हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों की उपेक्षित कथाकार: सुभद्राकुमारी चौहान - डॉ.सतीशराज पुष्करणा

आज कहानी का जो स्वरूप प्रचलित है, उसकी पृष्ठभूमि में एक स्वस्थ एवं गर्व करने योग्य परम्परा है। अब तक कहानी में अनेक पड़ाव आए, जिनका प्रभाव वर्तमान कहानी में स्पष्ट है। वर्तमान कहानी वैदिक युग से आरंभ होकर औपनिषदिक तथा पौराणिक कथा साहित्य से प्रेरणा एवं प्रभाव ग्रहण करके परवर्ती काल के अनेक लेखकों ने कथात्मक रचनाएँ प्रस्तुत कीं । खड़ी बोली गद्य के आरंभिक रचनाकारों में ‘रानी केतकी की कहानी’ के लेखक मुंशी इंशाअल्ला खाँ का नाम उल्लेखनीय है। इसके पश्चात् मुंशी सदासुख लाल, श्री लल्लू लाल, पं सदल मिश्र, राजा शिवप्रसाद ‘सितारे–हिन्द’, ‘पं गौरी दत्त इत्यादि ने आरंभिक युग में महत्त्वपूर्ण कार्य किया । फिर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, किशोरीलाल गोस्वामी, रामचन्द्र शुक्ल, केशव प्रसाद सिंह, कार्तिक प्रसाद खत्री, गिरिजादत्त वाजपेयी, यशोदानन्द अखौरी, सूर्यनारायण दीक्षित, पार्वतीनन्दन, बंग महिला, गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, कुन्दनलाल शाह, उदयनारायण वाजपेयी, लक्ष्मीधर वाजपेयी, शिवनारायण शुक्ल इत्यादि कहानीकारों ने कहानी के क्षेत्र में अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया ।
इस विधा को वस्तुत: प्रतिष्ठा प्राप्त हुई प्रेमचन्द युग से । इस युग के प्रमुख कथाकारों में प्रेमचन्द के अतिरिक्त चनर शर्मा ‘गुलेरी’, विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, जयशंकर ‘प्रसाद’, सूर्यकानत त्रिापाठी ‘निराला’, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, जैनेन्द्र कुमार इत्यादि का नाम सगर्व लिया जा सकता है। इसके पश्चात् जो कहानीकार हिन्दी–जगत् में आए, उनमें भगवती प्रसाद वाजपेयी, सुदर्शन, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, उषा देवी मित्रा, भगवतीचरण वर्मा, इलाचन्द जोशी के साथ जिस कथा लेखिका का नाम लिया जा सकता है, उसका नाम सुभद्राकुमारी चौहान है । सुभद्राकुमारी चौहान का नाम कहानीकारों में उस रूप में चर्चित नहीं हो सका, जिस रूप में वस्तुत: होना चाहिए था । इसका कारण उनका कवयित्री रूप में ही चर्चित हो जाना था। ‘झाँसी की रानी’ कविता इतनी लोकप्रिय हुई कि उनकी ढेरों कहानियाँ तत्कालीन प्राय: सभी प्रमुख पत्र–पत्रिकाओं में ससम्मान स्थान तो पाती रहीं, किन्तु आलोचकों ने उनकी कहानियों की ओर कतई ध्यान नहीं दिया । 1983 ई. में उनकी सभी प्रकाशित–अप्रकाशित कहानियाँ ‘सीधे–सादे चित्र’ नामक पुस्तक में पुनप्रर्काशित हुई । यों तो उनकी प्राय: प्रत्येक कहानी चर्चा की अपेक्षा रखती हैं, किन्तु ‘दुराचारी’, ‘मंगला’, ‘जम्बक की डिबिया’, ‘तीन बच्चे’, ‘बड़े घर की बात’ और ‘कान के बूँदे’, विशेष रूप से यहाँ उल्लेखनीय हैं । इन कहानियों की विषय–वस्तु आज भी प्रासंगिक है। ट्रीटमेंट में आज की कहानी निस्संदेह आगे निकल गई है किन्तु सुभद्राकुमारी चौहान की इन कहानियों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती । आज की कहानी इन कहानियों से होते हुए ही वर्तमान स्थिति में पहुँची है।
‘दुराचारी’ में पंडित रामसेवक नाम का पंडित है, जिसका कर्म ठीक अपने नाम के विपरीत है। दयाशंकर कथानायक है, जो एयाश तो है, किन्तु उसके हृदय में करुणा कूट–कूट कर भरी हुई है। पंडित रामसेवक प्रतिनायक है, जो अपने धर्मात्मा होने का दिखावा करता है। वह दयाशंकर के घर से वेश्या के गाने का मधुर स्वर सुनकर अपनी माला जपना तक भूल जाता है और वेश्या के गाने का आनन्द लेने लगता है। वह इतना तन्मय होकर सुन रहा होता है, कि उसे अपने पड़ोसियों के आने–जाने का एहसास तक नहीं हो पाता । उसके पड़ोसी किशन द्वारा जब उसके कंधे पर हाथ रखा जाता है तब उसकी तन्द्रा टूटती है। वह पूछता है, ‘पूजा हो गई पंडित जी?’ इस संवाद में एक तीखा व्यंग्य उभरता है जो स्वयं प्रतिनायक भी महसूस कर लेता है और खिसियाकर कहता है–‘कहाँ की पूजा, कहाँ का पाठ भाई। जब से यह पड़ोसी (दयाशंकर) आया है, तब से सुबह गाना, शाम को गाना, दुपहर को गाना–गाना छोड़कर जैसे उसके पास कुछ और काम ही नहीं है।’
मुहल्ले के जीवन, डॉक्टर, कामता प्रसाद और किशन में डॉक्टर को छोड़कर अन्य दोनों पात्र दयाशंकर के पक्ष में खड़े होते हैं। डॉक्टर पंडितजी की चापलूसी करता है। ये सभी बहस–मुबाहसे में उलझे हुए होते हैं, उसी समय पंडित जी की किरायेदार फटे चीथड़ों में लिपटी हुई, अत्यंत दुर्बल, किसी प्रकार से अपने तन को ढँके बच्चे को कंधे से लगाए वहाँ आ जाती है। बच्चे को वहीं सुलाकर, वह दोनों हाथ जोड़कर, धरती पर माथा टेककर कहती है, ‘पंडित जी गौड़ लई परी । ताला खेलवाय देई। बेटउना दक्कियान ह। हियां परदेश माहम कहाँ जाई। काल्ह परौ तक कोठरिया के केराबा जरूर दै देव आज कतहूँ नहीं पायेना।’
पंडितजी उसे झिड़कते हुए बोले, ‘जब तक किराया नहीं लाएगी, ताला नहीं खुलेगा । आज–कल करते–करते पन्द्रह दिन तो हो गए, जा निकल, नहीं तो ठोकर मारकर निकलवा दूँगा ।’ किरायेदार पुन: गिड़गिड़ाती है– ‘बेटउना जड़ाय के मरजाई मालिक अब ओढ़ै बिकावै के बितरै बन्द होइगा है, दयाकारी मालिक, जौनौ आपैके जिज्ञाएँ जियत लागहम।’ पंडित जी ने उसे एक जोर की झिड़की छी, बोले–‘जा, अभी निकल जा। तेरा और तेरे बच्चे का मैंने ठेका नहीं लिया है, मरर चाहे जिए। जब तक किराया नहीं लाती, कम्पाउंड के भीतर पैर मत रखना ।’
किरायेदार अपने बच्चे को उठाकर बाहर चली जाती है। जीवन से गरीबनी के प्रति इतनी कठोरता सही नहीं जाती, अत: वह भी उसके पीछे–पीछे चला जाता है। उसके जाने के बाद पंडित डॉक्टर से कहता है – ‘बदमाश है साली । जब तक इनके साथ ऐसे पेश न आओ, किराया देती ही नहीं । यह नहीं कि इनके पास है नहीं, पर देने की नीयत नहीं है। रोज़ चाय पीती है। दूध शक्कर के लिए पैसे आ जाते हैं । पर किराये के लिए सदा यही रोना रहता है।’
किशन कुछ बोलता नहीं, किन्तु शायद उसके भीतर कुछ दु:ख–सा रहा होता है। इनमें में पंडित के पास एक दीनू पंडित नामक व्यक्ति दस रुपये उधार माँगने आता है। पंडित जी गिरवी रखने को जेवर माँगते हैं। जेवर नहीं होने पर उसे डपट कर भगा देते हैं। कुछ दिनों बाद जीवन और किशन पंडितजी को मिल जाते हैं। पंडित जी कहते हैं –‘रामायण–भागवत रोज़ शाम को हुआ करती है, धर्म की वार्ता से इतनी दूर क्यों रहते हैं? असर पड़ने लगा पड़ोसी का ?’ जीवन उत्तर देता है, ‘पंडित जी रामायण–भागवत और पूजा–पाठ करता नहीं, पर आदमी को आदमी समझता हूँ । भगवान मंदिरों में नहीं, हम आप और ग़रीबों में ही हैं। पर किराया के लिए उस दिन जैसा जो कुछ आपने उस ग़रीब स्त्राी के साथ किया, वह उचित न था ।’
पंडितजी हँसते हुए बोले, ‘जीवन, यहीं तुम भूल करते हो। अगर मैं कहूँ कि उस घटना के घंटे भर बाद ही उस स्त्री ने किराये के रुपए लाकर दे दिए तब तो तुम विश्वास करोगे न कि वह झूठ बोलती थी और उसके साथ वही बर्ताव होना चाहिए था, जो मैंने किया था।’ इस पर जीवन कहता है – ‘पंडितजी, इन दोनों आफत के मारे गरीबों को उसी ‘दुराचारी’ दयाशंकर से ही मैंने रुपये दिलवाए थे, और तब कहीं वे कष्ट से छुटकारा पा सके। एक दुराचारी ने उन्हें उबार लिया । मेरी राय में तो आप सरीखे सदाचारियों से यह ‘दुराचारी’ कहीं अच्छा। ’
कहानी यहीं अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है। यह कहानी ढोंगियों पर महीन व्यंग्य करती है, जिसमें आदमी को आदमी समझने का संदेश सम्प्रेषित किया गया है। यह कहानी अपने समय में तो श्रेष्ठ कहानी रही ही होगी, किन्तु यह आज भी सटीक एवं प्रासंगिक है। इसका प्रतिपादन इसके कथानक के अनुसार इतना सटीक है कि यह न तो कहीं ढीली पड़ती है और न ही कहीं भटकती है। कहानी उद्देश्य तक पहुँचकर ही एक मारक व्यंग्य के साथ समाप्त होती है। इसमें जीवन एवं किशन पात्र अपनी छोटी–छोटी भूमिकाओं में भी अहं बनकर उभरते हैं। इसका शीर्षक ‘दुराचारी’ अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है।
‘जम्बक की डिबिया’ एक हृदयस्पर्शी कहानी है। यह कहानी लैशबैक में विकास पाती है। इसका नायक पश्चाताप करते हुए इसे नैरेट करता है। इस कथा का नायक प्रोपफेसर है। कहानी उसके नौकर केठानी पर केन्द्रित है। नायक अपनी बहिन की त्वचा में उत्पन्न हो गए दानों पर मरहम की तरह लगाने वाली आँयटमेंट जम्बक लाता है, जो एक डिबिया में है। वह डिबिया किसी से कहीं रखा जाती है। ढूँढ़ने पर मिलती नहीं । परिवार का अलग–अलग सदस्य, अलग–अलग व्यक्ति पर शक व्यक्त करता है। प्रोपफेसर का शक अपने नौकर पर है। उसे घर से निकाल दिया जाता है। वह भवन–निर्माण मजदूर के रूप में इट ढोने का काम करने लगता है। वह वृद्ध है, अत: एक दिन ऊपर से गिरकर मर जाता है।
नायक कहता है, ‘मेरा हृदय एक आदमी की हत्या के बोझ से बोझिल हो उठा।’ घर आकर माँ से सब कुछ कहा, ‘माँ उसके कफन के लिए कोई नया कपड़ा निकाल दो।’ माँ अपने सीने के कपड़ों की पोटली उठा लाई । नया कपड़ा निकालने के लिए उन्होंने ज्यों ही पोटली खोली जम्बक की डिबिया खट् से गिर पड़ी ।
कहानी यहीं समाप्त हो जाती है। कहानी जहाँ समाप्त होती है, वस्तुत: असल कहानी वहीं से शुरू होती है। यह जहाँ नायक के पश्चाताप की कहानी है, वहीं पश्चाताप में जलते हुए एक आदमी के मनोविज्ञान की भी कहानी है।
इस कहानी का यह अंश बहुत ही महत्त्वपूर्ण है– ‘मैं कोट उतार रहा था, न जाने मुझे क्यों क्रोध आ गया और मैं कमरे से निकल आया और बोला, ‘चले जाओ अपना हिसाब लेकर । हमें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है।’ आखिर माँ ने बहुत समझाया पर हम सब भाई–बहिन न माने, और माँ ने केठानी को बहुत रोकना चाहा और वह यही कहता रहा–‘जब तक भैया माफ न कर देंगे, अपने मुँह से मुझसे रहने को न कहेंगे, मैं न रहूँगा ।’ और न मैंने केठानी से रहने को कहा और न वह रहा, हमारे घर की नौकरी छोड़कर वह चला गया । पर घर के सब लोगों को वह प्यार करता था। वह गया ज़रूर, पर वह तन से गया, मन से नहीं । माँ को भी उसका अभाव बहुत खटका और मुझे तो सबसे ज्यादा उसका अभाव खटका । वह मेरे कमरे की सफाई करता था, सजाकर रखता था। फूलों का गुलदस्ता नियम से बनाकर रखता था । मेरी ज़रूरतें वह बिना बताए समझता था और पूरी करके रखता था, पर जिसे स्वभाव के कारण चाहते हुए भी मैं माँ से यह न कह सका कि केठानी को फिर से बुला लो ,जो कि मैं हृदय से चाहता था। एक दिन माँ ने कहा कि केठानी राय साहब के बंगले पर गारा–मिट्टी का काम करता है। मैंने सुना, मेरे हृदय को ठेस लगी । बूढ़ा आदमी, डगमग पैर, भला वह गारा–मिट्टी का काम कैसे कर सकेगा ? फिर भी चाहा कि यदि माँ कहें कि केठानी को बुलाए लेती हूँ ,तो मैं इस बार ज़रूर कह दूँगा कि अच्छा बुला लो, पर इस बार माँ ने केवल उसके गारा–मिट्टी ढोने की ख़बर भर दी और केठानी को फिर से नौकर रखने का प्रस्ताव न किया । एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था। देखा केठानी सिर पर गारे का तसला रखे चाली पर से कारीगरों को दे रहा है। चालीस फुट ऊपर चाली पर चढ़ा वह बूढ़ा केठानी खड़ा काम कर रहा था। मेरी अन्तरात्मा ने मुझे काटा। यह सब मेरे कारण है और मैंने निश्चय कर लिया कि शाम को लौटकर माँ से कहूँगा कि अब केठानी को बुला लो । वह बहुत बूढ़ा और कमज़ोर हो चुका है। दिन भर मुझे उसका ख़्याल बना रहा । शाम ज़रा जल्दी लौटा । रास्ते पर ही राय साहब का घर था। मजदूरों में एक विशेष प्रकार की हलचल थी सुना कि एक मज़दूर चाली पर से गिरकर मर गया। पास जाकर देखा, वह केठानी था।
एक ईमानदार व्यक्ति के अहम् एवं हठ का मनोविज्ञान इस कहानी का मूलाधार है। केठानी का चरित्र बहुत ऊँचा उठ गया है। उसकी ईमानदारी एवं उसका स्वाभिमान उसे ऊँचा उठा देते हैं। प्रोफेसर के पश्चाताप और नौकर के प्रति उसके हृदय में प्रेम उसके चरित्र को और भी ऊँचाइयाँ प्रदान कर जाते हैं। वहीं इस कहानी में उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग की मानसिकता की खाई और स्पष्ट होती है। दोनों वगो का भेद आज भी कायम है। मज़दूर सदैव मरता है और मर के भी जीतता है और सामंत जीतता है, मगर जीतकर भी हार जाता है। यही इस कहानी की विशेषता है। यही विशेषता इस कहानी को श्रेष्ठ कहानी बना देने में सहायक होती है।
सुभद्राजी की एक कहानी है–‘तीन बच्चे’ । यह ऐसे तीन बच्चों की मर्मस्पर्शी कहानी है, जिसे प्रत्येक शहर के गटरों के आसपास देखा जा सकता है। यह कहानी आज भी पुरानी नहीं हुई है। आज भी स्थिति ज्यों की त्यों है। कहीं कुछ भी नहीं बदला । न परिवेश बदला है, न पात्र और न ही स्थितियाँ । स्थितियाँ तो अब पहले से भी बदतर हो गई हैं। तीनों बच्चों का पिता प्रतिदिन शराब पीकर दंगा करता था तथा अपनी पत्नी को पीटता था–गाली देता था। अत: पुलिस ने उसे पकड़ लिया। इनकी माँ ने पति को पकड़ने चले सिपाही को मारा था। अत: उसे भी जेल भेज दिया गया था। माँ की गोद में एक छोटा बच्चा था जो इन तीन बच्चों यानी दो बच्चियों एवं एक लड़के के अतिरिक्त था। बेसहारा तीनों बच्चे जेल के सामने ही नाले पर बने पुल के नीचे रहते हैं। भिक्षा लेकर खाते हैं । भिक्षा माँगने के क्रम में ही ये बच्चे एक दिन नायिका के निवास पर पहुँचते हैं। नायिका के भी चार बच्चे हैं। तीन लड़के, एक छोटी लड़की । वे बच्चे इन बच्चों को पूरी–सब्जी देते हैं। वहीं नायिका इन बच्चों का परिचय प्राप्त करती है।
नायिका स्वयं युद्ध विरोधी सत्याग्रह के कारण जेल पहुँच जाती है। नायिका के साथ उसकी कनिष्ठ संतान भी गई थी। जेल में नायिका का परिचय उन तीनों बच्चों की माँ से होता है। किन्तु उनकी माँ नायिका से सही अर्थों में परिचित नहीं हो पाती । नायिका के अनुसार मेरा चित्त उदास हो गया। मैं कमरे में बैठकर कुछ सोचने लगी और वे बच्चे कपड़े लेकर खुशी–खुशी चले गए। कुछ दूर से बच्चों के गाने की आवाज़ आने लगी –
‘मैं डूबत हूँ मँझधार पड़ी,
मोरी बैंया पकड़े उठा लेना’
बहुत से सुन्दर पद–लिखे और सुने थे। पर स्वर और आत्मा का ऐसा संयोग तो कहीं नहीं देखा था, शब्द और वस्तु का ऐसा मेल तो कभी चित्रित नहीं हुआ । मैं उन्हें बुलाने के लिए झपटी पर तब तक वे दूर निकल गए थे ।
यहीं से कहानी गंभीरता एवं ऊँचाई ग्रहण करती है। यहीं इस श्रेष्ठ कहानी का टर्निंग प्वाइंट है। कहानी का अन्तिम भाग इसे भावना एवं यथार्थ के शीर्ष पर ले जाता है और पाठक सोचने हेतु विवश हो जाता है। नायिका कहती है–‘जेल में मेरे पास अखबार आया करते थे। जेल की सभी कैदी स्त्रियाँ लड़ाई की ख़बरें सुनने को उत्सुक रहा करती थीं। उन्हें विश्वास था कि एक दिन ऐसा होगा जब जेल के फाटक टूट जाएँगे और अवधि से पहले ही उनका छुटकारा हो जाएगा । मैं भी उन्हें यूरोप की लड़ाई और भारत के सत्याग्रह की ख़्ाबरें सुना दिया करती थी। उस दिन शाम को अखबार आया और पढ़ते–पढ़ते मेरा जी धक–से रह गया। जबलपुर की ही खबर थी– कल रात एकाएक पानी बरसा और खूब बरसा। जेल के पास के नाले में तीन ग़रीब बच्चे बह गए। उन तीनों की लाशें मिली हैं। बहुत खोज करने पर भी उनकी शिनाख़्त नहीं हो सकी। दो लड़कियाँ हैं और एक लड़का । ऐसा सुना गया है कि गाना गाकर भीख माँगा करते थे ।
मेरे घर पर आकर गाने वाले उन तीन बच्चों का चित्र हठात् मेरी आँखों के सामने खिंच गया और ऐसा जान पड़ा जैसे दूर से कोई गा रहा है–
‘मैं डूबत हूँ मँझधार पड़ी,
मोरी बैंया पकड़े उठा लेना’
अख़बार रखकर आँसू रोकने का प्रयत्न करने लगी। अचानक मेरे मुँह से निकल गया–‘बेचारे बच्चे ! ’ लखिया (तीन बच्चों की माँ) पास ही बैठी मेरे लिए चाय तैयार कर रही थी। उसने पूछा–‘क्या ख़बर है, बाई साहब ! अरे, उदास क्यों हो गईं ? बच्चों की याद आ रही है ?’ मैं उसे कुछ भी उत्तर न दे सकी । वह फिर बोली – ‘थोड़े ही दिन तो और हैं – बाई साहब । कट ही जाएँगे। फिर बच्चे अपने बाप के साथ तो हैं, फिकर क्यों करती हो?’
उसकी ओर देखने की मेरी हिम्मत नहीं थी, पर मुझे ऐसा जान पड़ा जैसे उसने बात खतम होते, न होते एक गहरी साँस ली और आँखों के आँसू पोछ लिये। मैंने अपनी सब शक्ति संचित करके उससे पूछा –‘लखिया तेरे और बच्चे हैं, या यही एक है?’ आँखों में आँसू और ओठों पर एक क्षीण मुस्कराहट के साथ वह बोली, ‘एक ही क्यों बाई साब, (मेरी बच्ची की ओर इशारा करके) यह बिटिया भी तो है।’
मैंने कहा–‘ये जो जेल के भीतर है। जेल के बाहर कितने है?’ लखिया एक गहरी साँ लेकर बोली–‘जेल के बाहर बाई साहब, वो तो भगवान के हैं, अपने कैसे कहूँ?’ और इसके बाद वह अखबार की खबर पूछती ही रह गई , पर मैं उसे कुछ भी न बतला सकी ।
इन तीनों कहानियों के जहाँ कथानक स्वाभाविक एवं विश्वसनीय हैं, वहीं उनका प्रतिपादन कथानक के अनुरूप होने के कारण उसे और सार्थक बना देता है। पात्रानुकूल संवाद और लेखकीय भाषा में उपजी किस्सागोई पाठकों से सीधा रिश्ता बनाने में पूर्णत: सफल होती है। कहानी का उद्देश्य कहीं से भी आरोपित न होकर, बहुत ही सहजता से अपने प्रतिपादन के कारण अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफलता प्राप्त कर लेता है और पाठकों के हृदय पर वांछित प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाता है।
सुभद्राकुमारी चौहान की ये तीनों कहानियाँ केवल अपने समय का सच ही नहीं हैं, अपितु वे प्राय: सार्वकालिक बन गई हैं । कारण, मानव की जो सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है, उसके निकट भविष्य में बहुत बड़ा बदलाव आ जाएगा, फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता । फिर पता नहीं ये कहानियाँ उपेक्षित कैसे रह गईं ? आज भी ये कहानियाँ चर्चा की अपेक्षा रखती हैं। मेरी दृष्टि में ये तीनों कहानियाँ और विशेष रूप से ‘तीन बच्चे’ हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में स्थान पाने की पूर्ण अधिकारी हैं।
यों इनकी अन्य तीन कहानियाँ ‘मंगल’ जो समाज में बेटी का माता–पिता के घर से विदा होना और चिडि़या के बच्चों की तरह से उड़ जाने की स्थिति को आमने–सामने रखकर एक माँ अपनी भावना को प्रस्तुत करती है। यह एक मार्मिक कहानी है।’ ‘बड़े घर की बात’ सामंतवाद की पोल खोलती तथा उस पर प्रहार करती कहानी है, जिसमें पत्नी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पति की इच्छानुसार चाभी का खिलौना बनी रहे–ऐसा न होने पर उसके जीवन को समाप्त कर दिया जाता है। ‘कान के बूँदे’ वैचारिक स्तर पर बेमेल विवाह की त्रासदी की दर्दभरी कहानी है, जिसका अन्त वर्तमान समय में भले ही गले न उतरे, परन्तु इसकी पठनीयता पर कहीं कोई संदेह नहीं है।
हिन्दी के आलोचकों से इतनी अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि वे ‘तीन बच्चे’, ‘जम्बक की डिबिया’ और ‘दुराचारी’ पर पूरी गंभीरता से विचार करेंगे ।
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