हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

दो ग़ज़लें - सम्पादक

1- ऋतु कौशिक

लब पे तेरे नाम जिसका हर घड़ी
उसको भी तू याद आना चाहिए

ज़िंदगी तनहा भी फिर कट जाएगी
दिल में यादों का खज़ाना चाहिये

रात के साये में बन के रौशनी
जुगनुओं सा जगमगाना चाहिये

मिल न पाए मंज़िलें तो ग़म न कर
फिर भी खुद को आज़माना चाहिए।

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2-ऋतु कौशिक

चाहे जितनी हो मुसीबत दश्त में
है मुझे रहने की आदत दश्त में

हर शजर की खुल गई बाहें यहाँ
फिर हुई बारिश की चाहत दश्त में

नफरतों का घोल दे दिल में ज़हर
है कहाँ एसी सियासत दश्त में

सब परिंदे घोंसलों में छुप गए
आज आएगी क़यामत दश्त में

ढूँढ के हारी मैं जिसको दर -ब -दर
मिल गई मुझको वो राहत दश्त में।

ऋतु कौशिक
जन्मतिथि-30.09.1975
शिक्षा -पर्यावरण साइंस में मास्टर डिग्री
सम्प्रति-आकाशवाणी में उद्घोषिका व दूरदर्शन में समाचार वाचिका
पता – मकान न.43-सी, प्रोफेसर कॉलोनी,आज़ाद नगर,हिसार-पिन 125001
फोन 9354967636