हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़ल - रेनू भंडारी *सबा *

ना गिला है ना – खुदा से ना खफा सफ़र से हम
कभी तेरे , डूबे और कभी खेले भँवर से हम

अब उठके मंज़िलों को आना है मेरे पास
बैठे हैं राह तकते कितने सफ़र से हम

आँसू हैं अब तो उसके मेरी आँख से जो बहते
क्यों देखें ज़िन्दगी को किसी की नजर से हम

राहें बदल गईं या इंसाँ , ना हम समझ सके
गुज़रे हैं बाढ़ यूँ इस राहगुजर से हम

तारे पिघल रहे हैं के हो जाए रात रौशन
वाकिफ हैं काली रत के अँधेरे सफर से हम

कहानी को क्यों हम अपनी इल्फाज़ में लपेटे
ये ब्याने दास्ताँ हैं गुज़रे जिधर से हम

छूटे हैं अब भी दामन -ए -हस्ती को हम ””सबा””
दुबके हैं और सिमटते वक्ते कहर से हम