हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

ग़ज़ल - महेश नन्दा *शैदा*

क्या पियूँ मैं साकिया पैमाना पैमाने के बाद
क्या चिंगारी अब उठेगी दिल के जल जाने बाद

दैरे – काबा से निकलकर मैकदे में आए हैं
देखिये जाते कहाँ हैं यां से उठ जाने के बाद

मेहरबान शब भर रहे वो किस तस्सवुर में भला
और फिर बे रुख हुए शब के गुज़र जाने के बाद

जिस के हाथों जाम ले मेरी तिश्नगी मिट जायेगी
ढूँढ़ता हूँ मैं उसे मैखाना मैखाने के बाद

ले तो आये हैं किसी आशिक की मैय्यत दैर से
देखिये करते हैं क्या वो दश्त में लाने के बाद

कह गया परवाना शमा से इसे लीजो समेट
राख पाये ना बिखरने मेरे जल जाने के बाद

ये भी तर्ज़े खल्क है के इक जरा सी बात पर
रौज़ ए -शब गढ़ती रहे अफ़साना अफ़साने के बाद

आ के तेरे शहर में यह हाल ””शैदा ”” का हुआ
हर कदम मिलता रहा बेगाना बेगाने के बाद
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