हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

हौसला रख - गज़ाला तबस्सुम

गज़ाला तबस्सुम

1

ख्वाब बिखरें हों अगर तू हौसला रख

फिर भी तू बदगुमानियों से फासला रख ।

यूँ न बन जाता आशियाना किसी का

सामने तू पंछियों का घोंसला रख ।

क्यूँ  परेशाँ है तू ग़मे- ज़िन्दगी से

सामने रब के तू अपना मामला रख ।

कब तलक तक़दीर यूँ निगहबानी करेगी

हाथ में अपने भी तू कुछ फैसला रख ।

डर न जाना रहगुज़र की आँधियों से

आएगी मन्ज़िल नज़र तू हौसला रख।

2

फासले कुछ क़रीब हो जाते

हमनवाँ तुम नसीब हो जाते ।

रहगुज़र खुशगवार हो जाता

आप गर मिरे हबीब हो जाते ।

मुस्कुरा कर गले मिले होते

कल पशेमाँ रक़ीब हो जाते ।

आपकी  गर  इनायतें  होतीं

शादमाँ हम बदनसीब हो जाते ।

दौलतों की दीवारें गिर जातीं

खुश  बहुत  गरीब  हो जाते।

3

खुदाया  मैं  तेरी रज़ा चाहती हूँ

मै अनहद से आई सदा चाहती हूँ।

तलबगार हूँ तेरी रहमतों की या रब

तू रहता कहाँ  है पता चाहती हूँ

शबो रोज़ गुज़रे इबादत में तेरी

ज़मीं पर मैं ऐसी कदा चाहती हूँ

अकेले कहाँ तक निभाऊँ मै रिश्ते

कि बदले वफ़ा के वफ़ा चाहती हूँ

मैं घबरा गई हूँ ग़मे- ज़िन्दगी से

मिले कुछ ख़ुशी अब दुआ चाहती हूँ

हदें तोड़ने का जुनूँ है मुझे भी

मैं लहरों को भी मोड़ना चाहती हूँ

गवारा नही अब मुझे और कोई

तुझे बस तुझे सोचना चाहती हूँ।

4

खबर रखता है मेरी पर बताना भूल जाता है

मिरा हो कर भी मेरे पास आना भूल जाता है।

बहुत मसरूफ़ रहता है किताबी दायरों में वो

इबारत क्यों दिलों की ही वो पढ़ना भूल जाता है।

तुझे मंज़िल भला कैसे मिलेगी बेखबर बन्दे

तू रास्ता याद रखता है ठिकाना भूल जाता है।

समझ पाता नही वो आज भी रिश्ते मुहब्बत के

नए रिश्ते बनाता है पुराने भूल जाता है।

बड़ा ग़मगीन रहता है वो माज़ी की दरारों से

मगर माज़ी की तहरीरें मिटाना भूल जाता है।

बड़ी ही कशमकश में कट रही है ज़िन्दगी उसकी

अहद वो कर तो लेता है, निभाना भूल जाता है

गरीबी जब भी देती है तजुर्बे ज़िंदगानी के

ग़मों की मार से बचपन मुस्काना भूल जाता है।

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गज़ाला तबस्सुम (गृहिणी)

शिक्षा- बी-एस-सी (आनर्स)वनस्पति विज्ञान

ग़ज़ल एवं कविता लेखन, साथ ही समीक्षा का प्रयास

स्थान- आसनसोल(पश्चिम बंगाल)

email – talk2tabassum@gmail.com

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