हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

स्वयं शक्ति ,तेजस्विनी - डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

दुर्गा , काली मात को , पूजे सकल समाज ।

फिर क्यों सबला को मिले, मर्दानी का ताज ।।1

नारी बन नारायणी ,उठ कर सोच विचार ।

स्वयं शक्ति ,तेजस्विनी,रच उज्ज्वल संसार ।।2

कभी सुखद -सी चंद्रिका ,कभी सुनहरी धूप ,

कुदरत ने तुझको रचा , देकर रूप –अनूप ।।3

कोमलता , शालीनता ,गहने हैं ,ले मान ।

लेकिन कर प्रतिकार अब , मत सहना अपमान ।।4

कठपुतली बन कर रहूँ ,कब तक तेरे साथ ,

डोरी रख ले थाम कुछ, दे मेरे भी हाथ ।।5

पग-पग पर मिलते यहाँ ,दुःशासन उद्दण्ड,

बैठे हैं धृतराष्ट्र क्या , लिये हाथ में दण्ड ।।6

जीवन की संजीवनी , आप करे संघर्ष ।

देख दशा, तेरी दिशा , शोक करें या हर्ष ।।7

पिंजरे की मैना चकित,क्या भरती परवाज़ ।

कदम-कदम पर गिद्ध हैं ,आँख गड़ाए बाज़ ।।8

पावनता पाई नहीं ,जन -मन का विश्वास ।

सीता को भी  राम  से , भेंट मिला वनवास ।।9

फूल कली से कह गए ,रखना इतना मान ।

बिन देखे होती रहे ,खुशबू से पहचान ।।10

शीश चुनरिया सीख की ,मन में मधुरिम गीत ।

बाबुल तेरी लाडली ,कभी न भूले रीत ।। 11

बिटिया को समझाइए ,सही-गलत पहचान ।

मानव के भी वेश में ,मिलते हैं शैतान ।। 12

छुपकर तितली ने पढ़े ,सभी सुमन के पत्र।

सोच–समझ उड़ना सखी , वन,उपवन ,सर्वत्र।। 13

देख-देखकर हो गए , डर,शंका निर्मूल ।

रंग-बिरंगी तितलियाँ ,उड़ें फूल से फूल ।। 14

मिली राह में ज़िंदगी ,बड़े दिनों के बाद ।

कुछ मुट्ठी में बंद- सी , कुछ लगती आज़ाद ।। 15

दिवस अठारह तक चला ,द्वापर में संग्राम ।

कलियुग में क्यों कर भला,लेता नहीं विराम ।। 16

बैठीं नैना मूँद कर ,गांधारी किस चाह ।

सच्ची जीवन संगिनी ,सही सुझाए राह ।। 17

पोर-पोर पीड़ा बसी ,अभी रहे चुपचाप।

क्षमा कभी खुद को भला, कर पाएँगें आप ।। 18

राजनीति चौसर बिछा ,खेल रही है द्यूत ।

शकुनि दे रहे मंत्रणा ,प्रज्ञा हुई अछूत ।। 19

कैसे हम उनको कहें ,स्वयं धर्म का रूप ।

रखें प्रिया को दाँव क्या ,मर्यादा अनुरूप ।। 20

कान्हा तब तुमने रखी ,द्रुपद सुता की लाज ।

घर-घर हों वीरांगना , दुर्गा, लक्ष्मी आज ।। 21

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