हिन्दी प्रचारिणी सभा: ( कैनेडा)
की अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका

देर नहीं अँधेर - पूनम सैनी

पूनम सैनी

1- बचपन

ना फिक्र थी,

ना थी कोई हया,

और नहीं था कोई ठिकाना।

वो बचपन, वो यादें।

वो शरारती सा बन

जिंदगी का मुस्कुराना।

-०-

2-देर नहीं अँधेर

पास उड़ती तितलियाँ भी,

बदरंग हो गई थी।

झुक गए थे वृक्ष भी,

लज्जा के बोझ तले।

मुरझा गए थे फूल भी,

देख मुझे मुरझाते।

काँप उठी थी धरती,

मेरे तिलमिलाते,

घायल अंगों को देख।

कोशिश बहुत की थी,

आसमान ने;

मुझ अचेत को ढकने की।

मचाया था शोर भी बहुत,

हर दिशा ,

तब हवा ने।

रुँध गया था,

कंठ काली कोकिला का,

मेरी दबी सिसकियों से।

मूँद ली थीं ,

आँखें भय से,

कोमल कुँवारी कलियों ने।

भर गए थे मेघा,

मेरी तड़प से  आहों से।

रिसक रही थी मैं,

बूँद – बूँद,

हर घड़ी,

जीवन गगरी से।

स्तब्ध रह गया था तेरा संसार,

मेरे दर्द का बन साक्षी।

मेरी जिंदगी और मौत

इस कदर।

अँधेर ना होती।

ऐ खुदा!

काश तेरे घर में देर ना होती।

-०-