हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

पात झर- झर गिर चले - अनल

1-छोड़ गईं क्यों  बया घोंसले 

अनल
अनल

घर के बाहर

खड़ी बकैन पर

बस गई अमर बेल

पीली पड़ने लगी

खुशनुमा हरियाली

छोड़ गईं क्यों  बया

बना अपने घोंसले!

बन में कई पलाश

लपटों में घिर गए

पात झर- झर  गिर चले

ढाँप दी पूरी

ज़मीन ऊबड़- खाबड़

हर  सँकरी राह पगडण्डी

सब के सब

पोखर तट।

लद-फद गए

बैंजनी- से जकराण्डा

लिये रुपहले लाल अंकुर

आम्र, पाकड़ वृक्ष

गुलमोहर शीशम बबूल

अमलतास ओढ़े रंग

रूप अपने -अपने!

पर ना जाने क्यों

छोड़ गया बया का झुण्ड

बने-बनाए अपने

अपने घोंसले!

-0-

2-हलाहल

हे महादेव!

पी लिया था

आप ने तो

लगभग पूर्ण

कालकूट !

यह आ गया

कहाँ से इतना

ढेरों ढेर विष!

कैसे हो गया

विषाक्त समस्त

विश्व, धरा, वायु ,

स्नायु-मण्डल?

सजीव, गण-जन्तु

हो गए, लोग

नहीं रहे अब

कैसे भी लोग!

हलाहल

पी लेने पर

कहाँ खो गया?

कौन ले गए थे

वो खाली पात्र?

कहीं उसी का

विषैला, गला-जला

धुआँ कण-कण

हर क्षण हलाहल,

घुले तो नहीं जा रहा

देव-प्राणों में भी,

जो थे धूर्त नितांत-

कण-कण विष

क्षरण कर गया

अमृत पान का?

पलट गए गुण,

धर्म, हौले-हौले !

कायाकल्प यही

कहलाता है क्या?

प्रजापति शीश-

इरादा है क्या

एक बार फिर

विच्छेदन का?

किसका लाओगे सर!

कहीं नहीं कोई मूर्ख!

सब ही हैं अब धूर्त!

-0-

अनल जी का परिचय 

विद्यार्थी जीवन में कानपुर में राजनीति के अति वाम पक्ष का जायज़ा लिया।| “…मैं हूँ ज़मीन से जुड़ा एक निहायत ही साधारण व्यक्ति । कहीं भी किसी भी परिवेश में चलते रहने को मजबूर । असंतुष्ट रहते हुए समझौते कर चलते चले जाने में कहीं से कहीं पहुंच जाने वाला ।”

 सम्प्रति यमुनानगर, हरियाणा में एक फैक्ट्री का संचालन ।

ई-मेल-appabantra@gmail.com