हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़लें - भानुमित्र

1

संघर्षों से  जो  भयभीत  जिया करते हैं

समझौतों का  वे ही नाम लिया करते हैं

चुक जाते हैं जिस पल भी सोचों से अपने

तो अग्रज ही  अनुजों के होंठ सिया करते हैं

जीवन क्या है  ये साँसें भी तो व्यापार हुईं

काम के बदले ही  सब काम किया करते हैं

चालाक चतुर थे सारा अमरत बाँट लिया

सीधे सादे  तो  विषपान  किया करते हैं

कुछ लोगों के हाथों में सौंप दिया जग को

ऐसे निज हाथों निज कर्म क्रिया करते हैं

करुणानिधि की देन कहाँ होती है कविता

अच्छे लोग सही  परिणाम  दिया करते हैं

2

कंकर है तो क्या तालाब हिला देता है

अपने होने की औकात बता देता है

कुश की बस्ती में माचिस को बन्द ही रखना

एक शरारा ही जंगल को जला देता है

आवाज़ में जिस की थोड़ा भी दम होता है

वो अकेला हो कर भी भीड़ बना देता है

अपने कन्धों की ताकत पे भरोसा रखना

तेरा इक हाथ ही इक शहृ को बसा देता है

क्यों बाँट रहे आकाश हवा की लकीरों में

टकरा कर ही पंछी यान गिरा देता है

वो इमारत जैसा है तो बड़ा कमजोर भी है

घुटने पे करो चोट तो शीश झुका देता है

-०-

गजल  गरिमा

(हिन्दी भाषा को समर्पित गजल की त्रैमासिकी)

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