हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

सीमा सिंह की लघुकथाएँ - सीमा सिंह

सीमा सिंह
1-रंग
“तू जानता भी है, छोटे, कि तू क्या बोल रहा है? ऐसा अनर्थ हमारे कुल में ना कभी हुआ, ना होगा। दद्दा आप समझाइए इसे।”
seema-singhकिसी गहरी नदी की सी गंभीरता लिये ही देखा था उन्हें बचपन से। मुँह अँधेरे उठकर घर के कामों में जुटी, हर आवाज़ पर दौड़ती, सबकी जरूरत का ख्याल करती, सफ़ेद लिबास में लिपटी शांता बुआ। चार भाई और भाभियों, और उनके हम सब बच्चे। सबकी आदतों से परिचित बुआ की आवाज़ ,तो कभी-कभी ही सुनाई देती। इतनी शांत बुआ झगड़े की वज़ह भी हो सकती हैं, विश्वास ही ना हुआ था। पर बड़े चाचा की आवाजों से पूरा दालान गूँज रहा था।
“बहन हम सबकी नौकरानी बनकर रह गई ,उसमे अनर्थ नहीं है? दुबारा घर बसने में अनर्थ हो जाएगा?” ये छोटे चाचा का स्वर था।
“आप एक बार सोचिए तो सही, दद्दा,” अब तक चुप खड़े मँझले चाचा भी छोटे चाचा के समर्थन में उतर आए थे।
पिताजी ने थोड़ा समय माँगा था सोचने के लिए। इस बीच घर की स्त्रियों ने भी मौन आहुति डाल दी थी छोटे चाचा के यज्ञ में।
घर में उत्सव मन उठा। सफ़ेद लिबास उतार, लाल जोड़े में लिपटी शांता बुआ की आँखों में जीवन की ज्योति जल उठी थी।
तब पहली बार जाना नारी जीवन में लाल और सफ़ेद रंग का फ़र्क।
-0-
2-महकती बगिया

खन्ना जी क्यारी में बैठे खुरपी चला रह थे, और बीच-बीच में सर उठा कर देखते भी जा रहे थे कि कोई आ तो नहीं रहा है। ऐसे तो निश्चिन्त। थे पत्नी नहा कर पूजाघर में गई थी तभी बाहर आए थे। मगर पत्नियों का क्या भरोसा? नज़र डालने चली आए कि सब ठीक तो है।
दरअसल, अभी दो माह पूर्व ही खन्ना जी की शल्य-चिकित्सा हुई थी, ह्रदय की। धमनियों में कुछ अवरोध जैसा हो गया था। चिकित्सीय सलाह के अनुसार उन्हें पूर्ण विश्राम करना चाहिए था। परन्तु खन्ना जी को अब बिस्तर पर टिक पाना असह्य हो गया था,, सो टहलने के बहाने बाहर आ, अपनी बागबानी में जुट गए थे। चुपचाप, चोरी-चोरी।
पत्नी पर नज़र रखते रहे पर बेटी को कैसे भूल गए जो अचानक प्रकट हो गई? चिल्लाकर माँ को पुकारने वाली ही थी कि खन्ना जी ने लपक कर उसका मुँह बंद कर आवाज़ वहीं रोक दी।
“क्या कर रही है? पिटवाएगी क्या?”
बेटी के आश्वस्त करने पर ही उसका मुँह छोड़ा। “छिः पापा, आपने मेरे मुँह में मिट्टी भर दी!” बिटिया ने नकली गुस्सा दिखाते हुए अपना मुँह झाड़ा।
“और तू! तू क्या कर रही थी? माँ को बुलाने वाली थी ना?” खन्ना जी भी लड़ गए।
“आप माँ से डरते हैं ये तो मैं जानती थी , मगर इतना डरते हो ,ये आज पता चला!” बिटिया खिलखिला रही थी।
आवाजें सुन श्रीमती जी भी बाहर आ गई। “क्या हो रहा है यहाँ, भई?”
पिता पुत्री ने समवेत स्वर में ठहाका लगाया। क्यारी के साथ-साथ खन्ना जी की पूरी बगिया महक उठी थी।
-0-

3-अन्धकार

“सम्हाल कर माँ, देख गड्ढा है!”
“अब निगाह कम हो गई है, मुझे दिखा ही नहीं।”
“मैं हूँ न माँ, मेरा हाथ थामकर आ जा। बस अगली गली से रौशनी है।” मुख्य सड़क पार कर दोनों ने फिर सकरी गली पकड़ी।
“इधर से?”
“हाँ, माँ, थोड़ा अँधेरा है मगर रास्ता छोटा है। जल्दी पहुँच जायेंगे। पहले ही देर हो गई है ना!”
एक कर्कश स्वर सुनाई दिया, “कहाँ चली गईं थीं तुम दोनों धंधे के टाइम?”
“मंदिर गईं थीं, आज मंगलवार है ना।” ये माँ का स्वर था।
“कितनी बार कहा है कि धंधे के टाइम पर इस चमेली को अपने साथ मत उलझाया कर?” कर्कश स्वर कुछ धीमा हो चला था- “जा तू तैयार हो जा, चमेली।” बेटी से कहा गया था।
“रास्ते में अँधेरा होता है… बिटिया का हाथ पकड़ कर पार कर लेतीं हूँ न, इसलिए लेकर गई थी।” माँ अब भी सफाई दे रही थी- “वो जवान है, उसकी नई नज़र है।”
“कभी तुम भी तो जवान थीं, तुम्हारी नज़र भी तेज थी, तब तुमने मेरा हाथ थामकर इस अंधकार को पार क्यों ना कर लिया था, माँ?”
कमरें में कपड़े बदलती चमेली की बुदबुदाहट किसी के कानों तक ना पहुँच सकी।
-0-