हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

चकित चाँद - डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

सेदोका 

1

कविता ,छंद

गीतग़ज़ल सारे

बड़े भोले होते हैं,

जग भर के

ग़म-ख़ुशियाँ देखो

काँधों पर ढोते हैं ।

2

अरी ख़ुशियों !

झाँकके देखा ,फिर

मुँह क्यों छुपा लिया ?

ग़म ही भले

आए मेरे दिल को

आशियाँ बना लिया ।

3

चकित चाँद

देखता था नज़ारे

उझक-उझक के

ले गया मेघ

तान स्याह चादर

रात सारे सितारे ।

4

पहन आया

सतरंग मुंदरी

अम्बर हीरों -जड़ी

देखी जो शोभा

अनुपम धरा भी

देखो ठगी सी खड़ी ।

5

चाहा अमृत

बदले में उसके

विष ही पीते गए

उनकी ख़ुशी

जीने का मक़सद

यूँ हम जीते गए ।

6

जी चाहे मेरा

बस तेरी ख़ातिर

अम्बर धरा पर

उतार लाऊँ

नभ-गंगा से तेरा

मैं दामन सजाऊँ ।

7

 

उन्होनें कहा –

पंक भरा बाहर

पग रखना नहीं,

विश्वास मेरा-

खिलेंगे कमल भी

देखना कल यहीं ।

8

मैंने ये रिश्ते

फूल जैसे सहेजे

तितली की मानिंद

छुए प्यार से

महक बाकी रही

रंग भी खिल गए।

9

क्यूँ सोचते हो

जो तुम दर्द दोगे

तो बिखर जाऊँगी

ये जान लो

धुल के आँसुओं से

मैं निखर जाऊँगी ।

10

सुनो ज़िन्दगी!

तुम एक कविता

मैं बस गाती चली

रस -घट भी

प्रेम या पीडा़ -भरा

पाया , लुटाती चली ।