफ़ स्पेशल एजुकेशन‘चिल्ड्रन विथ स्पेशल नीड्स’… भीतर जाते ही मेरी सोच रुक- सी गई थी …. मैं तो जैसे निष्पन्द मूर्त्ति बन गई थी और भीतर तक काँप गई थी।
आधी छुट्टी का समय था। बच्चे स्कूल में बने अलग -अलग हिस्सों में खेल रहे थे ;जो बड़ी -बड़ी ग्रिल लगा कर बनाए हुए थे। एक भाग में कुछ बच्चे व्हील चेयर पर बैठे इधर उधर देख रहे थे। दूसरे हिस्सों में कोई बच्चा ऊँचे से चीख रहा था , कोई दीवार की तरफ मुँह करके छलाँगें लगा रहा था, कोई बेहताशा दौड़ रहा था ,तो कोई ऐसे ही हाथ हिला -हिलाकर बिन शब्दों से अपने -आप से ही बातें कर रहा था। एक बच्चे मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी ओर खींचने लगा जैसे वह मुझे कुछ बताना चाह रहा हो।
मुझे विस्मित तथा भयभीत-सी देखकर स्कूल का एक कर्मचारी बताने लगा, ‘ये बच्चे बोल नहीं सकते। अपने भावों को चिलाकर या आपका हाथ थाम कर प्रकट करते हैं। कुछ बच्चे मुँह द्वारा खा भी नहीं सकते। उनके पेट में लगी ट्यूब में सीधे ही भोजन डाला जाता है। बहुत से बच्चों को टट्टी -पेशाब का भी पता नहीं चलता। इस स्कूल में इन दिमागी तथा शारीरिक तौर से विकलांग बच्चों को खुद को सँभालने की ही ट्रेनिंग दी जाती है’-
सुनकर मेरी आँखे नम हो गईं। मैं सोचने लगी कि जब किसी के घर में किसी बच्चे का जन्म होने वाला होता है ,तो हर दादी को पोते का इंतजार रहता है। उसने शायद ही कभी ये दुआ की हो कि हे प्रभु आने वाला बच्चा तंदरुस्त हो। मेरी सोच विकलांग बच्चों तथा इनके माता-पिता पर आ कर अटक गई –
चढ़ती लाली
पत्ती –पत्ती बिखरा
सुर्ख गुलाब।