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सोन नदी - डॅा.अर्पिता अग्रवाल

डॉ. अर्पिता अग्रवाल
डॉ. अर्पिता अग्रवाल

प्रसिद्ध सोन नदी का उद्गम विंध्य और सतपुड़ा श्रेणियों के मध्य मैकल पर्वत श्रेणी में स्थित अमर कंटक नामक पठारी भाग में है। अमरकंटक क्षेत्र बहुत  पवित्र माना जाता है और वहाँ कई प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान हैं, इसलिए इसे तीर्थ राज भी कहते हैं। सोन नदी 600 मीटर (1,969 फ़ीट ) की ऊँचाई से निकली है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में कई स्थानों पर सोन ( शोण ) का उल्लेख शोणभद्र के नाम से किया गया है। शोण का उल्लेख पुरूषवाचक संज्ञा  महानद  के रूप में किया गया है। हिन्दू धर्मानुसार ये महानद अत्यन्त पवित्र माने जाते हैं और इनके तटों पर पूजा -अर्चना करने का बहुत महत्त्व होता है।

पुराणों में यह कथा आई है कि शोण और नर्मदा का उद्गम ब्रह्मा के आँसू की बूँदों से हुआ है, जो अमरकंटक पठार की दो ढालों पर गिर पड़ी थीं। ये दोनों नदियाँ एक दूसरे के विपरीत दिशा में बहने वालीं तेज़ जल धाराएं हैं। शोणभद्र एक विशाल और गम्भीर महानद का रूप धारण करके उत्तर- पूर्व की दिशा में प्रवाहित होकर मध्य बिहार में गंगा के साथ मिल जाता है। वाल्मीकि रामायण में शोण के भव्य सौंदर्य का वर्णन किया गया है। शोण का उल्लेख महाकवि कालिदास के सुप्रसिद्ध महाकाव्य रधुवशं  में आया है। ऐसा उल्लेख है कि जब राजकुमार अज ने इंदुमति की रक्षा करने के लिए राजमंत्री को कहा तब उसकी विशाल वाहिनी शत्रु सैन्य को रोकने के लिए इस प्रकार आगे बढ़ी मानो शोणभद्र की विशाल जलराशि और उत्ताल तरंगें गंगा का प्रवाह रोकने को बढ़ी हों। कालिदास ने गंगा तथा शोण के संगम पर स्थित पाटलिपुत्र ( पुष्पपुर ) वर्तमान पटना ( बिहार की राजधानी ) का वर्णन किया है। सोन का नाम  हिरण्यवाह   है जो कि इसमें प्राप्त होने वाले स्वर्ण कणों तथा इसकी सुनहरी रेत के कारण पड़ा है। संस्कृत भाषा में  हिरण्य  स्वर्ण को कहा जाता है। हिरण्यवाह का अर्थ स्वर्ण प्रवाहित करने वाली नदी है। सोन की चमकती बालुकाराशि में स्वर्ण कणों की उपस्थिति की सम्भावना रहती है। विंध्याचल की प्राचीन चट्टानों को काटकर बहता हुआ सोन कई प्रकार के खनिजों को अपने साथ बहाकर लाता है इसीलिए इसकी घाटी में चूना पत्थर ,बाक्साइट आदि खनिजों के भंडार मिलें हैं जिनका कई उद्योगों में इस्तेमाल होता है।

सोन उत्तर भारत की बड़ी नदियों में से एक है और गंगा की मुख्य सहायक नदी है। सोन नदी की लम्बाई 784 किलोमीटर है। यह छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और बिहार से होकर बहती है। आरम्भ में सोन नदी की दिशा उत्तर की ओर होती है फिर इसकी प्रवाह दिशा उत्तर- पूर्व होते हुए पूर्व की ओर हो जाती है। पटना के एक भाग दानापुर के निकट ये गंगा से मिल जाती है। गंगा और सोन का संगम स्थल बदलता रहता है। किसी समय  सोन का प्रवाह पथ  प्राचीन मगध की राजधानी गिरिब्रज के निकट से गुजरता था जिसका उल्लेख रामायण के बालकांड में है। तब इसका नाम सुमागधी या मागधी था । इसे भगवान श्री राम और महर्षि विश्वामित्र ने पार किया था। शोणभद्र का उल्लेख बालुकामय तटों के मध्य में बहती स्वच्छ जलधारा वाली नदी के रूप में किया गया है। छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश से होकर बहती सोन नदी विशाल नद के रूप में बिहार में प्रवेश करती है।

ग्रीष्म काल में सोन नदी अक्सर शुष्क प्राय: रहती है। रेतीले मैदानों के बीच में पतली -सी जलधारा शेष रहती है। ऐसी स्थिति में इसे आसानी से पैदल पार किया जा सकता है, किन्तु वर्षा के मौसम में सोन नदी में बाढ़ आया करती है। इस समय यह महानद विशाल आकृति धारण कर लेता है। बाढ़ के पानी के साथ सोन  भारी मात्रा में कीचड़ बहा कर लाता है और उसे खेतों में फैला देता है। इससे खेतों की मिट्टी उपजाऊ हो जाती है और फसलें भरपूर होती हैं। सोन  अपने उद्गम से बहता हुआ क्रमश: बघेलखण्ड ( मध्य प्रदेश ) , मिर्जापुर और भोजपुर ( बिहार ) से बहता है। यह मध्य प्रदेश में 509 किलोमीटर बहने के बाद उत्तर प्रदेश में 96 किलोमीटर बहता हुआ विशाल नद के रूप में बिहार पहुँचता है और बाँकीपुर शहर के पास गंगा में मिल जाता है।

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सोननदी पर बाण सागर बाँध बनाया गया है। यह बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना है। सिंचाई के लिए नहरें निकाली गई हैं और पनबिजली बनायी जाती है। इससे मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश व बिहार तीनों राज्यों को फायदा हुआ है। बाण सागर नाम  बाणभट्ट  के नाम पर है ,जो सातवीं शताब्दी के संस्कृत के बहुत प्रसिद्ध विद्वान् हुए थे। उन्हें भारत देश के इसी क्षेत्र का माना जाता है। सोन नदी के रास्ता बदलने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए देहरी में इंद्रापुरी बराज बनाया गया है। इंद्रापुरी बराज को सोन बराज भी कहते हैं। बराज कम ऊँचाई का बाँध होता है ,जो नदियों के जल को अलग दिशाओं में प्रवाहित करने के लिए बनाया जाता है,जबकि बाँध बहुउद्देशीय परियोजना होती है, इससे पनबिजली का उत्पादन होने के साथ- साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है।देहरी बिहार का मुख्य शहर है जो रोहतास जिले में स्थित है। यह नाम डेरा शब्द से उत्पन्न हुआ है। एक समय ब्रिटिश फ़ौजें कलकत्ता से दिल्ली आते समय सोन नदी पार करके यहीं पास में ही पड़ाव डालती थीं। बंगाली उपन्यासकार शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय ने यहीं रहकर गृहदाह नामक प्रसिद्ध उपन्यास लिखा है।

सोन नदी की मुख्य सहायक नदियों में प्रथम है  जोहिला जो अमरकंटक से निकल कर छत्तीसगढ़ में सोन से मिल जाती है। बनास  नदी  मध्यप्रदेश में सोन से मिलती है और गोपत  नदी उत्तरप्रदेश में सोन से मिलती है। उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले में प्रवेश कर सोन 8 से 9 किलोमीटर चौड़ी घाटी का निर्माण करती है। यहाँ इससे दो प्रमुख सहायिकाएँ रिहन्द और कान्हार मिलती हैं। रिहन्द नदी पर बने विशाल बाँध ने सिंचाई के लिए जल तथा उद्योगों के लिए जलविद्युत दी जिससे पूर्वी उत्तरप्रदेश एवं पश्चिमी बिहार लाभान्वित हुआ है। रिहन्द नदी पुराणों में रेणुका नाम से प्रसिद्ध है। रिहन्द हजारी बाग पर्वत शृंखला की मनिपात पहाड़ी से निकल कर छत्तीसगढ़ होते हुए उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले में पहुँचती है, यहाँ सोन से इसका संगम होता है लेकिन संगम से पहले रिहन्द नदी पिपरी के पास गहरी पथरीली घाटी से होकर बहती है। ग्रेनाइट चट्टानों से युक्त इस इलाके में पिपरी के पास ही बाँध निर्मित किया गया है। रिहन्द बाँध से बने विशाल जलाशय का नाम राष्ट्रीय नेता पंडित पंत जी के नाम पर गोविन्द वल्लभ पंत सागर रखा गया है। इस बाँध के कारण रिहन्द और उससे फिर सोन नदी के द्रोणी क्षेत्र में आकस्मिक बाढ़ आने की संभावना प्रायः समाप्त हो गई है तथा गर्मी के मौसम में इन नदियों में जल प्रवाह बना रहता है। यह बाँध और जलाशय पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है।

भारत की अन्य नदियों की तरह सोन नदी भी प्रदूषण से कराह रही है। सभी नदियाँ बहुमूल्य हैं। नदियों ने आदिकाल से ही अपने तटवर्ती इलाकों की फसलों को सींचा, गंदगी को धोया, और लोगों की प्यास बुझाई है, लेकिन हमनें नदियों में कूड़ा करकट उद्योगों से निकले रसायन और दूषित जल को बहाया। खेतों से बहकर आए फसलों के रोगनाशक और कीटनाशकों के हानिकारक अवशेषों ने तथा शहरी सीवेज ने नदी के जल को विषाक्त कर दिया। रही सही कसर ग्लोबल वार्मिंग ने पूरी कर दी। पीने के पानी का मुख्य स्रोत नदियों का जल पीने के योग्य नहीं रहा और भूजल स्तर तालाबों व जोहड़ों के खत्म होने से गर्त में चला गया। यहाँ तक कि हैंडपंपों से निकला पानी भी ज़हरीले रसायनों से युक्त हो गया। यदि अब भी हम नहीं सुधरे तो पानी की कमी के चलते नित्य संघर्षों को देखने का आदि होना पड़ेगा। उस समय सुसज्जित, वातानुकूलित गाड़ियों से निकलकर ऑफ़िसों का ज़रूरी काम छोड़ कर एक बाल्टी पानी के लिए हमें भी दूर- दूर भटकना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति आज अक्सर भारत के अनेक भागों में अखबारों में पढ़ने को मिलती है। अब ज़रूरी है पानी को व्यर्थ बहाने की मानसिकता को बदलना क्योंकि भूगर्भ विशेषज्ञों के अनुसार भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन के कारण ज़मीन के भीतर एक निर्वात पैदा हो रहा है। जितना पानी हम धरती से खींच रहे हें उस मात्रा में भूजल रिचार्ज नहीं हो रहा है। इस निर्वात से इलाके में भूकंप का खतरा पैदा  हो जाता है। आज नदियाँ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं हैं। यही सब चलता रहा तो विशेषज्ञों के अनुसार तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा।

डॅा.अर्पिता अग्रवाल

काकली मेंशन,120- बी/2,साकेत,मेरठ– 250003(.प्र.)