हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

हद से बेहद तक - डॉ.जेन्नी शबनम

 

डॉ.जेन्नी शबनम
डॉ.जेन्नी शबनम

अक्सर सोचती हूँ कि औरतों के पास इतना हौसला क्यों होता है ? कहाँ से आती है इतनी ताकत कि हार-हार कर भी उठ जाती है; फिर से दुनिया का सामना करने के लिए । अजीब विडम्बना है स्त्री-जीवन ! न जीवन जीते बनता है ,न जीवन से भागते ! औरत जानती है कि उसकी जीत उसके अपने भी बर्दाश्त नहीं कर सकते और उसे अपने अधीन करने के सभी निरर्थक और क्रूर उपाय करते हैं; शायद इस कारण ही औरतें जान-बूझकर हारती हैं । एक नहीं कई उदाहरण है, जब किसी सक्षम स्त्री ने अक्षम पुरुष के साथ रहना स्वीकार किया, महज़ इसलिए कि उसके पास कोई विकल्प नहीं था । पुरुष के बिना किसी स्त्री को हमारा समाज स्वीकार नहीं करता । किसी कारण विवाह न हो पाए तो लड़की में हज़ारों कमियाँ बता दी जाती हैं, जिनके कारण किसी पुरुष ने उसे नहीं अपनाया । दहेज और सुन्दरता विवाह के रास्ते की रुकावट भले ही हो लेकिन खामी सदैव लड़की में ढूँढ़ी जाती है । पति की मृत्यु हो जाए तो स्त्री के पिछले जन्म के कर्मों की सज़ा! तलाकशुदा या परित्यक्ता हो तो मान लिया जाता है कि दोष स्त्री का रहा होगा ।

भ्रूण ह्त्या, बलात्कार, एसिड हमला, जबरन विवाह, दहेज़ के लिए अत्याचार, आत्महत्या के लिए विवश करना, कार्य स्थल पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, घर के भीतर शारीरिक और मानसिक शोषण, सामाजिक विसंगतियाँ आदि स्त्री-जीवन का सच है । स्त्री जाए तो कहाँ जाए इन सबसे बच कर या भाग कर । न जन्म लेने का पूर्ण अधिकार, न जीवन जीने में सहूलियत और न इच्छा मृत्यु के लिए प्रावधान ! क्या करे स्त्री ? जन्म, जीवन और मृत्यु स्त्री के अधिकार क्षेत्र से बाहर !

चाहे शिक्षित समाज हो या अशिक्षित, निम्न आर्थिक वर्ग हो या उच्च; स्त्रियों की स्थिति अमूमन एक जैसी है । अशिक्षित निम्न समाज में फिर भी स्त्री जन्म से उपयोगी मानी जाती है, अतः भ्रूण-ह्त्या की सम्भावना कम है । 3-4 साल की बच्ची अपने छोटे भाई -बहनों के देख- रेख में माँ की मदद करती है तथा घर के छोटे-मोटे काम करना शुरू कर देती है ।अतः उसके जन्म पर ज्यादा आपत्ति नहीं है । मध्यम आर्थिक वर्ग के घरों में स्त्रियों की स्थिति सबसे ज्यादा नाज़ुक है । वंश परम्परा हो या फिर दहेज़ के लिए रकम की कमी; दोष स्त्री का और सज़ा भी स्त्री को । कई बार यूँ लगता है जैसे पति के घर में औरत की स्थिति बँधुआ मज़दूर की है; तमाम जिम्मेवारियों को निभाते हुए भी वह फ़िज़ूल समझी जाती है, अप्रत्यक्ष आर्थिक उपार्जन करते हुए भी बेकार समझी जाती है, न वह अपने अधिकार की माँग कर सकती है न उसके पास पलायन का कोई विकल्प है । सुहागन स्वर्ग जाना और जिस घर में डोली आई थी, अर्थी भी वहीं से उठनी है; जन्म से इसी सोच से जीवन यापन और यही अन्तिम लक्ष्य ! उच्च आर्थिक वर्ग में स्त्रियों की स्थिति ऐसी है जिसका सहज आकलन करना बेहद कठिन होता है । सामाजिक मानदंडों के कारण जब तक असह्य न हो गम्भीर परिस्थितियों में भी स्त्रियाँ मुस्कुराती हुई मिलेंगी और अपनी तकलीफ छुपाने के लिए हर मुमकिन प्रयास करेंगी । समाज में सम्मान बनाए रखना सबसे बड़ा सवाल होता है । अतः अपने अधिकार के लिए सचेत होते हुए भी अक्सर ख़ामोशी ओढ़कर रहती हैं । अत्यन्त गम्भीर पारिस्थिति हो तो स्वयं को इससे निकाल भी लेती है । दहेज़, अत्याचार और भ्रूण ह्त्या की समस्या नहीं होती ; लेकिन अन्य समस्याएँ सभी स्त्रियों के समान ही होती है । इन घरों में स्त्रियों को आर्थिक व शारीरिक नहीं; बल्कि मानसिक तकलीफ ज्यादा होती है । अगर स्त्री स्वावलम्बी हो तो सबसे बड़ा मुद्दा अहंकार और भरोसा होता है । स्त्री को अपने बराबर देख कर पुरुष के अहम् को चोट लगती है ,जिससे आपसी सम्बन्ध में ईर्ष्या-द्वेष समा जाता है और एक दूसरे को संदेह से देखने लगते हैं । इस रंजिश से भरोसा टूटता है और रिश्ता महज़ औपचारिक बन कर रह जाता है । फलतः मानसिक तनाव और अलगाव की स्थिति आती है । कई बार इसका अंत आत्महत्या पर भी होता है ।

स्त्रियाँ अपनी परिस्थितियों के लिए सदैव दूसरों को दोष देती है; और यह सच भी है, परन्तु इससे समस्या से निजात नहीं मिलती । कई बार स्त्री खुद अपनी परिस्थिति के लिए जिम्मेवार होती है । स्त्रियों की कमजोरी उनके घर और बच्चे होते हैं और बस यही उनके जीने की वज़ह और त्रासदी का कारण बन जाता है । स्त्री की गुलामी का बहुत बड़ा कारण स्त्री की अपनी कमज़ोरी है । पुरुष को पता होता है कि कहाँ-कहाँ कोई स्त्री कमजोर पड़ सकती है और कैसे-कैसे उसे कमज़ोर किया जा सकता है । सम्पत्ति, चरित्र, गहना-ज़ेवर आदि ऐसे औज़ार हैं जिसका समय-समय पर प्रयोग पुरुष अपने हित के लिए करता है । पुरुष के इस शातिरपन से स्त्रियाँ अनभिज्ञ नहीं ;परन्तु अनभिज्ञ होने का स्वाँग करती है ;ताकि उसका जीवन सुचारू रूप से चले व घर बचा रहे । एक उद्घोषणा है कि पुरुष के पीछे-पीछे चलना स्त्री का स्त्रैण गुण और दायित्व है ,जबकि पुरुष का अपने दंभ के साथ जीना पुरुषोचित गुण और अधिकार । स्त्रियों को सदैव संदेह के घेरे में खड़ा रखा जाता है और चरित्र पर बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं; ताकि स्त्री का मनोबल गिरा रहे और पुरुष इसका लाभ लेते हुए अपनी मनमानी कर सके । स्त्री अपने को साबित करते-करते आत्मग्लानि की शिकार हो जाती है । हमारे अपने हमसे खो न जाएँ ,औरतें इससे डरती हैं ;जबकि पुरुष यह सोचते हैं कि स्त्रियाँ उनसे डरती है । स्त्री का यह डर पुरुष का हथियार है, जिससे वह जब – तब वार करता रहता है ।

निःसंदेह स्त्रियाँ शिक्षित हों ,तो आत्मविश्वास स्वतः आ जाता है और हर परिस्थिति का सामना करने का हौसला भी । वह स्वावलम्बी होकर जीवन को प्रवाहमय बना सकती है । जीवन के प्रति उसकी सोच आशावादी होती है, जो उसे हर परिस्थिति में संयमित बनाता है । वह विवेकशील होकर निर्णय कर सकती है । विस्फोटक स्थिति का सामना सहजता से कर अपने लिए अलग राह भी चुन सकती है । वह अपने अधिकार और कर्तव्यों के बारे में जागरूक होती है । वह अकेली माँ की भूमिका भी बखूबी निभाती है । समाज का कटाक्ष दुःख भले पहुँचाता है ,तोड़ता नहीं है, अतः वह सारे विकल्पों पर विचार कर स्वयं के लिए सही चुनाव कर सकती है ।

पुरुष से स्त्रियों का कोई द्वेष नहीं होता । वे महज़ अपना अधिकार चाहती हैं, सदियों से खुद पर किए गए अत्याचार का बदला नहीं । स्त्री के अस्तित्व के लिए पुरुष जितना ज़रूरी है, पुरुष के अस्तित्व के लिए उतनी ही ज़रूरी स्त्री है।दोनों एक दूसरे के पूरक हैं;यह बात अगर समझ ली जाए और मान ली जाए तो, इस संसार से सुन्दर और कोई स्थान नहीं ।

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